शनिवार, 19 अगस्त 2017

नाम बदलने से दिक्कत कब होती है और कब नहीं

 उत्तरप्रदेश  के प्रमुख रेलवे स्टेशन 'मुगलसराय' का नाम भारतीय विचारक 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय' के नाम पर क्या रखा गया, प्रदेश के गैर-भाजपा दलों को ही नहीं, अपितु देशभर में तथाकथित सेकुलर बुद्धिवादियों को भी विरोध करने का दौरा पड़ गया है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध करना ही अपना धर्म समझने वाले गैर-भाजपा दल और कथित बुद्धिवादी अपने थके हुए तर्कों के सहारे भाजपा की नीयत को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। साथ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को भी लपेटने का प्रयास कर रहे हैं। 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन' के विरोध में दिए जा रहे तर्क विरोधियों की मानसिकता और उनके वैचारिक अंधत्व को प्रदर्शित करते हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को थोप रही है और इसके लिए वह मुगल संस्कृति को मिटाने का काम कर रही है। मुस्लिम समाज में भाजपा के लिए नफरत और अपने लिए प्रेम उत्पन्न करने के लिए विरोधी यह भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा की विचारधारा मुस्लिम विरोधी है, इसलिए चिह्नित करके मुस्लिम नामों को मिटाया जा रहा है। बड़े उत्साहित होकर वह यह भी पूछ रहे हैं कि भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान क्या है? मजेदार बात यह है कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट या दूसरे दलों की सरकारें जब नाम बदलती हैं, तब इस तरह के प्रश्न नहीं उठते। सबको पीड़ा उसी समय होती है, जब भाजपा सरकार नाम बदलती है। भारतीय राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है कि मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने पर लगाए जा रहे आरोप और पूछे जा रहे प्रश्न, बचकाने और अपरिपक्व हैं। 
          सबसे पहले इस तर्क को कसौटी पर कस कर परखते हैं, जिसमें कहा गया है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर मुस्लिम पहचान को मिटाने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि सांस्कृति राष्ट्रवाद कोई बुरी बात नहीं है। कम्युनिस्ट विचारकों के अभारतीय दिमागों ने 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को गलत अर्थों में प्रस्तुत करने के षड्यंत्र रचे हैं। हालाँकि उनकी तमाम कोशिशें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समक्ष परास्त हुई हैं। भारतीय जनता पार्टी पर यह आरोप इसलिए लगाया जाता है, क्योंकि उसकी पहचान 'हिंदू पार्टी' की है। इसी पहचान के कारण पहली फुरसत में यह आरोप सत्य प्रतीत होता है। लेकिन, यह सच नहीं। सामान्य जीवन में जिस प्रकार की उदारता हिंदू समाज दिखाता है, वही उदारता भाजपा की नीति में भी दिखती है। भाजपा सरकार ने इससे पहले दिल्ली में 'औरंगजेब रोड' का नाम बदला था। अब विचार करें कि क्या भाजपा ने औरंगजेब की जगह सड़क का नाम किसी हिंदू शासक के नाम पर किया? उत्तर है- नहीं। भाजपा ने क्रूर औरंगजेब की जगह उस सड़क को महान व्यक्ति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम किया। क्या पूर्व राष्ट्रपति कलाम किसी भी प्रकार औरंगजेब से कम मुसलमान थे? इसके बाद दिल्ली में ही राष्ट्रपति भवन के नजदीक 'डलहौजी रोड' का नाम बदला गया। आश्चर्य की बात है कि आजादी के 70 साल बाद तक देश की राजधानी में एक सड़क उस अंग्रेज गवर्नर जनरल के नाम पर बनी रही, जिसने यहाँ के लोगों पर अत्याचार किया। आजादी के बाद कितने ही नेता उस सड़क से गुजरे होंगे, किंतु किसी का मन आहत नहीं हुआ। दरअसल, यह मानसिक औपनिवेशकता की पहचान है। हमारे लोग अब भी गुलामी की स्मृतियों को कलेजे से लगाए रखने में आनंदित होते हैं। बहरहाल, भाजपा सरकार ने जब 'डलहौजी रोड' का नाम बदला तब भी किसी हिंदू शासक या महापुरुष के नाम का चुनाव नहीं किया। डलहौजी रोड का नाम 'दारा शिकोह मार्ग' करके मुस्लिम समाज के उस शासक की स्मृतियों को संजोया गया, जो उदारमना था। दारा शिकोह हिंदू-मुस्लिम एकता की इमारत को मजबूत करने वाले श्रेष्ठ शिल्पी का नाम है। जबकि भाजपा चाहती तो इस सड़क का नामकरण हिंदू व्यक्ति के नाम पर कर सकती थी। ऐसा करते समय उस पर 'मुस्लिम नाम मिटाने' का आरोप भी नहीं लगता। स्पष्ट है कि भाजपा मुस्लिम नामों को नहीं मिटा रही है, बल्कि उन नामों को हटा रही है, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को चोट पहुँचाई थी। भाजपा का यह चेहरा उन लोगों को दिखाई नहीं देगा, जिन्होंने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है। 
          ऐसा नहीं है कि भारत में नाम बदलने की परंपरा का शुभारंभ भाजपा सरकारों ने किया है। कांग्रेस, कम्युनिस्ट और अन्य दल की सरकारें भी अपनी सुविधा के हिसाब से नाम बदलती रही हैं। किंतु उस दौरान किसी ने इस तरह हाय-तौबा नहीं मचाई। कांग्रेस ने ज्यादातर अवसरों पर 'नेहरू परिवार' के नाम पर पट्टिकाएं ठोंकी हैं। देशभर की इमारतें, सड़कें, बस अड्डे, विमानपत्तन, शहरों में बस्तियों के नाम और सरकारी योजनाओं के नाम इस बात की गवाही देते हैं। दिल्ली में ही कनॉट सर्कल का नाम इंदिरा गांधी चौक और कनॉट प्लेस का नाम राजीव चौक किया गया। जब नेहरू परिवार पर जगहों के नामकरण हुए, कहीं कोई प्रखर विरोध का सुर नहीं आया। जहाँ-तहाँ कम्युनिस्टों की सरकारें रहीं, वहाँ नामकरण की परंपरा देख लीजिए। अभारतीय नामों पर सड़क और भवन मिल जाएंगे। पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने अमेरिका को चिढ़ाने के लिए ही एक सड़क का नामकरण वियतनाम के राष्ट्रपति 'हो ची मिन्ह सरानी' के नाम पर कर दिया। दरअसल, उस सड़क पर अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास था। नाम परिवर्तन का निर्णय लेने में इससे अधिक अपरिपक्वता क्या हो सकती है? गैर-भाजपा सरकारों के इन निर्णयों पर उस तरह से कभी भी विरोध नहीं हुआ, जैसा कि भाजपा सरकारों के निर्णयों पर होता है। विदेशी नामों पर आपत्ति दर्ज नहीं करने वाले लोगों को आखिर भारतीयता के प्रतीकों पर पीड़ा क्यों होती है? क्या यह माना जाना चाहिए कि उनकी निष्ठा भारतीय संस्कृति में नहीं है? गैर-भाजपाई राजनीतिक दलों का यह व्यवहार ही भारत के प्रति उनकी निष्ठा को संदिग्ध बनाता है।  
          मुगलसराय के नाम पर छाती पीट रहे लोग क्या यह बता सकते हैं कि 'मुगलसराय' नाम के साथ कौन-सा गौरव का विषय जुड़ा है? मुगलसराय के प्रति भावनात्मक लगाव का कारण क्या है? क्या यह लोग बता सकते हैं कि उन्हें भारतीय राजनीति में शुचिता के प्रतीक पुरुष पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम से क्या दिक्कत है? दुनिया को 'एकात्म मानवदर्शन' जैसा अद्भुत विचार देने वाले अजातशत्रु महापुरुष दीनदयाल उपाध्याय की हत्या करके वैचारिक विरोधियों ने उनका शव इसी मुगलसराय स्टेशन के पोल क्रमांक-1276 फेंक दिया था। मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भाजपा ने कोई अस्वाभाविक काम नहीं किया है। यह कार्य कांग्रेस सरकार को ही वर्ष 1968 में या उसके तत्काल बाद कर लेना चाहिए था। परंतु, खुद को उदारवादी पार्टी कहने वाली कांग्रेस ने अपनी संवेदनशीलता का प्रदर्शन नहीं किया। उसके लिए गाँधी-नेहरू परिवार के बाहर कोई महापुरुष नहीं हुए, जिनकी स्मृति को चिरस्थायी करने के प्रयास किए जाते। बहरहाल, अपने प्रेरणा पुरुष को श्रद्धांजलि देने के लिए भाजपा को 49 वर्ष का लम्बा इंतजार करना पड़ा। कितना अच्छा होता कि वैचारिक असहिष्णुता का प्रदर्शन करने वाले दल और बुद्धिवादी दीनदयाल उपाध्याय जैसे नाम का सम्मान करते और सरकार के इस निर्णय पर बेकार की बहस खड़ी करने से बचते। किन्तु, इसके लिए उदार और बड़े दिल की जरूरत होती है। राज्यसभा में इस बहस का जवाब देते समय अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय राज्यमंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने उचित ही कहा- 'यह लोग मुगलों के नाम पर स्टेशन का नाम रख लेंगे, लेकिन दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर नहीं रखेंगे।' भारतीयता के विरोध की यह आवाजें नक्कारखाने में तूती की तरह गूँज रही हैं, जिन्हें देश में कोई सुनने को तैयार नहीं हैं। भारत बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह बदलाव 'भारतीयता' के अनुरूप है।
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सोमवार, 14 अगस्त 2017

