बुधवार, 25 नवंबर 2015

'लालू-केजरी मिलन' पर अन्ना की खुशी और अरविन्द की 'सफाई'

 भ्र ष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का चेहरा रहे सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने 'लालू-केजरी मिलन' प्रकरण पर खुशी जताई है। लेकिन, यह खुशी अरविन्द केजरीवाल के लिए चिंता का बहुत बड़ा विषय होना चाहिए। कई ऐसे अवसर-प्रकरण गवाह हैं जब सब ओर से केजरीवाल की कड़ी आलोचना हो रही थी तब अन्ना ने केजरीवाल की पीठ पर हाथ रखा था। उनके प्रयासों का समर्थन किया था। आलोचकों के सामने खड़ा होने का हौसला दिया था। लेकिन, भ्रष्टाचार को गले लगाने के प्रकरण में अन्ना ने केजरीवाल से न केवल पल्ला झड़ा लिया है बल्कि कड़ी टिप्पणी भी कर है। उन्होंने कहा- 'लालू प्रसाद यादव को गले लगाकर अरविन्द ने अच्छा काम नहीं किया है। इससे समाज में गलत संदेश गया है। मैं खुश हूं कि मैं अरविन्द से नहीं जुड़ा हूं। वरना केजरीवाल की इस गलती पर लोग मुझ पर भी सवाल उठाते।'

शनिवार, 21 नवंबर 2015

बेटी के लिए कविता-2


"मेरी चिड़िया, 
आज तुम पूरे एक साल की हो गयी हो। 
तुम्हारी हँसी के मौसम में मौज का एक साल कब निकल गया, 
पता ही नहीं चला। 
तुम्हारे आने के बाद असल में अहसास हुआ, 
पिता होने का अर्थ क्या है? 
हृदय और अधिक संवेदनशील हो गया है। 
लौट आया है मेरा भी बचपन तुम्हारे साथ। 
तुम्हारी नन्ही कोमल अंगुलियां जब मेरे गालों को स्पर्श करती हैं, 
मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठता है। 
सुबह-सुबह ऑफिस जाते वक्त रोज देखता हूँ, 
किवाड़ के उस पार छूटता हुआ मेरा मन 
और इस पार घुटने-घुटने चलकर आता तुम्हारा मन। 
शाम को घर लौटने की व्याकुलता रहती है, 
तुम्हारी हँसी के साथ झरने वाले 
चमेली-चम्पा-गेंदा-गुलाब समेटने के लिए। 
पता नहीं तुम कौन-सा जग जीत लेती हो, 
मुझे सामने पाकर। 
अपने नन्हे घुटनों पर खड़ी हो जाती हो, दोनों हाथ विजयी मुद्रा में उठाकर। 
जब तक कलेजे से लटक नहीं जाती हो, 
सुकून नहीं मिलता तुम्हें और मुझे भी। 
मेरे साथ से तुम्हें कौन-सा खजाना मिलता, मुझे पता नहीं। 
लेकिन हाँ, मुझे जरूर धरती पर स्वर्ग मिल जाता है। 
तुम्हारी अजब लीला है। 
मेरे घर आने के बाद तो जैसे धरती पर कांटे उग आते हैं, 
गोदी से उतरने का नाम नहीं लेती हो। 
फिर तो नींद भी तुम्हें मेरे कंधे पर ही आती है। 
खैर, बहुत बात हैं लिखने-कहने को, ख़त्म नहीं होंगी। 
कभी-कभी मन करता है, घड़ी की सुईयों से लटक जाऊँ, 
कालचक्र के पहिये को थाम लूँ। 
ऐसे ही रहे यह समय, हमेशा के लिए। 
तुम नन्ही परी और मैं अल्हड़ पिता।"

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

कांग्रेस की पाकिस्तान से क्या सांठगांठ है?

