मंगलवार, 23 मई 2017

मिशन बन गई है नर्मदा सेवा यात्रा

 सदानीरा  नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा है। मध्यप्रदेश की समृद्धि नर्मदा से ही है। नर्मदा के दुलार से ही देश के हृदय प्रदेश का दिल धड़कता है। मध्यप्रदेश के साथ-साथ माँ नर्मदा अपने अमृत-जल से गुजरात का भी पोषण करती है। नर्मदा का महत्त्व दोनों प्रदेश भली प्रकार समझते हैं। माँ नर्मदा का अधिक से अधिक स्नेह प्राप्त करने के लिए दोनों प्रदेश वर्षों तक आपस में झगड़े भी। यह संयोग ही है कि नर्मदा के तट पर पैदा हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उसके जल से आचमन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों नर्मदा के उद्गम स्थल पर आकर उसके ऋण से उऋण होने का संकल्प लेते हैं। मध्यप्रदेश में 148 दिन से संचालित 'नमामि देवी नर्मदे : नर्मदा सेवा यात्रा' का पूर्णता कार्यक्रम वन प्रदेश अमरकंटक में 15 मई, 2017 को आयोजित किया गया। परंतु, वास्तव में यह पूर्णता कार्यक्रम कम था, बल्कि नदियों के महत्त्व के प्रति जन-जागरण की मजबूत नींव पर नदी संरक्षण के भव्य स्मारक के निर्माण कार्य का शुभारम्भ था। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता पर नर्मदा सेवा मिशन की घोषणा यहाँ की गई। कृषकाय हो रही नर्मदा को संवारने का संकल्प दोनों लोकप्रिय नेताओं ने स्वयं ही नहीं लिया, अपितु नर्मदा के लाखों पुत्रों को भी कराया। ऐसी मान्यता है कि यदि हमारे संकल्प शुभ हों, तब प्रकृति भी उनको पूरा करने में हमारी मदद करती है। पर्यावरण और नदी संरक्षण का यह शुभ संकल्प तो प्रकृति की गोद में बसे अमरकंटक की पावन धरती पर ही लिया गया है, इसलिए इसके फलित होने की संभावना स्वत: ही बढ़ गई है। 
          समुद्र तल से लगभग 3500 फुट की ऊंचाई पर स्थित अमरकंटक के पहाड़ों से निकल बहने वाली नर्मदा भारत की सबसे बड़ी पाँच नदियों में शामिल है। इसका लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश की प्यास बुझाता है। लेकिन, अपने स्वार्थ में पड़कर हमने अन्य नदियों की तरह नर्मदा की भी अनदेखी की। यह कहना उचित होगा कि अनदेखी ही नहीं की, अपितु जो नदी हम सबका पोषण कर रही थी, हमने अपने लोभ के लिए उसका शोषण ही प्रारंभ कर दिया। नर्मदा का सीना छलनी करके अवैध रेत उत्खनन किया। उसके गहने 'वृक्ष' उतार लिए। हम भूल गए कि नर्मदा हिम खण्डों से नहीं निकली, अपितु वृक्षों की जड़ से निकला बूँद-बूँद जल ही उसकी अथाह जलराशि है। अवैध उत्खनन और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ही क्या कम थी कि नर्मदा का दम निकालने के लिए उसमें कारखानों का कचरा और नगरों का सीवेज छोड़ा जाने लगा। वर्तमान हालात ऐसे हैं कि मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कही जाने वाली नर्मदा अपनी ही साँसें गिन रही है। 
          नर्मदा का संरक्षण भविष्य के लिए आवश्यक है। और अधिक समय नष्ट हो, उससे पहले नर्मदा ही संरक्षण के लिए आगे आना जरूरी है। कुशल शासक, सजग राजनेता और नर्मदा के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा संरक्षण के महत्त्व को समझा और अपने मुख्यमंत्री पद के कार्यकाल के 11 वर्ष पूर्ण होने पर उन्होंने 'नर्मदा सेवा' का संकल्प लिया। वह भली प्रकार जानते थे कि नर्मदा को स्वच्छ करना और उसका संरक्षण करना अकेले किसी सरकार के बूते की बात नहीं है। वृहद संकल्प की पूर्ति के लिए जन सहयोग अनिवार्य रूप से अपेक्षित है। पर्यावरण और नदी संरक्षण को जन आंदोलन बनाने के लिए उन्होंने 11 दिसम्बर, 2016 को अनूपपुर जिले में स्थिति नर्मदा उद्गम स्थल अमरकंटक से 'नमामि देवी नर्मदे : नर्मदा सेवा यात्रा' का शुभारंभ किया था। 148 दिन में 16 जिलों के 1100 गाँवों, 615 ग्राम पंचायतों और 51 विकासखण्डों में जन जागरण के लिए जन संवाद के कार्यक्रम करते हुए यात्रा ने 3350 किलोमीटर की दूरी तय की। 15 मई, 2017 को यात्रा उसी स्थान पर पहुँचकर पूर्ण हुई। 
          एक आँकड़े के मुताबिक लगभग पाँच लाख नर्मदा सेवकों की उपस्थिति में आयोजित नर्मदा सेवा यात्रा के पूर्णता कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा संरक्षण का विजन दस्तावेज सबके सामने रखा। प्रधानमंत्री ने नर्मदा सेवा मिशन के कार्ययोजना के इस दस्तावेज को 'परफैक्ट डाक्युमेंट' बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहा कि इस कार्ययोजना को सभी राज्यों को भेजा जाना चाहिए। ताकि भारत के शेष राज्यों की सरकारें भी नर्मदा सेवा यात्रा की तर्ज पर अपनी नदियों को बचाने के लिए जनांदोलन चलाने प्रवृत्त हों। पर्यावरण संरक्षण के लिए अनूठा और अनुकरणीय आंदोलन चलाने के लिए प्रधानमंत्री ने गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के नागरिकों एवं किसानों की ओर से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश की सरकार और नागरिकों का अभिनंदन करते हुए बधाई दी। उन्होंने कहा कि गुजरात के लोग जानते हैं कि नर्मदा की एक-एक बूँद का कितना महत्त्व है।
नर्मदा सेवा यात्रा के पूर्णता कार्यक्रम में नदी एवं पर्यावरण संरक्षण का सन्देश देते माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के विद्यार्थी.

