बुधवार, 31 मई 2017

विरोध प्रदर्शन या क्रूरता का प्रकटीकरण

 पशुओं  को क्रूरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार के आदेश का विरोध जिस तरह केरल में किया गया, कोई भी भला मनुष्य उसे विरोध प्रदर्शन नहीं कह सकता। यह सरासर क्रूरता का प्रदर्शन था। इसे अमानवीय और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रकटीकरण कहना, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगा। केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में कांग्रेसी इतने अंधे हो जाएंगे, इसकी कल्पना भी शायद देश ने नहीं की होगी। कम्युनिस्टों का चरित्र इस देश को भली प्रकार मालूम है। केरल में रविवार को जिस प्रकार कम्युनिस्ट संगठनों ने केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए 'बीफ फेस्ट' का आयोजन किया, सार्वजनिक स्थलों पर गौमांस का वितरण किया, निश्चित तौर पर विरोध प्रदर्शन का यह तरीका निंदनीय है। लेकिन, कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार से देश को आश्चर्य नहीं है। कम्युनिस्टों का आचरण सदैव ही इसी प्रकार का रहा है, भारतीयता का विरोधी। केरल में कम्युनिस्ट जब अपनी विचारधारा से इतर राष्ट्रीय विचारधारा से संबंध रखने वाले इंसानों का गला काट सकते हैं, तब गाय काटने में कहाँ उनके हाथ कांपते? उनका इतिहास यही सिद्ध करता है कि हिंदुओं का उत्पीडऩ उनके लिए सुख की बात है। लेकिन, कम्युनिस्ट आचरण का अनुसरण करती कांग्रेस का व्यवहार समझ से परे है। देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी यह देखकर दु:खी है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल, जिसे उसने लंबे समय तक देश चलाने के लिए जनादेश दिया, आज वह उसकी ही आस्था और भावनाओं पर इस प्रकार चोट कर रहा है।
          एक जमाने में कांग्रेस का चुनाव चिह्न 'गाय और बछड़ा' हुआ करता था और उससे पहले 'बैलों की जोड़ी'। अपने प्रारंभिक दिनों में कांग्रेस गौवंश को अपना चुनाव चिह्न बनाकर हिंदू समाज से मत प्राप्त कर सत्ता में आती रही। कांग्रेस के कई नेता समूचे देश में गौ-हत्या को रोकने के लिए एक कठोर कानून की इच्छा रखते थे, लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के कारण यह संभव नहीं हो सका। बहरहाल, बाद में कांग्रेस का नया चिह्न हो गया, हाथ का पंजा। कांग्रेस ने नारा दिया है- 'कांग्रेस का हाथ, गरीब के साथ।' लेकिन, वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि 'कांग्रेस का हाथ, गाय के गले पर' है। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ताओं ने जिस प्रकार नारेबाजी कर केरल में बीच सड़क पर गाय का गला रेता है, उससे समूचे देश में आक्रोश की लहर उत्पन्न हो गई है। 
          यहाँ सवाल यह भी है कि केंद्र सरकार का आदेश सिर्फ गाय के प्रति क्रूरता रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका आदेश सभी पशुओं के प्रति संवेदनशील भाव रखने के लिए है। केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने वध के लिए पशुओं की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने का जो आदेश जारी किया है, वह गौवंश के साथ ही भैंस, बकरी और ऊंट सहित अन्य पशुओं के संदर्भ में लागू होता है। फिर कांग्रेस ने 'गाय के गले पर ही चाकू' क्यों चलाया? यूँ तो अपनी राजनीति के लिए किसी भी जीव की हत्या उचित नहीं, फिर भी कांग्रेस को यदि विरोध प्रदर्शन का राक्षसी तरीका ही अपनाना था, तब वह भेड़, बकरी, सूअर भी चुन सकती थी। कांग्रेस ने गाय की ही हत्या क्यों की? क्या यह एक विशेष वर्ग को लुभाने के लिए कांग्रेस का राजनीतिक कदम था? तकरीबन 100 करोड़ हिंदुओं को आहत करके कांग्रेस चंद वोटों की खातिर एक वर्ग के तुष्टीकरण के लिए इतना नीचे गिर जाएगी, इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। गौ-सेवक बहुसंख्यक समाज की भावनाओं से खिलवाड़ क्या सांप्रदायिकता की श्रेणी में नहीं आता? 
          बहरहाल, कांग्रेस का यह व्यवहार राष्ट्रीय राजनीति के लिए ठीक नहीं है। केरल में गौहत्या और गौमांस वितरण से देश में जो रोष उत्पन्न हुआ है, भविष्य में कांग्रेस को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। शायद कांग्रेस को भी इसका आभास हो गया है। इसीलिए उसके उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने इस घटना की आलोचना की है और कहा है- 'केरल में जो हुआ वो क्रूर है और मैं या मेरी पार्टी ऐसी किसी भी चीज को बर्दाश्त नहीं करेगी। मैं कड़े शब्दों में इस घटना की आलोचना करता हूं।' हालाँकि, राहुल के बयान पर यही कहा जा सकता है- 'मेहरबां बहुत देर कर दी आते-आते...।' 
          राहुल गाँधी की ओर से यह आलोचना इसलिए भी देश स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि प्रारंभ में कांग्रेस ने इस क्रूरता की हकीकत पर पर्दा डालने का ही प्रयास किया था। एक तरफ केरल के कांग्रेस के नेता कह रहे थे कि उन्हें अपने किये पर किसी प्रकार की शर्मिंदगी और पछतावा नहीं है, वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता कह रहे थे कि गौहत्या में कांग्रेस के कार्यकर्ता शामिल हैं, अभी इसकी पुष्टी नहीं हुई है। सोशल मीडिया पर कांग्रेस की फौज अपने अपराध पर क्षमा भाव प्रदर्शित करने की जगह बड़ी बेशर्मी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं पर झूठी अफवाह फैलाने का आरोप लगा रही थी। जबकि सच सबके सामने था। केरल के अखबार ही नहीं, केरल के कांग्रेसी नेता भी 'क्रूरता के प्रकटीकरण' में स्वयं की सहभागिता स्वीकार कर रहे हैं। 
          तथाकथित सबसे अधिक साक्षर राज्य केरल की इस घटना के बाद देश की जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत में गौहत्या किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। जनता की भावनाओं का सम्मान करने के लिए केंद्र सरकार को आगे आना चाहिए और संविधान में संशोधन कर समूचे देश में गौ-संरक्षण के लिए एक समान कानून बना कर लागू करना चाहिए। न्यायालय भी यह बात कह चुके हैं कि देश में गौहत्या और गौमाँस की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए। यकीनन देश में गौहत्या पर हो रही राजनीति से समाज में सांप्रदायिक खाई गहरा रही है। गौहत्या पर राजनीति उचित नहीं। इसका समाधान गौहत्या पर एक कानून ही है। यह उचित समय है, जब इस प्रकार का कानून बनाया जा सकता है। केंद्र सरकार यदि गौ-संरक्षण के लिए एक कानून बनाने का निर्णय करती है, तब देश की जनता का भरपूर समर्थन उसे प्राप्त होगा। 
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