 कां ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने पाकिस्तान में भारतीय जनता का अपमान किया है। पाकिस्तानी टीवी चैनल से बातचीत करते हुए मणिशंकर अपनी जुबान पर काबू खो बैठे। एंकर ने उनसे पूछा कि भारत-पाकिस्तान के बीच फिर से दोतरफा बातचीत कैसे शुरू की जा सकती है? मणिशंकर ने बहुत उतावले होते हुए जवाब दिया- 'मोदी को हटाइये, हमको लाइये।' क्या मणिशंकर इस देश की जनता को बता सकते हैं कि पाकिस्तान कांग्रेस को कैसे सत्ता में ला सकता है? चुनावों में जीत हासिल करने के लिए कांग्रेस पाकिस्तान से क्या सांठगांठ कर रही है? कांग्रेस के एक और बड़े नेता सलमान खुर्शीद ने भी पाकिस्तान जाकर हाल में विवादित बयानबाजी की थी। उनके बयानों के कारण भी भारतीय कूटनीति को नुकसान पहुंचा है। दोनों नेताओं ने भारत के सामने असहज स्थितियां खड़ी कर दी हैं। पाकिस्तान दोनों नेताओं के बयानों का भारत के खिलाफ कूटनीतिक उपयोग करेगा।

बुधवार, 18 नवंबर 2015

क्या अब राष्ट्रपति की सुनेंगे साहित्यकार?

 रा ष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सम्मान लौटा रहे तथाकथित बुद्धिजीवियों को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि जिन लोगों को देश की तरफ से प्रतिष्ठित सम्मान/पुरस्कार मिलते हैं, उन्हें इन पुरस्कारों का सम्मान करना चाहिए। अपनी असहमति को बहस, तर्क और विमर्श के माध्यम से प्रकट किया जाना चाहिए। भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। राष्ट्रपति के बयान के बाद सम्मान लौटाने वाले लोगों के सामने बड़ी विकट स्थिति खड़ी हो गई है। पहले से ही उनके सम्मान वापसी अभियान का विरोध हो रहा था। अनुपम खेर, नरेन्द्र कोहली, सूर्यकांत बाली, मधुर भंडारकर सहित अनेक हस्तियां सम्मान वापस करने वाले लोगों के चयनित दृष्टिकोण और चयनित विरोध के खिलाफ प्रदर्शन कर चुकी हैं। सम्मान वापसी अभियान के प्रत्युत्तर में किताब वापसी अभियान भी पाठकों ने चला रखा है। किताब वापसी अभियान में पाठक सम्मान लौटाने वाले साहित्यकारों की पुस्तकें उनके घर जाकर वापस कर रहे हैं। अब राष्ट्रपति की टिप्पणी ने सम्मान लौटाकर विरोध करने के तरीके पर सबसे बड़ा प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया है।

उत्तरप्रदेश में महागठबंधन की सुगबुगाहट

 बि हार में राजद, जदयू और कांग्रेस के महागठबंधन की विजय के बाद अब उत्तरप्रदेश में भी भाजपा से पार पाने के लिए एक नए महागठबंधन की सुगबुगाहट हो रही है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इसे और हवा दे दी है। उन्होंने कहा है कि बिहार की तरह उत्तरप्रदेश में भी महागठबंधन बन सकता है। हालांकि उनके चाचाश्री और कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने पहली फुरसत में ही उत्तरप्रदेश में महागठबंधन से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपनी दम पर चुनाव लडऩे में सक्षम है। यदि गठबंधन बनाना ही होगा तो फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा। इससे पूर्व राज्यमंत्री फरीद महमूद किदवई भी कह चुके हैं कि उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिलकर चुनाव लडऩा चाहिए। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने भी भारतीय जनता पार्टी को कमजोर करने के लिए उत्तरप्रदेश में महागठबंधन की सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि उत्तरप्रदेश में ही क्यों, पूरे देश में भाजपा विरोधियों को एकजुट हो जाना चाहिए। 