कर्तव्य भाव जाग्रत करने का महायज्ञ :
पर्यावरण को क्षति क्यों पहुँच रही है, इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उचित ही टिप्पणी की। नर्मदा सेवा यात्रा के पूर्णता कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जब अधिकार भाव प्रबल हो जाता है और कर्तव्य भाव क्षीण हो जाता है, तब अनेक पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं। नदियों के संरक्षण के प्रति भी कर्तव्य भाव कम होने से नदियाँ लुप्त हो रही हैं। ऐसे समय नर्मदा सेवा का काम लोगों में कर्तव्य भाव जाग्रत करने का महायज्ञ सिद्ध होगा। उल्लेखनीय है कि 148 दिन में लगभग 25 लाख लोग नर्मदा सेवा यात्रा का हिस्सा बने हैं। 1100 जनसंवाद कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों में कर्तव्य भाव को जगाने का प्रयास किया गया है। इसका परिणाम आया कि एक लाख से अधिक लोगों ने 'नर्मदा सेवक' के रूप में अपना पंजीयन कराया। यह नर्मदा सेवक अब नर्मदा के प्रति ही नहीं, बल्कि सभी नदियों के संरक्षण के प्रति सजग रहेंगे और अन्य लोगों को भी जागरूक करेंगे। 
नदियों ने पुरखों को जीवन दिया, हम नदियों को जीवन दें :  
प्रधानमंत्री मोदी ने केरल की एक नदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज कई नदियों में पानी नहीं है, क्योंकि हम समय रहते चेते नहीं। हिन्दुस्थान में कई नदियाँ हैं, जिनका नक्शे पर निशान है, लेकिन उनमें जल का नामोनिशान नहीं है। मध्यप्रदेश के नागरिक समय रहते नर्मदा संरक्षण के प्रति जाग्रत हो गए हैं, यह अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि चूँकि नर्मदा नदी ग्लेशियर से नहीं निकलती। यह पौधों के प्रसाद से प्रगट होती है। इसलिए बड़े पैमाने पर पेड़ लगाकर ही इसकी रक्षा संभव है, इसके अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं है। पेड़ लगाकर हम आने वाली पीढ़ी की भी सेवा करेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम ऐसा कर्म करें कि आने वाली पीढिय़ाँ हमें याद रखें जैसे कि आज हम अपने पुरखों का याद करते हैं। जैसे नदियों ने पुरखों को जीवन दिया, उसी तरह हम भी नदियों को जीवन दें। 
जनभागीदारी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत :  
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जनभागीदारी लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। जनभागीदारी की उपेक्षा कर कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकती। जन समर्थन के बिना कोई बड़ा कार्य संभव भी नहीं। इस दिशा में मध्यप्रदेश ने उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि स्वच्छता के क्षेत्र में मध्यप्रदेश पीछे था, लेकिन दृढ़ संकल्प और जन-भागीदारी से आज देश में सबसे आगे है। प्रदेश की जनता ने अस्वच्छता को चुनौती की तरह लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि देश के 100 स्वच्छ शहरों में मध्यप्रदेश के 22 शहर आ गए। पूरे देश में इंदौर पहले और भोपाल दूसरे स्थान पर है। अर्थात् जनता और सरकार के बीच तालमेल अच्छा हो जाए, तब बड़े काम भी संभव हैं। 
नया भारत बनाने सब आगे आएं :
प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आह्वान किया कि वे हर पल आजादी के 75 वर्ष को याद करें और देश के लिए सकारात्मक योगदान देने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि अपनी संस्था, अपने गाँव, परिवार और प्रदेश-देश के लिए योगदान देने के लिए संकल्पित हो जाएं। उन्होंने कहा कि हम नया भारत बनाने का सपना लेकर चले हैं। इस काम में प्रत्येक नागरिक को जोडऩा है। प्रत्येक नागरिक यह कोशिश करें कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान कैसे दे सकता है। उन्होंने कहा कि यदि नागरिक एक कदम आग चलेंगे तो देश सवा सौ करोड़ कदम आगे निकल जाएगा। इस मौके पर उन्होंने नर्मदे-सर्वदे का नया उद्घोष भी दिया। 
प्रदेश की अन्य नदियों के संरक्षण के लिए भी चलाएंगे अभियान : शिवराज सिंह चौहान