दु:खद है बच्चों की मौत

 गोरखपुर  के बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में छह दिनों के भीतर 60 से ज्यादा बच्चों की मौत हमारी अव्यवस्थाओं की सच्चाई है। एक ओर हम आजादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारियां कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चे मर रहे हैं। बच्चों की जिंदगी इस तरह जाया होना, हमारे लिए कलंक है। देश में बीमारी या अभावों के कारण एक भी बच्चे की मृत्यु '70 साल के आजाद भारत' के लिए चिंता की बात है। किसी भी प्रकार का तर्क हमें बच्चों की मौत की जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से या फिर किसी बीमारी से ही क्यों न हो, इस तरह बच्चों या किसी भी उम्र के व्यक्ति की मौत हो जाना, बहुत दु:खद और दर्दनाक है। गोरखपुर की इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि बच्चों की मौत के मामले पर मन में पूरी संवेदनशीलता रखें और व्यवहार में कठोरता। संवेदनशीलता, बच्चों और उनके परिवार के प्रति। कठोरता, लापरवाह और भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति। दोषियों को दण्डित करना जरूरी है। वरना कभी न कभी फिर से हम पर दु:खों का पहाड़ टूटेगा।

रविवार, 13 अगस्त 2017

वैचारिक संघर्ष नहीं, केरल में है लाल आतंक

राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि केरल में किस तरह लाल आतंक हावी है, केरल में दिखाई नहीं देता क़ानून का राज

 केरल  पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के 'प्रैक्टिकल' की प्रयोगशाला बन गया है। केरल में जिस तरह से वैचारिक असहमतियों को खत्म किया जा रहा है, वह एक तरह से कम्युनिस्ट विचार के असल व्यवहार का प्रदर्शन है। केरल में जब से कम्युनिस्ट सत्ता में आए हैं, तब से कानून का राज अनुपस्थिति दिखाई दे रहा है। जिस तरह चिह्नित करके राष्ट्रीय विचार के साथ जुड़े लोगों की हत्याएं की जा रही हैं, उसे देख कर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि केरल में जंगलराज आ गया है। लाल आतंक अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। 'ईश्वर का घर' किसी बूचडख़ाने में तब्दील होता जा रहा है। 29 जुलाई को एक बार फिर गुण्डों की भीड़ ने घेरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश की हत्या कर दी। हिंसक भीड़ ने पहले 34 वर्षीय राजेश की हॉकी स्टिक से क्रूरता पिटाई की और फिर उनका हाथ काट दिया। राजेश तकरीबन 20 मिनट तक सड़क पर तड़पते रहे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, किंतु उनका जीवन नहीं बचाया जा सका। राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि कितनी नृशंता से उनकी हत्या की गई।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हामिद साहब

दैनिक समाचार पत्र राजएक्सप्रेस में प्रकाशित
 निवर्तमान  उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।

शनिवार, 5 अगस्त 2017

पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' जरूरी

 मौजूदा  दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, जब उसकी खबरों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितनी ही सत्य खबर प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा। समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। बहरहाल, यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए। किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। वास्तव में यही पत्रकारिता का राष्ट्रीय स्वरूप है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता कुछ और नहीं, यही ध्येय है। राष्ट्र सबसे पहले का असल अर्थ भी यही है कि देशवासियों के हित का ध्यान रखा जाए।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

'जय श्री राम' पर फतवा

 भारत  में 'जय श्री राम' कहने पर फतवे जारी होने लगें, तब यह विचार जरूर करना चाहिए कि क्या देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? सभी मत-पंथ के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि उनका पंथ सर्व-धर्म सद्भाव की सीख देता है। प्रत्येक संप्रदाय के रहनुमा कहते हैं कि उनके पंथ की प्राथमिक शिक्षाओं में शामिल है कि औरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए। अगर इस्लाम के संबंध में भी यह सच है, तब प्रश्न उठता है कि 'जय श्री राम' बोलने वाले बिहार सरकार के मंत्री खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी होना चाहिए था या फिर खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मुफ्ती सोहेल कासमी का बहिष्कार होना चाहिए था? मुफ्ती फतवा जारी करने तक ही नहीं रुका है, बल्कि उसने कहा है कि राम और रहीम एक साथ नहीं रह सकते। यह कैसी अलगाववादी सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या कुरान में यह लिखा है कि दो विभिन्न विचार एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए नहीं रह सकते?

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

मॉब लिंचिंग और उसका सच

 मौजूदा  समय में विपक्ष मुद्दा विहीन और भ्रमित दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि बीते सोमवार को संसद में 'मॉब लिंचिंग' जैसे बनावटी मुद्दे पर सरकार को घेरने का असफल प्रयास कांग्रेस ने किया। निश्चित ही भीड द्वारा की जा रही घटनाएं सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए और इस प्रवृत्ति पर कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन, यह जिम्मेदारी किसकी है? क्या केंद्र सरकार 'मॉब लिंचिंग' की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है? क्या यह राज्यों की कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला नहीं है? राज्यों के मामले में केंद्र सरकार का दखल देना क्या उचित होगा? यह भी देखना होगा कि 'मॉब लिंचिंग' की घटनाएं अभी अचानक होने लगी हैं या फिर इस प्रकार की घटनाओं का अपना इतिहास है? जब कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने मॉब लिंचिंग के मुद्दे को संसद में उठाया, तब उनसे सत्ता पक्ष ने इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर चाहे। स्वाभाविक ही कांग्रेस के पास उक्त प्रश्नों के उत्तर नहीं थे।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

राष्ट्रगीत के सम्मान में न्यायालय का निर्णय

 भारतीय  संविधान में 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने 'वन्देमातरम्' गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार किया गया, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वंदेमातरम् की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 'राष्ट्रगीत' के रूप में इसकी घोषणा की। बंगाल के कांतल पाडा गाँव में 7 नवंबर, 1976 को रचा गया यह गीत 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया। गीत के भाव ऐसे थे कि राष्ट्रऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का लिखा 'वंदेमातरम्' स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिवीरों का मंत्र बन गया था। 1905 में जब अंग्रेज बंगाल के विभाजन का षड्यंत्र रच रहे थे, तब वंदेमातरम् ही इस विभाजन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बुलंद नारा बन गया था। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने स्वयं कई सभाओं में वंदेमातरम् गाकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जन सामान्य को आंदोलित किया। 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक-सी

 पिछले  कुछ समय से भारत और चीन के साथ सीमा विवाद गहराया हुआ है। दरअसल, चीन की विस्तावादी नीति के मार्ग में भारत मजबूती के साथ खड़ा हो गया है। चीन सिक्कम क्षेत्र के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाना चाहता है, जिस पर भारत को बहुत आपत्ति है। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन को आपस में जोड़ता है। यह स्थल सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भूटान भी चीन की विस्तारवादी मानसिकता का डटकर विरोध कर रहा है। बहरहाल, सीमा पर भारत के सख्त और स्पष्ट रुख से चीन का मीडिया बौखला गया है। चीनी मीडिया लगातार भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। चीनी मीडिया ने पहले भारत को 1962 के युद्ध की धौंस दिखाते हुए गीदड़ भभकी दी। चीनी मीडिया ने सोचा था कि भारत उसकी धमकी से डर जाएगा और उसके मार्ग से हट जाएगा। सीमा पर उसको मनमर्जी करने देगा। लेकिन, चीन की यह गीदड़ भभकी किसी काम नहीं आई। उसके बाद भी चीनी मीडिया भारत के संदर्भ में अनर्गल लिखता रहा। लेकिन, अभी हाल में चीनी मीडिया में जिस तरह की टिप्पणी आई है, वह चौंकाने वाली है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है- ''भारत में उभर रहे 'हिंदू राष्ट्रवाद' की वजह से भारत-चीन के बीच युद्ध हो सकता है। राष्ट्रवादी उत्साह में 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन के खिलाफ बदला लेने की मांग भारत के भीतर उठ रही है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को चुने जाने से देश में राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा मिला है।''

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

कितना आसान है हिंदुत्व का अपमान

 अपनी  ही भूमि पर हिंदुत्व का अपमान आसानी से किया जा सकता है, इस बात को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल ने सिद्ध कर दिया। राज्यसभा में बुधवार को उन्होंने हिंदुओं के भगवान राम, माता जानकी और भगवान विष्णु को लेकर अमर्यादित टिप्पणी कर दी। गली-चौराहे के नेता की तरह बोलते हुए उन्होंने हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम, माता जानकी और विष्णु को शराब से जोड़ दिया। उनकी टिप्पणी सरासर हिंदुत्व का अपमान है। क्या यह सीधे तौर पर हिंदू आस्थाओं पर चोट नहीं है? बिना विचार किए कही गई अपनी इस टिप्पणी को लेकर नरेश अग्रवाल को तनिक भी अफसोस नहीं हुआ। उन्हें कतई यह नहीं लगा कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने अग्रवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे माफी की माँग की तब उन्होंने साफ-तौर पर इनकार कर दिया। बाद में, बे-मन से कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना को ठेस पहुंची है, तो वह उसे वापस लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अपनी गलती के लिए कोई मलाल नहीं था।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

एक राष्ट्र-एक ध्वज की कल्पना के विरुद्ध है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की मंशा

 कर्नाटक  की कांग्रेस सरकार राज्य के लिए अलग झंडा बनाने की ओर बढ़ रही है। उसने कर्नाटक का ध्वज तय करने के लिए नौ सदस्यों की एक समिति भी गठित कर दी है। यह समिति झंडा का आकल्पन और उसके संवैधानिक पहलुओं की पड़ताल करेगी। फिलहाल तो केंद्र सरकार ने संविधान का हवाला देकर कर्नाटक के एम. सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की गैरजरूरी माँग को ठुकरा दिया है। राज्य के लिए अलग ध्वज की माँग न केवल बेतुकी है, बल्कि यह अलगाव और विभेद की भावना को उत्पन्न करने वाला अविवेक से भरा कदम भी है। हमने देखा है कि हिंदी भाषा के समानांतर भारतीय भाषाओं की अस्मिता के प्रश्न जब राजनीतिक दृष्टिकोण से उठाए गए, तब भारतीय भाषाओं का आपसी सौहार्द कैसे द्वेष में बदल गया?