सोमवार, 16 नवंबर 2015

आतंकवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता और एकजुटता की जरूरत

 दु निया के खूबसूरत शहर पेरिस पर इस्लामिक स्टेट (आईएस) का हमला समूची मानवता पर हमला है। आईएस के आतंकियों ने पेरिस की सड़कें लाल कर दी हैं। विश्व स्तब्ध है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए विख्यात फ्रांस पर यह तीसरा आतंकी हमला है। कार्टून पत्रिका ’शार्ली एब्दो’ के कार्यालय पर हुआ हमला अभी दुनिया भूली भी नहीं थी कि आईएसआईएस ने 14 नवम्बर (शुक्रवार) को फ्रांस की राजधानी पेरिस में सिलसिलेवार धमाके करके सैकड़ों लोगों की जान ले ली। हमले में सैकड़ों घायल हैं, जो जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करते हुए ईश्वर से पूछ रहे हैं कि आखिर उनका क्या दोष था? ये दरिन्दे मानवता का रक्त कब तक बहायेंगे? आईएस के इस हमले से फ्रांस ही नहीं दहला है, आतंक के निशाने पर रहने वाले दूसरे देश भी चिंतित हो उठे हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने अपने देश की जनता को भरोसा और साहस देते हुए कहा है कि आतंकवाद के विरुद्ध हम एक ऐसा युद्ध छेड़ने जा रहे हैं, जिसमें किसी पर रहम नहीं होगा। आतंकियों को पता चलना चाहिए कि उनका सामना ‘प्रतिबद्ध-एकजुट’ फ्रांस से हुआ है।

रविवार, 15 नवंबर 2015

गांधी और बुद्ध का है देश भारत

 भा रत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ’असहिष्णुता’ का सामना इंग्लैंड में भी करना पड़ गया। इंग्लैंड के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ संयुक्त प्रेसवार्ता को संबोधित करने के दौरान बीबीसी के पत्रकार ने मोदी से सवाल किया था कि भारत क्यों लगातार असहिष्णुता बनता जा रहा है? प्रधानमंत्री मोदी ने इसका बड़ा ही खूबसूरत और सटीक जवाब दिया। उन्होंने कहा- ‘भारत बुद्ध की धरती है, गांधी की धरती है और हमारी संस्कृति समाज के मूलभूत मूल्यों के खिलाफ किसी भी बात को स्वीकार नहीं करती है।’ गांधी और बुद्ध शांति और सहिष्णुता के वैश्विक प्रतीक हैं। इनके माध्यम से दुनिया को भारत का चरित्र बताना अधिक आसान है। भारत में जो बुद्धिजीवी ‘कथित बढ़ती असहिष्णुता’ को मुद्दा बनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने की योजना बना रहे हैं, उन्हें भी दुनिया को यह संदेश देना चाहिए था। लेकिन, अपने स्वार्थ के कारण उन्होंने भारत की छवि का ध्यान नहीं रखा। अपने बाहरी संपर्कों का उपयोग करते हुए उन्होंने ‘असहिष्णुता’ को आधार बनाकर दुनिया में भारत की छवि को नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है।

भाजपा के लिए ठीक नहीं आपसी मतभेद

 बि हार चुनाव की करारी हार से भारतीय जनता पार्टी को कितना नुकसान पहुंचेगा, इसका आकलन अभी नहीं किया जा सकता। लेकिन, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का आपसी मतभेद जरूरत पार्टी को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है। बिहार चुनाव के बाद भाजपा नेता कुछ असंतुलित हो गए हैं। मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने पार्टी लाइन से अलग चल रहे सांसद शत्रुघन सिन्हा के लिए अमर्यादित टिप्पणी की तो बदले में सिन्हा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी ने भी बेमौके अपना आक्रोश प्रकट किया है। चारों वरिष्ठ नेता पार्टी के हितचिंतक के तौर पर देखे जाते हैं। बाहरी तौर पर देखने पर उनके बयान में पार्टी हित ध्वनित भी होता दिख रहा है। लेकिन, असलियत तो सब जानते हैं कि बिहार की चुनावी हार के संबंध में मीडिया में बयान जारी करके उन्होंने पार्टी की चिंता की है या स्वयं की?