नदी संरक्षण के लिए विश्व के अनूठे आंदोलन के सूत्रधार और उसके नेतृत्वकर्ता मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पूर्णता कार्यक्रम में 'नर्मदा सेवा यात्रा' का समूचा ब्यौरा प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्ययोजना पर भी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि नर्मदा सेवा यात्रा समाप्त नहीं हुई है, बल्कि नर्मदा सेवा मिशन में बदल गई है। मुख्यमंत्री स्वयं नर्मदा सेवा मिशन का नेतृत्व करेंगे। नर्मदा सेवा मिशन की कार्ययोजना को समाज के साथ मिलकर क्रियान्वित किया जाएगा। नर्मदा सेवा मिशन की कार्ययोजना की प्रगति का प्रतिवेदन एक साल बाद जनता को समर्पित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अब प्रदेश की शेष नदियों के संरक्षण के लिए भी प्रयास शुरू होंगे। अगले साल से ताप्ती, बेतवा और चम्बल तथा अन्य नदियों के संरक्षण का कार्य शुरू किया जाएगा। शिप्रा को बचाने के लिए भी जनांदोलन चलाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि प्रत्येक 12 वर्ष में शिप्रा के तट पर 'महाकुंभ' का आयोजन किया जाता है। पिछले वर्ष 'सिंहस्थ कुंभ' के दौरान शिप्रा में पानी नहीं था। नगर का सीवेज मिलने के कारण पवित्र नदी शिप्रा लगभग नाले के तब्दील हो चुकी है। 'सिंहस्थ कुंभ' में आने वाले श्रद्धालु पुण्य डुबकी का लाभ ले सकें, इसके लिए नर्मदा का जल शिप्रा में लाया गया था। उस समय आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ' में शिप्रा को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प सरकार ने लिया था। इसके लिए नर्मदा और शिप्रा नदी के तट पर पौधारोपण का संकल्प भी सरकार ने लिया था। अपने उन संकल्पों को एक बार फिर नर्मदा सेवा यात्रा के पूर्णता कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने स्मरण किया। मुख्यमंत्री ने नर्मदा सेवकों से वादा किया कि नगरों के सीवेज को नदियों में मिलने से पूरी तरह रोका जाएगा। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएंगे और ट्रीटमेंट के बाद का पानी सिंचाई में उपयोग किया जाएगा। कारखानों का दूषित जल और कचरा भी नदियों में मिलने से रोका जाएगा। नदियों के आसपास के गाँव खुले में शौच मुक्त बनाए जाएंगे। नर्मदा के दोनों ओर बसे गाँवों में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि रेत की जरूरत के कारण नर्मदा को छलनी नहीं होने देंगे। खनन का कार्य वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार किया जाएगा। अमरकंटक की पहाड़ी पर किसी भी प्रकार का उत्खनन नहीं होने दिया जाएगा। 
एक वर्ष में 12 करोड़ पौधे रोपेंगे : 
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने बताया कि प्रदेश के 25 लाख लोग नर्मदा सेवा से जुड़ गए हैं। इनमें से करीब 80 हजार नर्मदा सेवक स्थायी रूप से नर्मदा सेवा मिशन से जुड़ गए हैं। अब नर्मदा सेवकों के सहयोग से दो जुलाई को नर्मदा के तटों पर बड़े पैमाने पर पौधारोपण किया जाएगा। इनकी रक्षा की जिम्मेदारी के लिए वृक्ष सेवक उपलब्ध रहेंगे। उन्होंने बताया कि इस वर्ष में 12 करोड़ पौधे लगाये जायेंगे। इनमें से दो जुलाई को छह करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। अगले वर्ष 15 करोड़ पौधे लगाए जाएंगे। उन्होंने बताया कि नर्मदा के संरक्षण के लिए वृक्ष आवश्यक हैं। नर्मदा के प्रवाह की निरंतरता के लिए उसके किनारों पर वृक्ष लगाना और फिर उनका संरक्षण करना अत्यंत आवश्यक है। 
विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाएंगे नदी संरक्षण के पाठ : 
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नर्मदा सेवा मिशन की कार्ययोजना की चर्चा करते हुए बताया कि नदियों के संरक्षण और पर्यावरणीय शुद्धता के अध्ययन के लिए विश्वविद्यालयों में विभाग खोले जाएंगे। मुख्यमंत्री ने अमरकंटक के पर्यावरणीय और आध्यात्मिक महत्व को देखते हुए इसे मिनी स्मार्ट सिटी बनाने की घोषणा भी की। यह प्रदेश की पहली मिनी स्मार्ट सिटी होगी। इस संदर्भ में एक वीडियो प्रजंटेशन भी दिखाया गया। 