रविवार, 16 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-2

तुष्टीकरण की आग में जल रहे हैं पश्चिम बंगाल के हिंदू

कबीर चबूतरा में लेखक लोकेन्द्र सिंह
 रामकृष्ण  परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और रविन्द्र नाथ ठाकुर की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज सांप्रदायिकता की आग में जल रही है। वहाँ हिंदू समुदाय का जीना मुहाल हो गया है। यह स्थितियाँ अचानक नहीं बनी हैं। बल्कि सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज को हाशिए पर धकेला गया है। यह काम पहले कम्युनिस्ट सरकार की सरपरस्ती में संचालित हुआ और अब ममता बनर्जी की सरकार चार कदम आगे निकल गई है। आज परिणाम यह है कि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यक ही नहीं हुआ है, अपितु कई क्षेत्र हिंदू विहीन हो चुके हैं। राजनीतिक दलों की देखरेख में बांग्लादेशी मुस्लिमों ने सीमावर्ती हिस्सों में जो घुसपैठ की जा रही है, उसके भयावह परिणामों की आहट अब सुनाई देने लगी है। मालदा, उत्तरी परगना, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे इलाकों में जब चाहे समुदाय विशेष हंगामा खड़ा कर देता है। घर-दुकानें जला दी जाती हैं। थाना फूंकने में भी उग्रवादी भीड़ को हिचक नहीं होती है। दुर्गा पूजा की शोभायात्राओं को रोक दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की यह स्थिति बताती है कि सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध यह राज्य सांप्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की आग में जल रहा है।  सांप्रदायिकता की इस आग से अब पश्चिम बंगाल का हिंदू झुलस रहा है। अपने उदारवादी स्वभाव के कारण इस प्रकार के षड्यंत्रों को अनदेखा करने वाले हिंदू समाज का मानस अब बदल रहा है। भविष्य में पश्चिम बंगाल में इस बदलाव के परिणाम दिखाई दे सकते हैं। आप इस संस्मरण से भी समझ सकते हैं कि कैसे पश्चिम बंगाल का हिंदू जाग रहा है। उसे अपने हित-अहित दिखाई देने लगे हैं।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-1

मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाला, 
लिख-गा रहा है नर्मदा के गीत

धूनी-पानी में उदासीन संत रामदास जी महाराज के साथ लोकेन्द्र सिंह
  ऐसा  कहा जाता है- 'जो जवानी में कम्युनिस्ट न हो, समझो उसके पास दिल नहीं और जो बुढ़ापे तक कम्युनिस्ट रह जाए, समझो उसके पास दिमाग नहीं।' यह कहना कितना उचित है और कितना नहीं, यह विमर्श का अलग विषय है। हालाँकि मैं यह नहीं मानता, क्योंकि मुझे तो जवानी में भी कम्युनिज्म आकर्षित नहीं कर सका। उसका कारण है कि संसार की बेहतरी के लिए कम्युनिज्म से ज्यादा बेहतर मार्ग हमारी भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में दिखाया गया है। कोई व्यक्ति जवानी में कम्युनिस्ट क्यों होता और बाद में उससे विमुख क्यों हो जाता है? इसके पीछे का कारण बड़ा स्पष्ट है। एक समय में देश के लगभग सभी शिक्षा संस्थानों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ थी, उनका वर्चस्व था। यह स्थिति अब भी ज्यादा नहीं बदली है। जब कोई युवा उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालयों में आता है, तब वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षक उसके निर्मल मन-मस्तिष्क में कम्युनिज्म का बीज रोपकर रोज उसको सींचते हैं। बचपन से वह जिन सामाजिक मूल्यों के साथ बड़ा हुआ, जिन परंपराओं का पालन करने में उसे आनंद आया, माँ के साथ मंदिर में आने-जाने से भगवान के जिन भजनों में उसका मन रमता था, लेकिन जब उसके दिमाग में कम्युनिज्म विचारधारा का बीज अंकुरित होकर आकार लेने लगता है, तब वह इन्हीं सबसे घृणा की हद तक नफरत करने लगता है। इस हकीकत को समझने के लिए फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' को देखा जा सकता है। बहरहाल, जब वह नौजवान महाविद्यालय से निकलकर असल जिंदगी में आता है, तब उसे कम्युनिज्म की सब अवधारणाएं खोखलीं और अव्यवहारिक लगने लगती हैं। कॉलेज में दिए जा रहे कम्युनिज्म के 'डोज' की जकडऩ से यहाँ उसके विवेक को आजादी मिलती है। उसका विवेक जागृत होता है, वह स्वतंत्रता के साथ विचार करता है। परिणाम यह होता है कि कुछ समय पहले जो विचार क्रांति के लिए उसकी रगों में उबाल ला रहा था, अब उस विचार से उसे बेरुखी हो जाती है। वह विचारधारा उसे मृत प्रतीत होती है। यानी विवेक जागृत होने पर कम्युनिज्म का भूत उतर जाता है। 

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सद्भाव के दृश्य

 भारतीय  संस्कृति में गुरु पूर्णिमा/ व्यास पूर्णिमा का बहुत महत्त्व है। समूचे भारत में यह उत्सव बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बीते रविवार को भी देशभर में गुरु पूर्णिमा उत्सव व्यापक स्तर पर मनाया गया। इस दौरान धर्म नगरी काशी से सुंदर और सार्थक चित्र सामने आए हैं। यह चित्र दो समुदायों को जोड़ने वाले हैं। बनारस में गुरु पूर्णिमा का उत्सव हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी मनाया। हिंदू उत्सवों में मुस्लिम चेहरों को देखना दुर्लभ होता है। अमूमन ईद और इफ्तार पार्टी में बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग शामिल होते हैं। अनेक स्थानों पर इफ्तार पार्टी का आयोजन ही हिंदू समाज की ओर से किया जाता है। लेकिन, हिंदू उत्सवों में मुस्लिम सहभागिता कम ही होती है। इसलिए जब देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के द्वारा दोनों संप्रदायों के बीच वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तब इस प्रकार के दृश्य एक उम्मीद की तरह उपस्थित होते हैं। दो समुदायों को नजदीक लाते हैं। आपसी सौहार्द का निर्माण करते हैं।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत

 पराजय  का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया। शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को 'ईश्वर के प्यारे राष्ट्र' का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था। वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव पड़ी थी। इसलिए हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्राणोत्सर्ग को यहूदी आज भी स्मरण करते हैं। इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलेम, रामलेह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है। इजरायल के बच्चों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं। प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के महापौर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर हाइफा दिवस मनाते हैं। जहाँ, एक तरफ हमारे लिए गौरव की बात है कि इजरायल के लोग भारतीय योद्धाओं के बलिदान को अब तक सम्मान दे रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर दु:ख की बात है कि अपने ही देश भारत में इस महान जीत के नायकों के शौर्य के किस्से पढ़ाये और सुनाये नहीं जाते हैं। हालाँकि भारतीय सेना जरूर 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है। अब हम समझ सकते हैं कि भारत और इजरायल के रिश्तों में सार्वजनिक दूरी के बाद भी जो गर्माहट बनी रही, वह भारतीय सैनिकों रक्त की गर्मी से है।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

साहित्य में आचार्य सब होते हैं, 'काका' एक ही हैं

 साहित्य  में सबके अपने आचार्य और गुरु होते हैं, जिनसे हम सीखते हैं और अपने रचना कर्म को आगे बढ़ाते हैं। हम जिसके सान्निध्य में साहित्य का अध्ययन करते हैं, अमूमन वह कोई प्रख्यात साहित्यकार या फिर हमारा ही कोई प्रिय लेखक या कवि होता। इनके अपने नियम और कायदे-कानून होते हैं। इनके अपने नाज और नखरे भी होते हैं। यह सरल और सहज 'काका' नहीं हो सकते। क्योंकि, काका एक ही हैं-श्रीधर पराडकर। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराडकर देश के प्रख्यात साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। हम सब उन्हें प्रेम से 'काका' कहते हैं और वे हैं भी हम सबके काका। साहित्य का ककहरा सीख रहे हम लोगों पर काका अपार स्नेह बरसाते हैं। काका श्रीधर पराडकर का व्यक्तित्व आकर्षक है। वे सात्विक ऊर्जा के स्रोत भी हैं। किसी कहानी की रचना के दौरान यदि आप बहुत उलझ गए हैं और उस उलझन से मन बहुत थकान महसूस कर रहा है, उस स्थिति में यदि आप काका के पास पहुँच जाएं, तब निश्चित ही आप सुकून पाएंगे। सात्विक ऊर्जा से भर उठेंगे। उनके चेहरे पर सदैव बनी रहने वाली बाल-सुलभ मुस्कान आपका भी तनाव खत्म कर देगी। उनके व्यक्तित्व का आकर्षण ऐसा है कि जो एक बार उनके संपर्क में आता है, हमेशा के लिए उनका होकर रह जाता है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

मध्यप्रदेश में पौधारोपण का विश्व कीर्तिमान

 प्रकृति  के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल-जंगल के बिना जन का जीवन संभव है क्या? साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस प्रश्न का उत्तर जानता है। लेकिन, लालच से वशीभूत आदमी प्रकृति का संवर्द्धन करने की जगह निरंतर उसका शोषण कर रहा है। हालाँकि वास्तविकता यही है कि वह प्रकृति को चोट नहीं पहुँचा रहा है, वरन स्वयं के जीवन के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कर रहा है। देर से ही सही अब दुनिया को यह बात समझ आने लगी है। पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया में चल रहा चिंतन इस बात का प्रमाण है। भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में भी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं। प्रमुख नदियों का अस्तित्व संकट में है। जंगल साफ हो रहे हैं। पानी का संकट है। हवा प्रदूषित है। वन्य जीवों का जीवन खतरे में आ गया है। पर्यावरण बचाने की दिशा में गैर-सरकारी संगठन और पर्यावरणविद् एवं प्रेमी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ प्रयास कर रहे हैं। लम्बे संघर्ष के बाद उनके प्रयासों का परिणाम दिखाई भी दिया है। पर्यावरण के मसले पर समाज जाग्रत हुआ है। प्रकृति के प्रति लोगों को अपने कर्तव्य याद आ रहे हैं। पर्यावरण चिंतकों की ईमानदार आवाजों का ही परिणाम है कि सरकारों ने भी 'वोटबैंक की पॉलिटिक्स' के नजरिए से शुष्क क्षेत्र पर्यावरण पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदी राजनीति का दस्तावेज 'मोदी युग'