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

बीसीसीआई में स्वच्छता अभियान शुरू

 भा रतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की 85वीं वार्षिक आम सभा (एजीएम) की बैठक में क्रिकेट को साफ-सुथरा बनाने के लिए कुछ अहम फैसले लिए गए। आर्थिक अनियमितता और स्पॉट फिक्सिंग जैसे गंभीर आरोप झेल रहे एन. श्रीनिवासन को बीसीसीआई ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड (आईसीसी) के अध्यक्ष पद से हटा दिया है। अब बीसीसीआई अध्यक्ष शशांक मनोहर श्रीनिवासन की जगह वर्ष 2016 तक आईसीसी का अध्यक्ष पद संभालेंगे। आईपीएल की टीम चैन्नई सुपर किंग के मालिक रहे श्रीनिवासन के कारण पिछले कुछ समय में भारतीय क्रिकेट नकारात्मक खबरों में रही है। श्रीनिवासन प्रकरण के कारण क्रिकेट और खिलाडिय़ों के प्रति खेल प्रेमियों का भरोसा कम हुआ है। जिसे संभावनाओं का खेल माना जाता था, उसमें लोगों को आशंकाएं अधिक नजर आने लगीं। किसी मैच में अप्रत्याशित तरीके से उलट-फेर हो जाए तो उसमें 'फिक्सिंग' के सूत्र तलाशे जाने लगते हैं। हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के प्रत्येक मैच को संदिग्ध नजर से देखा जाने लगा है। यह भारतीय क्रिकेट के लिए खतरनाक संकेत हैं।

सोमवार, 9 नवंबर 2015

महागठबंधन का बिहार

 बि हार विधानसभा चुनाव का परिणाम आ गया है। बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के प्रति फिर से भरोसा जताया है। पूर्ण बहुमत के साथ जनता ने बिहार में अच्छे दिन लाने की जिम्मेदारी महागठबंधन को सौंपी है। जनादेश का स्वागत किया जाना चाहिए। बिहार में करारी हार झेलने को मजबूर भारतीय जनता पार्टी को ईमानदारी से विमर्श और विश्लेषण करना चाहिए। भाजपा की हार में कुछ कारण तो जाहिर हैं। जैसे- स्थानीय नेताओं-कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना। विरोधियों की सांप्रदायिक धुव्रीकरण की चाल का तोड़ नहीं निकाल पाना। राष्ट्रीय नेताओं का उल-जलूल बयानबाजी करना। जनता से सीधे संवाद की कमी। दिल्ली चुनाव में मिली हार से सबक नहीं लेना भी भाजपा की हार का बहुत बड़ा कारण है। भाजपा कितना विचार करेगी और कितना मानेगी ये उसके भीतर की बात है। लेकिन, भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि तुरूप के इक्के का उपयोग कब करना चाहिए और कितना करना चाहिए। भाजपा ने नरेन्द्र मोदी का इस तरह उपयोग किया, जैसे वे ही बिहार के मुख्यमंत्री के दावेदार हों। स्थानीय नेताओं को आगे करके यदि बिहार के रण में भाजपा उतरती तो शायद अधिक अनुकूल परिणाम आते। शीर्ष नेतृत्व को हार की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। बहानेबाजी और अगर-मगर तर्कों से हार की जिम्मेदारी को कम नहीं किया जा सकता, क्योंकि वर्ष २०१० की तुलना में इस चुनाव में भाजपा को सीटों का भी नुकसान हुआ है।