शासक, प्रशासक और उपासक का साथ काम करना जरूरी : स्वामी अवधेशानंद
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने कहा कि शासक, प्रशासक और उपासक को एक साथ काम करने का संकल्प लेने का पल है। उन्होंने जल का महत्व बताते हुए कहा कि नीर में ही नारायण है। जल की स्वाभाविक माँग होती है। यह जीवन है। जल की कमी हो रही है। भविष्य में पीने योग्य पानी की कमी न हो इसके लिए मध्यप्रदेश सरकार का यह मिशन समयानुकुल है। उन्होंने कहा कि भारत जल की आराधना में जुटा है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इस दिशा में काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश के लिए आधुनिक भागीरथ सिद्ध हुए है। सिंहस्थ का आयोजन कर वे आधुनिक विक्रमादित्य साबित हुए। श्री अवधेशानंद जी ने कहा कि नदी संरक्षण का यह मॉड्यूल पूरे देश में जाएगा।
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"नर्मदा सेवा यात्रा दुनिया की एक असंभव और असामान्य घटना है, जब लाखों लोग एक नदी की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हुए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्यप्रदेश की जनता और नर्मदा सेवा से जुड़े भक्तों को इस असाधारण कार्य के लिए बधाई। इस कार्य का वैश्विक महत्व है।" 
- नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री
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"मुख्यमंत्री का दायित्व वर्तमान शासन संचालन तक सीमित नहीं है। भविष्य की पीढिय़ों के हित संरक्षण का विचार और तदनुसार कार्य भी हमारी जिम्मेदारी है। इस दायित्व बोध से ही नर्मदा सेवा यात्रा आरंभ की गई है। यात्रा के अंतर्गत वृक्षारोपण, नदी को स्वच्छ और पवित्र रखने के प्रयास और जन-जागरूकता से नर्मदा नदी को हम अगली पीढिय़ों के लिये भी जीवन दायिनी स्वरूप में सौंप पायेंगे।" 
- शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्यप्रदेश
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"यह पूरी तरह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक यात्रा थी। इसके माध्यम से लाखों नागरिकों की नदी संरक्षण के प्रति जन-जागृति और चेतना बढ़ी है। अब हर नागरिक इस बात के प्रति सजग है कि नर्मदा नदी में एक भी बूँद गंदा पानी नहीं मिलने देंगे। 
- डॉ. गौरीशंकर शेजवार, वन मंत्री एवं नर्मदा सेवा यात्रा के संयोजक
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माँ नर्मदा का महात्म :
नर्मदा भारत की सबसे प्राचीन नदियों में से एक है। पुण्यदायिनी मां नर्मदा का जन्मदिवस प्रतिवर्ष माघ शुक्ल सप्तमी को 'नर्मदा जयंती महोत्सव' के रूप में मनाया जाता है। नर्मदा की महत्ता को इस प्रकार बताया गया है कि जो पुण्य गंगा में स्नान करने से या यमुना का आचमन करने से मिलते हैं, वह नर्मदा के नाम स्मरण करने मात्र से मिल जाता है। नर्मदा नदी का उल्लेख अनेक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। स्कंद पुराण में नर्मदा का वर्णन रेवा खंड के अंतर्गत किया गया है। कालिदास के 'मेघदूतम्' में नर्मदा को रेवा का संबोधन मिला है। रामायण तथा महाभारत में भी अनेक स्थान पर नर्मदा के महात्म को बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, कूर्म पुराण, नारदीय पुराण और अग्नि पुराण में भी नर्मदा का जिक्र आया है। नर्मदा की धार्मिक महत्ता के कारण प्रदेश का बहुत बड़ा वर्ग नर्मदा के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है। नर्मदा के प्रति श्रद्धाभाव रखने वाले लाखों लोग १५ मई को अमरकंटक में पहुँचे थे। निश्चित ही उन्हें लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने प्रयास किए होंगे, सरकारी स्तर भी लोगों को जुटाया गया होगा, लेकिन अधिकतर ऐसे लोग थे, जो नर्मदा की सेवा के संकल्प के साथ नर्मदा सेवा यात्रा के पूर्णता कार्यक्रम में उपस्थित थे।
(पाञ्चजन्य के 28 मई, 2017 को प्रकाशित अंक में प्रकाशित रिपोर्ट )