 यह  मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हमारे समय में भारतीय राजनीति के केंद्र बिन्दु नरेन्द्र मोदी हैं। राजनीतिक विमर्श उनसे शुरू होकर उन पर ही खत्म हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से लेकर बाकि राजनीतिक दलों की राजनीतिक रणनीति में नरेन्द्र मोदी प्राथमिक तत्व हैं। विधानसभा के चुनाव हों या फिर नगरीय निकायों के चुनाव, भाजपा मोदी नाम का दोहन करने की योजना बनाती है, जबकि दूसरी पार्टियां मोदी की काट तलाशती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक जहाँ प्रत्येक सफलता को नरेन्द्र मोदी के प्रभाव और योजना से जोड़कर देखते हैं, वहीं मोदी आलोचक (विरोधी) प्रत्येक नकारात्मक घटना के पीछे मोदी को प्रमुख कारक मानते हैं। इसलिए जब राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी भारतीय राजनीति के वर्तमान समय को 'मोदी युग' लिख रहे हैं, तब वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अपनी नई पुस्तक 'मोदी युग : संसदीय लोकतंत्र का नया अध्याय' में उन्होंने वर्तमान समय को उचित ही संज्ञा दी है। ध्यान कीजिए, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को कब और कितना 'मनमोहन सरकार' कहा जाता था? उसे तो संप्रग के अंग्रेजी नाम 'यूनाइटेड प्रोगेसिव अलाइंस' के संक्षिप्त नाम 'यूपीए सरकार' से ही जाना जाता था। इसलिए जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और भाजपानीत सरकार को 'मोदी सरकार' कहा जा रहा है, तब कहाँ संदेह रह जाता है कि भारतीय राजनीति यह वक्त 'मोदीमय' है। हमें यह भी निसंकोच स्वीकार कर लेना चाहिए कि आने वाला समय नेहरू, इंदिरा और अटल युग की तरह मोदी युग को याद करेगा। यह समय भारतीय राजनीति की किताब के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो रहा है। भारतीय राजनीति में इस समय को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इसलिए 'मोदीयुग' पर आई राजनीतिक चिंतक संजय द्विवेदी की किताब महत्वपूर्ण है और उसका अध्ययन किया जाना चाहिए।

गुरुवार, 29 जून 2017

हिंदू उत्पीड़न पर जागे मानवाधिकार

 पाकिस्तान,  बांग्लादेश और मलेशिया में रह रहे हिंदुओं पर आई रिपोर्ट बताती है कि कैसे दुनिया के कई हिस्सों में हिंदुओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें सामाजिक, आर्थिक और मानसिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है। खासकर, पाकिस्तान और बांग्लादेश से हिंदू उत्पीडऩ की घटनाएं अधिक सामने आती हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इन देशों के कट्टरपंथियों की नजर में हिंदुओं को जीने का अधिकार भी नहीं है। यहाँ हिंदू आबादी में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हिंदुओं की हत्या और उनका धर्मांतरण यहाँ के कट्टरपंथी मुस्लिमों के लिए एक तरह से नेकी का काम है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में सिलसिलेवार ढंग से हिंदुओं की हत्या की जाती रही है। नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उनसे जबरन निकाह किया जाता है। हिंदुओं को बरगला कर और दबाव डाल कर उनका धर्मांतरण किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान के थार जिले में एक नाबालिग हिंदू लड़की का कथित तौर पर अपहरण करके उसका धर्मांतरण करा दिया गया। यह प्रमाणित सच है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की जनसंख्या के आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं कि वहाँ देश के बँटवारे के बाद से ही हिंदुओं को नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

शनिवार, 24 जून 2017

पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वाले लोग कौन हैं?

 आईसीसी  चैंपियंस ट्रॉफी में भारत पर पाकिस्तान की जीत के बाद जम्मू-कश्मीर में ही नहीं, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में जश्न मनाया गया, पाकिस्तानी झंडे फहराए गए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे बुलंद किए गए।  पाकिस्तान की जीत पर आतिशबाजी भी की गई। भारत की हार पर पटाखों का यह शोर और पाकिस्तान की जय-जयकार किस बात का प्रकटीकरण है? आखिर भारत में कोई पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत कैसे कर सकता है कि उसका विजयोत्सव मनाए? पाकिस्तान परस्त चंद लोगों की यह प्रवृत्ति एक पूरे समुदाय की निष्ठा और देशभक्ति पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं होगा, जहाँ अपने देश की पराजय पर हर्ष व्यक्त किया जाता हो। भारत में पाकिस्तान परस्ती मानसिकता को परास्त करने की आवश्यकता है। पाकिस्तान की जय-जयकार करने वाले देशद्रोहियों को उनकी सही जगह दिखाने की आवश्यकता है। सुखद बात है कि पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वालों को पकड़कर जेल की हवा खिलाई जा रही है। सबसे पहले मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के मोहद गाँव से 15 युवकों को पकड़ा गया, जो पाकिस्तान की जीत के बाद उन्माद फैला रहे थे। देश में अन्य जगहों पर भी धरपकड़ जारी है। कर्नाटक के कोडागू जिले से तीन लोगों को पकड़ा गया है। उत्तराखंड के मसूरी में भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले तीन किशोरों को पकड़ा गया है। पाकिस्तान परस्त मानसिकता को हतोत्साहित करने के लिए इस प्रकार की कार्रवाई स्वागत योग्य है। यकीनन समाजकंटकों में कानून का डर होना चाहिए। देशविरोधियों को ऐसा सबक सिखाया जाना चाहिए कि देश को पीड़ा पहुँचाने की हरकत करने से पहले वह दस बार सोचें। दरअसल, इस प्रकार की प्रवृत्ति का दमन इसलिए भी आवश्यक है ताकि दो समुदायों के बीच बढ़ रही खाई की चौड़ाई को रोका जा सके।

बुधवार, 21 जून 2017

रामनाथ कोविंद : कम्युनिस्टों के दलित प्रेम का पर्दाफाश

 बिहार  के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम को सामने कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने एकबार फिर से सबको चौंका दिया है। सबके कयास धरे रह गए। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक के पहले रामनाथ कोविंद का नाम किसी तरह की चर्चा में भी नहीं था। लेकिन, जब भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की गई, तब विपक्ष मुश्किल में पड़ गया। अपने फैसले से सबको चौंकाने वाली मोदी-शाह की जोड़ी ने एक बार फिर से इस मुद्दे पर विरोधियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इस दांव से सब हैरान हैं, शायद इस पर भाजपा विरोधियों को विरोध करना इतना आसान नहीं होगा। हालाँकि, समाज को बाँटने वाली विचारधारा के 'झूठ बनाने के कारखाने' में काम शुरू हो चुका है। दलित उत्थान का नारा लगाने वाले यह समूह अब इस बात के लिए पीड़ा जाहिर कर रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए 'योग्यता' को वरीयता न देकर 'जाति' को प्राथमिकता देना उचित नहीं।

शनिवार, 10 जून 2017

शांति और संवाद की राह पर लौटें किसान

थाना जलाने के लिए उकसाती कांग्रेस विधायक
 मध्यप्रदेश  में किसान आंदोलन ने जिस तरह हिंसक एवं अराजक रूप धारण कर लिया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि उसे भड़काया जा रहा है। पिछले दो दिन में इस प्रकार के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें स्पष्ट दिखाई देता है कि कुछ लोग और नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर उन लोगों की टिप्पणियाँ भी साझा की गई हैं, जिन्होंने किसानों के पीछे खड़े होकर शांतिपूर्ण आंदोलन को भड़काया। सरकार द्वारा किसानों की माँग मान लेने के बाद जो आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो जाना चाहिए था, उसके अचानक उग्र होने के पीछे राजनीतिक ताकतें नहीं हैं, यह नहीं माना जा सकता। आग पर पानी डालने की जगह नेताओं द्वारा आग को हवा दी जा रही है। आज जिन नेताओं को किसानों के हित याद आ रहें, वह नेता उस दिन कहाँ थे, जब किसानों को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी। तब न तो सरकार के विधायक मंत्री किसानों से मिलने आए थे और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता आंदोलन की अगुवाई करने खड़े हुए थे। लेकिन, अब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी प्रशासन के मना करने के बाद भी तिकड़म भिड़ा कर वहाँ पहुँच गए। किसानों के बीच आकर किया भी तो क्या? क्या राहुल गाँधी ने किसानों से अंहिसा की राह चुनने की अपील की?

