सोमवार, 27 जून 2016

आतंकवाद और खौफ के बीच हिन्दू

 प्राचीन  काल में हिन्दू राष्ट्र रहे अफगानिस्तान में अब हिन्दू समुदाय बदहाली के दौर से गुजर रहा है। उनका जीवन आतंकवाद और खौफ के बीच बीत रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक आतंकवाद, सांप्रदायिक हमले और धर्मांतरण के कारण पिछले 24 साल में अफगानिस्तान में हिन्दुओं की आबादी में दो लाख से अधिक कमी आई है। मौजूदा समय में वहाँ 220 से भी कम हिन्दू परिवार बचे हैं। मुस्लिम बहुल इस देश में हिन्दुओं की स्थिति दुनिया के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती है। क्या कारण रहे हैं कि गांधारी के देश में आज अंगुली पर गिनने लायक हिन्दू बचे हैं? जिस देश में कभी हिन्दूशाही रही, सन् 843 ईस्वी में कल्लार राजा तक हिन्दू राजाओं का शासन रहा, वहाँ आज हिन्दू पददलित क्यों हैं? 17वीं सदी तक अफगानिस्तान अलग देश नहीं था बल्कि हिन्दुस्थान का ही हिस्सा था, उसी भूमि पर हिन्दुओं के सामने विकट परिस्थितियां कैसे आ खड़ी हुईं?
         इन सवालों के जवाब हम सब जानते हैं। लेकिन, स्वीकार करने और साहस के साथ कहने का हौसला नहीं है। या फिर तथाकथित सेकुलर जमात में शामिल होने के लिए इस्लामिक हिंसा पर मुंह में दही जमाकर बैठ जाते हैं। लेकिन, यह सच न तो झुठलाया जा सकता है और न ही छिपाया या दबाया जा सकता है कि गांधारी की भूमि पर इस्लाम के आक्रमण के बाद एक रंग गहराता जा रहा है। तालिबानी सत्ता और विचार ने अफगानिस्तान में गैर-मुस्लिमों के सामने दो ही रास्ते छोड़े थे- इस्लाम स्वीकार करो या फिर मौत? भले ही तालिबान सत्ता से बेदखल हो गया है लेकिन अनेक क्षेत्रों में अभी भी उसका ही शासन चलता है। 
         कुछ दिन पूर्व ही अनेक हिन्दू परिवार तालिबान के वर्चस्व वाले क्षेत्र हेमलंद से बेदखल कर दिए गए। जून की शुरुआत में ही राजधानी काबुल में जगतार सिंह को इस्लाम कबूल करने के लिए धमकाया गया। जगतार सिंह की आयुर्वेदिक औषधि की दुकान है। वह अपनी दुकान पर बैठा था तभी एक व्यक्ति आया और चाकू निकालकर धमकाने लगा- 'इस्लाम कबूल करो वरना गर्दन काट दी जाएगी।' जैसे-तैसे आसपास के दुकानदारों ने जगतार सिंह को बचाया। अफगानिस्तान के कई इलाकों में हालात यह हैं कि यदि आप मुसलमान नहीं हैं तो आप इंसान नहीं है। बचे-खुचे हिन्दू परिवारों के दिन की शुरुआत भय के साथ होती है। 
          आखिर हम इस बात पर बहस करने से क्यों बचना चाहते हैं कि इस्लाम की राह पर आगे बढऩे वाले देशों में गैर-इस्लामिक समुदायों के लिए कोई जगह नहीं होती है? तालिबान के बाद अब आईएस इस्लाम के नाम पर कैसे हिंसा फैला रहा है, यह हम देख ही रहे हैं। आखिर इस्लाम के उदार दर्शन पर इस्लाम का अतिवादी विचार कैसे हावी हो जाता है? दुनिया की बेहतरी और शांति के लिए यह बुनियादी सवाल है, जिस पर न केवल अन्य समुदायों को विचार करना चाहिए बल्कि सबसे अधिक चिंता स्वयं इस्लाम को करनी चाहिए। 
    बहरहाल, कुछ कालखंड को हटा दें तो हमेशा से भारत और अफगानिस्तान के संबंध अच्छे रहे हैं। उसका कारण दोनों की साझा संस्कृति है। दोनों कभी एक ही संस्कृति के घेरे में थे। आज भी हमें अफगानिस्तान के नाम पर 'काबुलीवाला' याद आता है। अफगानिस्तान के आम नागरिकों के मन में भारतीय नागरिकों के प्रति बेहद सम्मान और प्रेम है। लेकिन, तालिबानी सोच के आगे अफगानों का यह प्रेम हारता दिख रहा है। मौजूदा समय में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रयासों से दोनों देशों की मित्रता में गर्माहट है। प्रधानमंत्री मोदी को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति से हिन्दुओं की सुरक्षा के संबंध में चर्चा करनी चाहिए। यह सिर्फ हिन्दुओं की सुरक्षा का ही मामला नहीं है। यह मानवता का मसला है। यह शांति की स्थापना का विषय है। अफगानिस्तान को सबसे अधिक नुकसान जिस तालिबानी सोच ने किया है, यह उससे जुड़ा बड़ा मुद्दा है। यह आतंकवाद के खिलाफ उस लड़ाई का भी सवाल है, जिसका आग्रह आजकल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैश्विक मंचों से कर रहे हैं। अमन-शांति की स्थापना के लिए आतंकवाद और अतिवाद के खिलाफ साझा लड़ाई की जरूरत हर मोर्चे पर है। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (28-06-2016) को "भूत, वर्तमान और भविष्य" (चर्चा अंक-2386) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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