शनिवार, 20 मई 2017

सूना हो गया नदी का घर

 माँ  नर्मदा के सेवक और उसके सुयोग्य बेटे अनिल माधव दवे के देवलोक चले जाने की खबर ऐसी है कि सहसा उस पर भरोसा करना कठिन होता है। उनका नाम आते ही सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा, शांत चित्त और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर व्यक्तित्व हमारे सामने उपस्थित होता है। उनके जिक्र के साथ नकारात्मक भाव, उदासी और खालीपन मेल नहीं खाता। इसीलिए हृदयघात के कारण उनकी मृत्यु की खबर अविश्वसनीय प्रतीत होती है। लेकिन, सत्य यही है। अनेक संभावनाओं से भरा एक संत राजनेता भारतीय राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में रचनात्मकता की एक बड़ी लकीर खींचकर चला गया है। स्व. अनिल माधव दवे की पहचान आम राजनेता की नहीं थी। वह धवल राजनीति के पैरोकार थे। लिखने-पढ़ने वाले और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले राजनेता के तौर पर उनको याद किया जाएगा। वह जब किसी गंभीर विषय पर बोल रहे होते थे, तब सभा/संगोष्ठी में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ध्यानपूर्वक उनको सुनता था। उनकी वाणी में गजब का माधुर्य था। कर्म एवं वचन में समानता होने और गहरा अध्ययन होने के कारण, उनकी कही बातों का गहरा असर होता था। उनके प्रति एक बौद्धिक आकर्षण था। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में एक ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी किसी फलदार वृक्ष की भांति उनका स्वभाव सदैव विनम्र ही रहता था। यही कारण था कि उनका सम्मान भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं, अपितु विरोधी राजनीतिक दल में भी था। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय सभी विचारधारा के लोग और संगठन भी उनसे विचार-विमर्श करते थे। 

शनिवार, 13 मई 2017

धर्म की आड़ में अधर्म कब तक?