शुक्रवार, 9 जून 2017

कम्युनिस्टों का एजेंडा, सेना को करो बदनाम

 भारतीय  सेना सदैव से कम्युनिस्टों के निशाने पर रही है। सेना का अपमान करना और उसकी छवि खराब करना, इनका एक प्रमुख एजेंडा है। यह पहली बार नहीं है, जब एक कम्युनिस्ट लेखक ने भारतीय सेना के विरुद्ध लेख लिखा हो। पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट लेखक पार्थ चटर्जी ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की तुलना हत्यारे अंग्रेस जनरल डायर से करके सिर्फ सेना का ही अपमान नहीं किया है, बल्कि अपनी संकीर्ण और बीमार सोच का भी परिचय दिया है। तथाकथित समाजविज्ञानी और इतिहासकार चटर्जी ने एक बार पुन: यह सिद्ध किया है कि कम्युनिस्टों के मन में सेना के प्रति कितना द्वेष भरा है। इतिहास गवाह है कि कम्युनिस्टों ने हमेशा सेना का अपमान करने का ही प्रयास किया है। कम्युनिस्ट कभी सेना को बलात्कारी सिद्ध करने के लिए बाकायदा शोध पत्र पढ़ते हैं, तो कभी सैनिकों की मौत पर जश्न मनाते हैं। कम्युनिस्ट सैनिकों को वेतन लेने वाले आम कर्मचारी से अधिक नहीं मानते हैं। सैनिकों की निष्ठा और देश के प्रति उनके समर्पण को पगार से तौलने का प्रयास वामपंथी विचारक ही कर सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में सेना को बदनाम करने का षड्यंत्र या तो पाकिस्तान रचता है या फिर पाकिस्तान परस्त लोग। सेना पर लांछन लगाकर कम्युनिस्ट भी पाकिस्तान की लाइन पर आगे बढ़ते रहे हैं। वह कौन-सा अवसर है जब कम्युनिस्टों ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना को 'विलेन' की तरह प्रस्तुत करने की कोशिशें नहीं की हैं? जबकि भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में अदम्य साहस और संयम का परिचय देती है। जम्मू-कश्मीर के लोगों का भरोसा जीतने के लिए उनके बीच रचनात्मक कार्य भी करती है। जब भी प्राकृतिक आपदा आती है, तब यही सेना जम्मू-कश्मीर के लोगों के आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। जम्मू-कश्मीर और समूचे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान दाँव पर लगाने वाली सेना और सेना प्रमुख की तुलना जनरल डायर से करना कहाँ तक उचित है? क्या यह सरासर सेना का अपमान नहीं है?

बुधवार, 7 जून 2017

दु:खद है किसानों की मौत

 मध्यप्रदेश  में दो जून से किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ था। किसी ने नहीं सोचा था कि शांतिपूर्ण ढंग से प्रारंभ हुआ यह आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा कि छह किसानों का जीवन छीन लेगा। कर्जमाफी और अपनी फसल के वाजिब दाम की माँग को लेकर मध्यप्रदेश के मंदसौर, रतलाम और उज्जैन में किसान प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान संगठनों की माँगें मान भी ली थीं। मुख्यमंत्री ने तत्काल घोषणा कर दी थी कि सरकार किसानों से इस साल 8 रुपये किलो प्याज और गर्मी में समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदेगी। खरीदी 30 जून तक चलेगी। कृषि उपज समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए 1000 करोड़ रुपये का एक फंड भी बनाने की घोषणा मुख्यमंत्री ने की है। सरकार द्वारा किसानों की प्रमुख माँग मान लेने के बाद एक-दो संगठन ने आंदोलन वापस लेने की घोषणा भी कर दी थी। प्रमुख संगठनों द्वारा आंदोलन वापस लेने की घोषणा के बाद मध्यप्रदेश सरकार और उसका प्रशासन लापरवाह हो गया। उसने आंदोलन से पूरी तरह ध्यान हटा लिया। जबकि, एक-दो संगठन आंदोलन पर अड़े हुए थे। किसानों की मौत साफतौर पर प्रशासन की लापरवाही का मामला है।

सोमवार, 5 जून 2017

कांग्रेस और पाकिस्तान की भाषा एक कैसे?

 गोहत्या  के खून के दाग अभी धुल भी नहीं पाए थे कि कांग्रेस पाकिस्तान की बोली बोलकर एक बार फिर जनता की नजरों में गिर गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा नीत केंद्र सरकार के विरोध में कांग्रेस इतनी अंधी हो गई है कि उसे राष्ट्रहित दिखाई नहीं देते हैं। मोदी सरकार का विरोध करते-करते कांग्रेस के नेता भारत और उसकी संस्कृति के विरोध पर उतर आते हैं। कांग्रेस ने इस बार तो हद ही कर दी। मोदी सरकार की निंदा से भरी १६ पृष्ठ की एक पुस्तिका कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और राज बब्बर ने बीते शनिवार को जारी की है, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के संबंध में एक भयंकर गलती की है। कांग्रेस ने पुस्तिका में चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर का जिक्र करते हुए एक नक्शा प्रकाशित किया है। इस नक्शे में उसने जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र को 'इंडियन ऑक्युपाइड कश्मीर' बताया है। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में इस प्रकार की भाषा का उपयोग पाकिस्तान करता है या फिर पाकिस्तान परस्त अलगाववादी। भारत के प्रति निष्ठावान संगठन या व्यक्ति सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं। पाक अधिक्रांत कश्मीर के क्षेत्र पर भी भारत अपना दावा जताता है। लेकिन, मोदी सरकार के विरोध में अंधी कांग्रेस भारत के अभिन्न अंग को 'भारत अधिकृत कश्मीर' बता गई। यह कांग्रेस की भूल है या फिर जम्मू-कश्मीर के मसले पर उसकी नीति?

बुधवार, 31 मई 2017

विरोध प्रदर्शन या क्रूरता का प्रकटीकरण

 पशुओं  को क्रूरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार के आदेश का विरोध जिस तरह केरल में किया गया, कोई भी भला मनुष्य उसे विरोध प्रदर्शन नहीं कह सकता। यह सरासर क्रूरता का प्रदर्शन था। इसे अमानवीय और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रकटीकरण कहना, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगा। केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में कांग्रेसी इतने अंधे हो जाएंगे, इसकी कल्पना भी शायद देश ने नहीं की होगी। कम्युनिस्टों का चरित्र इस देश को भली प्रकार मालूम है। केरल में रविवार को जिस प्रकार कम्युनिस्ट संगठनों ने केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए 'बीफ फेस्ट' का आयोजन किया, सार्वजनिक स्थलों पर गौमांस का वितरण किया, निश्चित तौर पर विरोध प्रदर्शन का यह तरीका निंदनीय है। लेकिन, कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार से देश को आश्चर्य नहीं है। कम्युनिस्टों का आचरण सदैव ही इसी प्रकार का रहा है, भारतीयता का विरोधी। केरल में कम्युनिस्ट जब अपनी विचारधारा से इतर राष्ट्रीय विचारधारा से संबंध रखने वाले इंसानों का गला काट सकते हैं, तब गाय काटने में कहाँ उनके हाथ कांपते? उनका इतिहास यही सिद्ध करता है कि हिंदुओं का उत्पीडऩ उनके लिए सुख की बात है। लेकिन, कम्युनिस्ट आचरण का अनुसरण करती कांग्रेस का व्यवहार समझ से परे है। देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी यह देखकर दु:खी है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल, जिसे उसने लंबे समय तक देश चलाने के लिए जनादेश दिया, आज वह उसकी ही आस्था और भावनाओं पर इस प्रकार चोट कर रहा है।

बुधवार, 24 मई 2017

निंदक नियरे राखिए...

 केंद्र  सरकार के महत्वाकांक्षी अभियान 'खुले में शौच मुक्त भारत' पर अंग्रेजी अखबार 'द हिंदू' में लेख लिखकर विवादों में आईं आईएएस अधिकारी दीपाली रस्तोगी को मध्यप्रदेश सरकार ने क्लीनचिट दे दी है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए देशभर में प्रभावी ढंग से अभियान चला रहे हैं, वहीं मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में तैनात आदिवासी कल्याण विभाग की आयुक्त दीपाली रस्तोगी ने कुछ दिन पहले इस अभियान को लेकर कुछ सवाल उठाए थे। दीपाली रस्तोगी के अपने लेख में अभियान को लेकर सरकार के अतिउत्साह की आलोचना जरूर की थी, लेकिन यह सीधे तौर पर न तो केंद्र सरकार की आलोचना थी और न ही उन्होंने प्रदेश सरकार पर सवाल उठाए थे। अपने लेख में उन्होंने अभियान के क्रियान्वयन में आ रही दिक्कतों और पानी की कमी को लेकर शौचालय के औचित्य पर सवाल उठाए थे। उन्होंने अपने लेख में व्यावहारिक परेशानियों का जिक्र किया था। अपने लेख में एक जगह जरूर रस्तोगी थोड़ी अधिक नकारात्मक हो गईं थीं, जब उन्होंने अभियान की मंशा को अंग्रेजों की मानसिक गुलामी से जोड़ दिया था। जैसा कि होता है इस लेख को सरकार की आलोचना बताया गया। जमकर बहसबाजी शुरू हुई। सरकारी अधिकारी द्वारा सरकारी अभियान के खिलाफ इस प्रकार आलोचनात्मक लेख लिखना 'सेवा नियमों के विरुद्ध' बताया जाने लगा। बीच बहस में सामान्य प्रशासन विभाग ने रस्तोगी को नोटिस जारी कर जवाब माँग लिया था। जवाब में रस्तोगी ने कहा था कि उनकी भावना अभियान की आलोचना करने की कतई नहीं थी। उन्होंने तो सिर्फ उस व्यावहारिक परेशानी का जिक्र किया था, जो ग्रामीण क्षेत्र में जलसंकट की वजह से सामने आती है। यदि हम जमीन पर उतरकर देखें तब रस्तोगी के सवाल वाजिब दिखाई देते हैं। निसंदेह शौच मुक्त भारत आवश्यक है, लेकिन उससे पहले भारतीय समाज के सामने और भी बुनियादी जरूरतें हैं। बहरहाल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक यह मामला पहुँचा। अंतत: सरकार ने अभिव्यक्ति की आजादी को सम्मान देते हुए एक सराहनीय निर्णय लिया। सरकार की ओर से सामान्य प्रशासन विभाग के राज्यमंत्री लालसिंह आर्य ने कहा कि दीपाली रस्तोगी ने लेख में कुछ गलत नहीं लिखा है। हर एक को स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का अधिकार होना चाहिए। उनकी मंशा सरकार की खिलाफत करने की नहीं थी। यह निर्णय लेकर सरकार ने विचार प्रक्रिया और उसकी अभिव्यक्ति को अवरुद्ध होने से बचा लिया।

मंगलवार, 23 मई 2017

मिशन बन गई है नर्मदा सेवा यात्रा

 सदानीरा  नर्मदा मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा है। मध्यप्रदेश की समृद्धि नर्मदा से ही है। नर्मदा के दुलार से ही देश के हृदय प्रदेश का दिल धड़कता है। मध्यप्रदेश के साथ-साथ माँ नर्मदा अपने अमृत-जल से गुजरात का भी पोषण करती है। नर्मदा का महत्त्व दोनों प्रदेश भली प्रकार समझते हैं। माँ नर्मदा का अधिक से अधिक स्नेह प्राप्त करने के लिए दोनों प्रदेश वर्षों तक आपस में झगड़े भी। यह संयोग ही है कि नर्मदा के तट पर पैदा हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उसके जल से आचमन करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, दोनों नर्मदा के उद्गम स्थल पर आकर उसके ऋण से उऋण होने का संकल्प लेते हैं। मध्यप्रदेश में 148 दिन से संचालित 'नमामि देवी नर्मदे : नर्मदा सेवा यात्रा' का पूर्णता कार्यक्रम वन प्रदेश अमरकंटक में 15 मई, 2017 को आयोजित किया गया। परंतु, वास्तव में यह पूर्णता कार्यक्रम कम था, बल्कि नदियों के महत्त्व के प्रति जन-जागरण की मजबूत नींव पर नदी संरक्षण के भव्य स्मारक के निर्माण कार्य का शुभारम्भ था। नर्मदा सेवा यात्रा की पूर्णता पर नर्मदा सेवा मिशन की घोषणा यहाँ की गई। कृषकाय हो रही नर्मदा को संवारने का संकल्प दोनों लोकप्रिय नेताओं ने स्वयं ही नहीं लिया, अपितु नर्मदा के लाखों पुत्रों को भी कराया। ऐसी मान्यता है कि यदि हमारे संकल्प शुभ हों, तब प्रकृति भी उनको पूरा करने में हमारी मदद करती है। पर्यावरण और नदी संरक्षण का यह शुभ संकल्प तो प्रकृति की गोद में बसे अमरकंटक की पावन धरती पर ही लिया गया है, इसलिए इसके फलित होने की संभावना स्वत: ही बढ़ गई है।

शनिवार, 20 मई 2017

सूना हो गया नदी का घर

 माँ  नर्मदा के सेवक और उसके सुयोग्य बेटे अनिल माधव दवे के देवलोक चले जाने की खबर ऐसी है कि सहसा उस पर भरोसा करना कठिन होता है। उनका नाम आते ही सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा, शांत चित्त और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर व्यक्तित्व हमारे सामने उपस्थित होता है। उनके जिक्र के साथ नकारात्मक भाव, उदासी और खालीपन मेल नहीं खाता। इसीलिए हृदयघात के कारण उनकी मृत्यु की खबर अविश्वसनीय प्रतीत होती है। लेकिन, सत्य यही है। अनेक संभावनाओं से भरा एक संत राजनेता भारतीय राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में रचनात्मकता की एक बड़ी लकीर खींचकर चला गया है। स्व. अनिल माधव दवे की पहचान आम राजनेता की नहीं थी। वह धवल राजनीति के पैरोकार थे। लिखने-पढ़ने वाले और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले राजनेता के तौर पर उनको याद किया जाएगा। वह जब किसी गंभीर विषय पर बोल रहे होते थे, तब सभा/संगोष्ठी में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति ध्यानपूर्वक उनको सुनता था। उनकी वाणी में गजब का माधुर्य था। कर्म एवं वचन में समानता होने और गहरा अध्ययन होने के कारण, उनकी कही बातों का गहरा असर होता था। उनके प्रति एक बौद्धिक आकर्षण था। राजनीति और सामाजिक क्षेत्र में एक ऊंचाई प्राप्त करने के बाद भी किसी फलदार वृक्ष की भांति उनका स्वभाव सदैव विनम्र ही रहता था। यही कारण था कि उनका सम्मान भारतीय जनता पार्टी में ही नहीं, अपितु विरोधी राजनीतिक दल में भी था। सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय सभी विचारधारा के लोग और संगठन भी उनसे विचार-विमर्श करते थे। 

शनिवार, 13 मई 2017

धर्म की आड़ में अधर्म कब तक?

 तीन  तलाक के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार से सुनवाई शुरू कर दी है। तीन तलाक, हलाला और बहुविवाह के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन चला रही महिलाओं को उम्मीद है कि इस बार उन्हें न्यायालय से न्याय मिलेगा। (पढ़ें - महिलाओं के हित में आए निर्णय) मुस्लिम महिलाओं ने न्याय के लिए ईश्वर से प्रार्थना भी शुरू कर दी है। इस सिलसिले में उन्होंने हनुमान मंदिर में हनुमान चालीसा का पाठ भी किया है। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय भी महिला सम्मान और मुस्लिम धर्म से जुड़े इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। पहले दिन की कार्यवाही यही बताती है। आश्चर्य है कि न्यायालय को मानवीय और संवैधानिक अधिकारों के मामले में धार्मिक तुष्टीकरण का ध्यान रखना पड़ रहा है। वरना क्या कारण था कि पाँच न्यायमूर्तियों की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ को कहना पड़ा कि वह सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या तीन तलाक की परंपरा इस्लाम धर्म का मूल तत्व है? पीठ ने यह भी कहा है कि हम इस मुद्दे पर भी विचार करेंगे कि क्या तीन तलाक सांस्कारिक मामला है और क्या इसे मौलिक अधिकार के रूप में लागू किया जा सकता है? हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय की आगे की कार्यवाही से उम्मीद बंध रही है कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिलेगा। न्यायालय ने तीन तलाक के संबंध में अनेक कठोर टिप्पणियाँ की हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि 'तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं को जिंदा दफन करने जैसा है।' मुख्य न्यायमूर्ति जेएस खेहर की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि बहुविवाह मामले में फिलहाल बहस नहीं होगी। पीठ तीन तलाक की संवैधानिकता को परखेगी। कोर्ट ने कहा कि हम इस मुद्दे को देखेंगे कि क्या तीन तलाक इस्लाम धर्म का मूल हिस्सा है? क्या उसे मूल अधिकार के तौर पर लागू किया जा सकता है? कोर्ट ने कहा कि अगर यह साबित तय हो जाता है और कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचता है कि तलाक धर्म का मूल तत्व है तो वह इसकी संवैधानिक वैधता के सवाल को नहीं परखेगा।

शुक्रवार, 12 मई 2017

उचित नहीं आआपा का 'राजनीतिक अभ्यास'

 आम  आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली विधानसभा के विशेष सत्र में जिस प्रकार से ईवीएम से छेड़छाड़ का प्रदर्शन किया है, उसे किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। आआपा सरकार ने दो संवैधानिक संस्थाओं (विधानसभा और चुनाव आयोग) का एक तरह से उपहास उड़ाया है। आम आदमी पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज जब ईवीएम जैसी दिखने वाली मशीन पर मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रदर्शन कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर सरकार के तमाम मंत्री-नेता सदन में हँस रहे थे। यह हँसी किसलिए थी? क्या इसलिए कि उन्होंने अपने दावे को सच करके दिखाया? क्या इसलिए कि उन्होंने भाजपा की जीत को धोखेबाजी सिद्ध कर दिया? क्या इसलिए कि उन्होंने चुनाव आयोग को झूठा साबित कर दिया? आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल और समूची पार्टी की इस हँसी में दंभ था, दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति थी, धूर्तता थी और नकलीपन था। भ्रष्टाचार के आरोपों का जवाब देने की जगह विधानसभा में खेले गए इस नाटक से आआपा की कलई पूरी तरह खुल कर सामने आ गई है।

सोमवार, 8 मई 2017

स्वच्छता की ओर बढ़ते कदम

 एक  बार फिर केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत किए गए सर्वे के परिणाम देश के सामने रखे हैं। सर्वे के आंकड़ों पर भरोसा करें, तब यह स्पष्ट है कि हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। दरअसल, स्वच्छता अभियान के परिणाम पर भरोसा करने का कारण मात्र आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हमने अनुभव किया है कि धीरे-धीरे स्वच्छता हमारी आदत होती जा रही है। अब हम यहाँ-वहाँ कचरा फेंकने से बचते हैं, जबकि पहले कहीं भी कचरा फेंकने में कोई संकोच नहीं होता था। स्वच्छता अभियान के कारण हमारे मन का संस्कार हुआ है। स्वच्छता के प्रति जागरूक करने वाले सार्वजनिक हित के विज्ञापन और लघु फिल्मों ने हमारे मन को चेताया है। स्वच्छ शहरों की रैंकिंग घोषित करने की सरकार की नीति का भी कहीं न कहीं प्रभाव पड़ रहा है। जागरूक नागरिक और शहर की सरकारें चाहती हैं कि उनके शहर के माथे पर 'अस्वच्छ शहर' का कलंक नहीं लगे। इस तथ्य को हम सर्वे के परिणाम में अनुभूत कर सकते हैं। पूर्व के सर्वेक्षणों में जो शहर स्वच्छता के मामले में बहुत पीछे थे, इस सर्वे में उन्होंने अपनी स्थिति सुधारी है। अर्थात् हम स्वच्छता की ओर बढ़ रहे हैं। हालाँकि हमें पूरी ईमानदारी से यह भी स्वीकार करना होगा कि तस्वीर जितनी उजली दिखाई जा रही है, उतनी है नहीं।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