 तीन  तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार से सुनवाई शुरू कर दी है। तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चला रही महिलाओं को उम्मीद है कि इस बार उन्हें न्यायालय से न्याय मिलेगा। (पढ़ें - महिलाओं के हित में आए निर्णय) मुस्लिम महिलाओं ने न्याय के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में उन्होंने हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी किया है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय भी महिला सम्मान और मुस्लिम धर्म से जुड़े इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। पहले दिन की कार्यवाही यही बताती है। आश्चर्य है कि न्यायालय को मानवीय और संवैधानिक अधिकारों के मामले में धार्मिक तुष्टीकरण का ध्यान रखना पड़ रहा है। वरना क्या कारण था कि पाँच न्यायमूर्तियों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ को कहना पड़ा कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या तीन तलाक की परंपरा इस्लाम धर्म का मूल तत्व है? पीठ ने यह भी कहा है कि हम इस मुद्दे पर भी विचार करेंगे कि क्या तीन तलाक सांस्कारिक मामला है और क्या इसे मौलिक अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है? हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही से उम्मीद बंध रही है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलेगा। न्यायालय ने तीन तलाक के संबंध में अनेक कठोर टिप्पणियाँ की हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफन करने जैसा है।' मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बहुविवाह मामले में फिलहाल बहस नहीं होगी। पीठ तीन तलाक की संवैधानिकता को परखेगी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मुद्दे को देखेंगे कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है? क्या उसे मूल अधिकार के तौर पर लागू किया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित तय हो जाता है और कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि तलाक धर्म का मूल तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल को नहीं परखेगा।

शुक्रवार, 12 मई 2017

उचित नहीं आआपा का 'राजनीतिक अभ्यास'

 आम  आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में जिस प्रकार से ईवीएम से छेड़छाड़ का प्रदर्शन किया है, उसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आआपा सरकार ने दो संवैधानिक संस्थाओं (विधानसभा और चुनाव आयोग) का एक तरह से उपहास उड़ाया है। आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज जब ईवीएम जैसी दिखने वाली मशीन पर मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रदर्शन कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर सरकार के तमाम मंत्री-नेता सदन में हँस रहे थे। यह हँसी किसलिए थी? क्या इसलिए कि उन्होंने अपने दावे को सच करके दिखाया? क्या इसलिए कि उन्होंने भाजपा की जीत को धोखेबाजी सिद्ध कर दिया? क्या इसलिए कि उन्होंने चुनाव आयोग को झूठा साबित कर दिया? आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल और समूची पार्टी की इस हँसी में दंभ था, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति थी, धूर्तता थी और नकलीपन था। भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देने की जगह विधानसभा में खेले गए इस नाटक से आआपा की कलई पूरी तरह खुल कर सामने आ गई है।

सोमवार, 8 मई 2017

स्वच्छता की ओर बढ़ते कदम

 एक  बार फिर केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत किए गए सर्वे के परिणाम देश के सामने रखे हैं। सर्वे के आंकड़ों पर भरोसा करें, तब यह स्पष्ट है कि हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। दरअसल, स्वच्छता अभियान के परिणाम पर भरोसा करने का कारण मात्र आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमने अनुभव किया है कि धीरे-धीरे स्वच्छता हमारी आदत होती जा रही है। अब हम यहाँ-वहाँ कचरा फेंकने से बचते हैं, जबकि पहले कहीं भी कचरा फेंकने में कोई संकोच नहीं होता था। स्वच्छता अभियान के कारण हमारे मन का संस्कार हुआ है। स्वच्छता के प्रति जागरूक करने वाले सार्वजनिक हित के विज्ञापन और लघु फिल्मों ने हमारे मन को चेताया है। स्वच्छ शहरों की रैंकिंग घोषित करने की सरकार की नीति का भी कहीं न कहीं प्रभाव पड़ रहा है। जागरूक नागरिक और शहर की सरकारें चाहती हैं कि उनके शहर के माथे पर 'अस्वच्छ शहर' का कलंक नहीं लगे। इस तथ्य को हम सर्वे के परिणाम में अनुभूत कर सकते हैं। पूर्व के सर्वेक्षणों में जो शहर स्वच्छता के मामले में बहुत पीछे थे, इस सर्वे में उन्होंने अपनी स्थिति सुधारी है। अर्थात् हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। हालाँकि हमें पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करना होगा कि तस्वीर जितनी उजली दिखाई जा रही है, उतनी है नहीं।

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