धूलिकण : चितेरों की दृष्टि में डॉक्टर साहब

 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले वर्ष ही अपने 90 वर्ष पूर्ण किए हैं। हम जानते हैं कि वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक बीज बोया था, जो आज ऐसा वटवृक्ष बन गया है कि उसकी छाया में राष्ट्रीय विचार पोषित हो रहे हैं। भारतीयता से ओतप्रोत दूरदृष्टा डॉ. हेडगेवार का जन्म वर्ष प्रतिपदा के शुभ अवसर पर 1 अप्रैल, 1889 को हुआ था। तद्नुसार इस वर्ष उनकी 127वीं जयंती हैं। देशभर में स्वयंसेवक अपने प्रेरणा पुँज को अनूठे ढंग से स्मरण कर रहे हैं। इसी श्रृंखला में भोपाल की श्री कला संस्था ने चित्र प्रदर्शनी 'धूलिकण' का आयोजन किया। पाँच दिवसीय प्रदर्शनी का उद्घाटन 15 अप्रैल को अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति मोहनलाल छीपा, अभिनेता एवं संस्कार भारती मध्य भारत प्रांत के अध्यक्ष राजीव वर्मा और स्वदेश के प्रधान संपादक राजेन्द्र शर्मा ने किया। इस अवसर पर वरिष्ठ चित्रकार देवी दयाल धीमान और समाजसेवी शशिभाई सेठ भी उपस्थित रहे। राष्ट्रनिर्माता डॉ. साहब पर केंद्रित इस प्रदर्शन का उचित ही नामकरण किया गया। डॉ. साहब भारत भूमि के ऐसे धूलिकण थे, जिसमें समाज को पोषित करने की शक्ति निहित थी।

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियाँ

 माँ  गंगा और यमुना के बाद अब नर्मदा नदी को भी मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त होंगे। देवी नर्मदा भी अब जीवित इंसानों जैसी मानी जाएगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की है। जल्द ही विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दे दिया जाएगा। यह शुभ घोषणा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन, जीवनदायिनी नदियों को मनुष्य के समकक्ष स्थापित करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे ग्रंथों में नदियों का स्थान बहुत ऊँचा है। वेदों में नदियों को माँ और देवी माना गया है। हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों को लेकर यह मान्यता इसलिए स्थापित की थी, ताकि हम नदियों के प्रति अधिक संवेदनशील रहें। उनके प्रति कृतज्ञ रहें। नदियों के प्रति अतिरिक्त आदर भाव रहे। जब मनुष्य नदियों को माँ मानेगा और उन्हें दैवीय स्थान पर रखेगा, तब उसको नुकसान नहीं पहुँचाएगा। यह हमारे समाज का दुर्भाग्य है कि हम अपने पुरखों की सीख को विसर्जित कर कर्मकांड तक सीमित होकर रह गए। सम्मान के सर्वोच्च स्थान 'माँ' के प्रति भी हम लापरवाह हो गए। हमारी यह लापरवाही नदियों के जीवन के लिए खतरा बन गई। आज न्यायालयों और सरकारों को नदियों को न्याय दिलाने के लिए उन्हें मनुष्य की तरह जीवंत मानने को मजबूर होना पड़ रहा है। जबकि हमारे यहाँ सदैव से नदियों को जीवंत ही माना गया है।

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

देश का प्रत्येक व्यक्ति विशिष्ट

 लाल  बत्ती की विदाई का निर्णय लेने के लिए केंद्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए। यह निर्णय इसलिए और स्वागतयोग्य है कि किसी को भी लाल बत्ती का उपयोग करने की छूट नहीं दी गई। सरकार ने स्वयं से इसकी शुरुआत की है। यानी प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्री भी बत्ती का उपयोग नहीं कर सकते। केंद्र सरकार के निर्णय के मुताबिक आगामी एक मई से विशिष्ट-अतिविशिष्ट व्यक्तियों के वाहनों पर बत्ती का उपयोग नहीं होगा। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, राज्यों के मुख्यमंत्री, मंत्री, निगम मंडलों के पदाधिकारी तथा सभी सरकारी अफसरों के वाहन भी अब बत्ती विहीन हो जाएंगे। हालाँकि सेना, पुलिस, रुग्णवाहिका और अग्निशमन दल के वाहनों पर ही बत्ती का उपयोग किया जा सकता है।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तीन तलाक पर बोर्ड का ढोंग

 तीन  तलाक शुद्ध तौर पर मुस्लिम महिलाओं के शोषण की व्यवस्था है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए देश में व्यापक बहस चल रही है। इस बहस के दबाव का ही परिणाम है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को तीन तलाक पर विचार करने और इस संबंध में एक आचार संहिता जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। क्योंकि मुस्लिम धर्म के तथाकथित ठेकेदारों को पता है कि महिलाएं जागरूक हो चुकी हैं, उनका शोषण अब और नहीं किया जा सकता। देश में मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में वातावरण बन गया है। हालाँकि तीन तलाक पर बोर्ड ने महिलाओं के हित की चिंता करने की अपेक्षा ढोंग ही किया है। बोर्ड के ढोंग से उसकी महिला विरोधी मानसिकता की पोल और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

पत्थरबाजों का समर्थन करने से बाज आएं नेता

 जब  सेना के जवानों की पिटाई और उनके साथ बदसलूकी का वीडियो सामने आया, तब देश के ज्यादातर लोग खामोश थे। भारत और भारतीय सेना के लिए जिनके मन में सम्मान है, सिर्फ उन्हीं महानुभावों को वीडियो में अमानवीय हरकतें देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने अपने-अपने ढंग से सेना के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट भी कीं। क्रिकेट में भारत का झंडा बुलंद करने वाले खिलाड़ी वीरेन्द्र सहभाग और गौतम गंभीर ने बहुत ही कठोर प्रतिक्रिया दीं। जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों पर पत्थरबाजों ने जिस तरह लात-घूसे बरसाये, उसे देखकर निश्चिय ही देश के नागरिकों और सुरक्षा बलों के परिवारों को बहुत कष्ट हुआ होगा। लेकिन, इससे भी अधिक कष्ट पत्थरबाजों के समर्थकों के कुतर्क सुनकर हो रहा है। मतिभ्रम लोग जिस तरह आतंकियों की ढाल बने पत्थरबाजों के समर्थन के लिए सुरक्षा बलों को खलनायक बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं, उससे क्रोध ही उत्पन्न हो सकता है।

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

ईवीएम प्रकरण : पराजयवादी मानसिकता

 ईवीएम  में छेड़छाड़ का आरोप लगाकर संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग और देश की जनता के अभिमत पर प्रश्न खड़ा कर रहे लोगों को अब उनके ही सहयोगी आईना दिखा रहे हैं। कांग्रेस के तीन बड़े नेताओं ने ईवीएम पर अपनी ही पार्टी के मत की आलोचना की है। पंजाब में कांग्रेस को उम्मीद से अधिक बहुमत दिलाने वाले वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना उचित ही है कि यदि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव होती, तब क्या कांग्रेस पंजाब में सत्ता में आ पाती? यदि ईवीएम में छेड़छाड़ होती तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे होते बल्कि अकाली दल का कोई नेता वहाँ होता। पंजाब के मुख्यमंत्री के बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी ईवीएम में छेड़छाड़ के मुद्दे को नकारा है। उन्होंने नानजांगुड और गुंडलूपेट विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की दोबारा जीत का उदाहरण देकर यह बात कही है। इससे पूर्व कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने तो अन्य दलों के सुर में सुर मिलाकर ईवीएम का विरोध करने के अपने पार्टी के फैसले की कड़ी आलोचना की है। यहाँ तक कि उन्होंने इसे 'पराजयवादी मानसिकता' कह दिया।

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

गौ-संरक्षण में गुजरात सरकार का अनुकरणीय प्रयास

 भारतीय  संस्कृति में गाय का बड़ा महत्व है। गाय के साथ इस देश का संबंध मात्र भावनात्मक नहीं है, वरन भारतीय समाज के पोषण में गौवंश का प्रमुख स्थान रहा है। भारत में गाय धार्मिक और आर्थिक, दोनों की बराबर प्रतीक है। यही कारण है कि प्राचीन समय में गौ-धन से सम्पन्नता देखी जाती थी। गाय के प्रति सब में बराबर सम्मान और श्रद्धा थी। फिर चाहे वह भारत में आक्रांता के रूप में आए समूह हों या फिर शरण लेने आए शरणार्थी, सभी गौ-हत्या से दूर रहते थे। परंतु, कालांतर में गोपालकों को चिढ़ाने और उन्हें नीचा दिखाने के लिए गौ-हत्या प्रारंभ की गई। गाय को मां कहने वाला समाज गौ-वंश की हत्या बर्दाश्त नहीं कर सकता था। इसी पीड़ा से इस देश में गौ-हत्या के विरुद्ध गौ-संरक्षण आंदोलनों की शुरुआत होती है। भारतीय संस्कृति की धुरी गाय के संरक्षण के लिए भारत में कठोर कानून बनाने की मांग लम्बे समय से उठाई जाती रही है। इन्हीं मांगों के बीच गुजरात सरकार ने गौ-संरक्षण की दृष्टि से सख्त और सराहनीय कानून बनाया है। गुजरात देश का पहला राज्य है, जहां गौ-हत्या के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान किया गया है।

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

तुम्हें समझ नहीं आएंगे श्रीकृष्ण

 प्रख्यात  अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भगवान श्रीकृष्ण को 'ईव टीजर' कह कर अपने बौद्धिक स्तर का परिचय दिया है। श्रीकृष्ण के संदर्भ में प्रशांत भूषण का ट्वीट नि:संदेह निंदनीय और अशोभनीय है। यह सरासर देश के बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने का हथकंडा है। प्रशांत भूषण के बयान को अभिव्यक्ति की आजादी कतई नहीं कहा जा सकता। यदि यह अभिव्यक्ति की आजादी है, तब कमलेश तिवारी जेल में क्यों है? आज यह प्रश्न देश के तमाम नागरिक पूछ रहे हैं। क्या इस देश में हिंदुओं की आस्थाओं का कोई मोल नहीं है? उनके आराध्य और प्रतीकों पर बेहूदा टिप्पणी करने पर कठोर सजा क्यों नहीं है? प्रशांत भूषण के कुतर्क पर देश में गहरी नाराजगी है। यह भूषण का सौभाग्य है कि उन्होंने उस समाज के आराध्य का अपमान किया है, जो न केवल सहिष्णु है बल्कि दूसरों का सम्मान करना जानता है। यदि इसी प्रकार की टिप्पणी वकील भूषण ने किसी और पंथ के पैगम्बर के संबंध में की होती, तब उन्हें समझ आता कि वास्तव में असहिष्णुता क्या है और अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा क्या है? जबकि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर जनता के सामान्य से गुस्से को भी प्रशांत भूषण के समर्थक असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे की तरह देख रहे हैं। दरअसल, प्रशांत भूषण की विचारधारा वाला बुद्धिजीवी वर्ग अभिव्यक्ति की आजादी का ठेका सिर्फ अपने पास रखना चाहता है, वह देश के सामान्य नागरिकों को सहज प्रतिक्रिया भी देने से रोकने का पक्षधर है।

मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

महिलाओं के हित में आए निर्णय

 पिछले  ढाई साल में तीन तलाक का मसला काफी बड़ा हो गया है। तीन तलाक पर व्यापक बहस प्रारंभ हो चुकी है। हालाँकि, मुस्लिम महिलाओं की ओर से लम्बे समय से तीन तलाक को खत्म करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। लेकिन, अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला। अब तक की सरकारों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को न तो सुना और न ही उनका समर्थन किया। वरन् शाहबानो प्रकरण में तो तत्कालीन कांग्रेसनीत केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटकर एक तरह से मुस्लिम महिलाओं को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया था। महिलाओं के संघर्ष को उस वक्त ताकत और सफल होने की उम्मीद मिली, जब मई-२०१४ में केंद्र में भाजपानीत सरकार का गठन हुआ। क्योंकि, भारतीय जनता पार्टी सदैव से समान नागरिक संहिता और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी के लिए तीन तलाक को खत्म करने की हिमायती रही है। भाजपा के शीर्ष नेता अकसर अपने भाषणों में मुस्लिम महिलाओं के हित में तीन तलाक को खत्म करने की मांग उठाते रहे हैं। हाल में सम्पन्न उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी तीन तलाक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना था। माना जा रहा है कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को जो प्रचंड बहुमत मिला है, उसमें मुस्लिम महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

अल्पसंख्यक कौन?

 भारत  के राज्य जम्मू-कश्मीर में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक का मुद्दा बड़ी बहस में तब्दील हो सकता है। इस मसले पर बहस होनी भी चाहिए। देश के उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा है कि केंद्र और राज्य सरकार को आपस में बातचीत करके इस मसले का हल खोजना चाहिए चाहिए कि राज्य में मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा मिलते रहने देना चाहिए या नहीं? उन्होंने चार सप्ताह में इस मुद्दे पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। ध्यान देने की बात यह है कि उच्चतम न्यायालय ने इस मुद्दे को महत्त्वपूर्ण माना है। यकीनन यह बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि देश के संदर्भ में भी इस पर व्यापक बहस की जानी चाहिए। आखिर किस सीमा तक किसी समाज को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए? अल्पसंख्यक दर्जे को पुन: परिभाषित करने की जरूरत है। यह संवेदनशील मुद्दा है। इस पर बहस के अपने खतरे भी हैं। लेकिन, तमाम खतरों के प्रभाव को कम करने के उपाय खोजते हुए इस विषय पर एक गंभीर और सकारात्मक बहस की जरूरत है।

शनिवार, 1 अप्रैल 2017

नये भारत की बात

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी अपने बहुचर्चित रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में हर बार समाजहित और देशहित की बातों को उठाते रहे हैं। संभवत: वह समाज को भी राष्ट्र निर्माण की भूमिका में सक्रिय करना चाहते हैं। क्योंकि, उनका प्रशिक्षण उस वैचारिक पृष्ठभूमि में हुआ है, जिसका मानना है सार्थक बदलाव समाज को जागरूक और सक्रिय करके ही आ सकते हैं। स्थायी बदलाव के लिए समाज को उसकी भूमिका का भान करना और उस भूमिका में उसे सक्रिय करना आवश्यक है। सरकार के बूते समाज में स्थायी बदलाव संभव नहीं है। सरकार सुविधा प्रदान करने में सक्षम है, लेकिन राष्ट्र निर्माण की वास्तविक शक्ति तो नागरिकों के हाथ में निहित है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री 'मन की बात' में बार-बार समाज को उसकी जिम्मेदारियों का ध्यान दिलाते हैं और नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वह भी सरकार के साथ कदमताल करें।

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

हिंदू-मुस्लिम एकता की भव्य इमारत खड़ी करने का अवसर

 भारत  के स्वाभिमान और हिंदू आस्था से जुड़े राम मंदिर निर्माण का प्रश्न एक बार फिर बहस के लिए प्रस्तुत है। उच्चतम न्यायालय की एक अनुकरणीय टिप्पणी के बाद उम्मीद बंधी है कि हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर निर्माण के मसले पर आपसी सहमति से कोई राह निकालने के लिए आगे आएंगे। राम मंदिर निर्माण पर देश में एक सार्थक और सकारात्मक संवाद भी प्रारंभ किया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह राम मंदिर निर्माण के मसले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं, यदि दोनों पक्ष न्यायालय के बाहर सहमति बनाने को राजी हों। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक संवेदनशील और भावनाओं से जुड़ा मसला है। अच्छा यही होगा कि इसे बातचीत से सुलझाया जाए। निश्चित ही मुख्य न्यायमूर्ति का परामर्श उचित है। दोनों पक्षों को उदार मन के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। मुख्य न्यायमूर्ति का विचार इस विवाद के समाधान की आदर्श पद्धति है। समूचा देश भी यही चाहता है भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बिना किसी विवाद के बहुत पहले ही आपसी सहमति से बन जाना चाहिए था। लेकिन, यह राह इतनी आसान भी नहीं है। इस राह पर चलने में कुछ लोगों के कदम ठिठकेंगे, तो कुछ लोग इस राह आना ही नहीं चाहेंगे। उच्चतम न्यायालय के मंतव्य पर आईं प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट भी हो गया है कि कुछ लोगों को यह सुझाव रास नहीं आया है।

गुरुवार, 23 मार्च 2017

कौन हैं मुसलमानों को योगी का डर दिखाने वाले लोग?

 उत्तरप्रदेश  में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से जिन्हें प्रदेश में मुसलमानों के लिए संकट दिखाई दे रहा है, वे लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित तो हैं ही, भारतीय समाज के लिए भी खतरनाक हैं। उनके पूर्वाग्रह से कहीं अधिक उनका बर्ताव और उनकी विचार प्रक्रिया सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए हौव्वा बनाकर यह लोग उत्तरप्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगाडऩा चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, वह कट्टर हैं, मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग दहशत में है, अब उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के बुरे दिन आ गए, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और उनका शोषण होगा, इस प्रकार की निराधार आशंकाएं व्यक्त करने का और क्या अर्थ हो सकता है? दरअसल, मुसलमानों को योगी आदित्यनाथ का डर दिखाने वाले लोग राजनीतिक और वैचारिक मोर्चे पर बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। योगी के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी और लिखत-पढ़त करके यह लोग अपनी हताशा को उजागर कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर निराश-हताश और विभाजनकारी मानसिकता के इन लोगों को समझ लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश की जनता क्या, अब देश भी उनके कुतर्कों को सुनने के लिए तैयार नहीं है। उत्तरप्रदेश के रण में पराजय का मुंह देखने वाली कांग्रेस, बसपा और सपा से कहीं अधिक बेचैनी कम्युनिस्ट खेमे में दिखाई दे रही है। कम्युनिस्ट खेमे के राजनेता, विचारक और पत्रकार ठीक उसी प्रकार के 'फ्रस्टेशन' को प्रकट कर रहे हैं, जैसा कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर किया गया था। उस समय इन्होंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर देश के मुसलमानों को डराने और भड़काने का प्रयास किया, आज योगी आदित्यनाथ के नाम पर कर रहे हैं। देश के मुसलमानों पर न तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कोई खतरा आया है और न ही योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से कोई संकट खड़ा होने वाला है।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा

 असम  के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

हार की जिम्मेदारी ईवीएम पर

 उत्तरप्रदेश,  पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल पर बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने दूसरी बार प्रेसवार्ता आयोजित करके ईवीएम में छेड़छाड़ कर बेईमानी से चुनाव जीतने के आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा की जीत ईमानदारी की नहीं है, बल्कि ईवीएम में धांधली करके यह जीत हासिल की है। मायावती ने इस मामले पर उच्चतम न्यायालय जाने और आंदोलन करने की बात कही है। वहीं, बुधवार को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एक प्रेसवार्ता में यह आरोप लगाए कि ईवीएम में गड़बड़ी करके पंजाब चुनाव में उनके मत चुराकर अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को हस्तांतरित किए गए हैं।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लाल हिंसा के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश

केरल में राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध लोगों की हत्या और कम्युनिस्ट अत्याचार के विरुद्ध देशभर में आम समाज ने बुलंद की आवाज
 केरल  में पिछले 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नृशंसता से अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दस माह पहले केरल में माकपा की सत्ता आने के बाद से लाल आतंक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। मई, 2016 से अब तक 20 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं माकपा के गुण्डों ने की हैं। केरल राज्य के कन्नूर जिले मंअ स्थितियां और भी भयावह हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित माकपा पोलित ब्यूरो के अधिकतम सदस्य कन्नूर जिले से ही आते हैं। लेकिन, हैरानी की बात है कि देश का तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का बहुसंख्यक वर्ग इस आतंक पर खामोश है। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया की चुप्पी के बीच केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आह्वान पर देशभर में नागरिक अधिकार, जनाधिकार और मानव अधिकार मंचों के तहत आम समाज एकजुट होकर लाल आतंक के खिलाफ जनाक्रोश व्यक्त कर रहा है। मार्च के पहले सप्ताह में एक, दो और तीन तारीख को देश के प्रमुख स्थानों पर समाज के संवेदनशील नागरिक बंधुओं ने 'संवेदना मार्च' निकाले और धरने आयोजित किए हैं।

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