शनिवार, 7 नवंबर 2015

राजनीति की दिशा तय करने का वक्त

 'म दर ऑफ इलेक्शन' माने गए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे रविवार को आने हैं। परिणाम का दिन नजदीक आते-आते अमूमन यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है कि जीत का ताज किससे सिर पर सजेगा। लेकिन, बिहार चुनाव इसका अपवाद दिख रहा है। यह कहना मुश्किल हो रहा है कि बिहार में भाजपानीत एनडीए की सरकार बनेगी या फिर महागठबंधन को बहुमत मिलेगा? शुरुआत से ही मुकाबला कांटे का रहा है। दोनों और से यथासंभव ताकत झौंकी गई है। किसी ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता दांव पर है तो दूसरी ओर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजनीतिक भविष्य। चुनाव परिणाम को दोनों की लोकप्रियता से जोड़कर देखा जाएगा।

असहिष्णुता पर अब कांग्रेस की राजनीति

 दे श में असहिष्णुता का माहौल हो न हो, राजनीति जरूर ऐसा अहसास करा देगी। बढ़ती कथित असहिष्णुता के खिलाफ सम्मान वापसी के प्रपंच को अब कांग्रेस ने लपक लिया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस के तेवर देखकर समझा जा सकता है कि 'असहिष्णुता का माहौल' अभी ठंडा होने वाला नहीं है। इस बार (शीतकालीन सत्र) संसद को ठप करने का नया मुद्दा कांग्रेस को मिल गया है। कांग्रेस नेता मंगलवार को संसद भवन से मार्च करते हुए राष्ट्रपति भवन पहुंचे। पैदल मार्च में सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह सहित प्रमुख कांग्रेस नेता शामिल थे। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में डर और असहनशीलता के माहौल पर चिंता व्यक्त की गई है। कौन-सा डर और कैसी असहनशीलता? अब इसको स्पष्ट करने की जरूरत रह नहीं गई है। 

वैचारिक असहिष्णुता के शिकार मोदी

 'प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैचारिक असहिष्णुता के सबसे बड़े शिकार और सबसे ज्यादा पीडि़त हैं।' वित्तमंत्री अरुण जेटली ने देश के सामने यह प्रश्न खड़ा करके सबको विचार करने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने सीधा-सा सवाल भी बुद्धिवादियों से पूछ लिया है कि 'पिछले पंद्रह सालों से नरेन्द्र मोदी के साथ उनके विरोधी जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, उस व्यवहार को किस श्रेणी में रखा जाए?' अचानक तेजी से बढ़ती कथित असहिष्णुता की बात कहकर बुद्धिवादियों ने जिस तरह की मुहिम चलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा सरकार को घेरने का प्रयास किया है, उससे क्या समझा जाए? इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि बढ़ती असहिष्णुता के नाम पर देश-दुनिया में भारत की छवि खराब करने वाले बुद्धिवादियों का समूह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पूर्व से 'नफरत' की हद तक असहमत रहा है। 

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

आरएसएस की विचारधारा बांझ है, आपकी क्या है?

 सा हित्य अकादमी सम्मान लौटाकर सुर्खियां बटोर रहे पूर्व ब्यूरोक्रेट अशोक वाजपेयी कहते हैं कि तर्क का उत्तर प्रतितर्क से दिया जा सकता है। लात तो गधे भी मारते हैं। सोशल मीडिया से लेकर साहित्यिक हलकों में लोग सवाल कर रहे हैं, जिस भाषा-शैली का उपयोग अशोक वाजपेयी कर रहे हैं, क्या उससे कहीं से भी प्रतीत होता कि वे कवि हैं? वाजपेयी जी की शब्दावली को समझने के लिए 'हंस' पत्रिका के संपादक रहे वामपंथी कथाकार राजेन्द्र यादव का कथन याद करना चाहिए। उन्होंने कहा था कि अशोक वाजपेयी अफसर हैं और उन्हें हरेक के बारे में यह कहने का अधिकार है कि वह निकम्मा है, मूर्ख और बेकार व्यक्ति है। निर्मल वर्मा की 80वीं सालगिरह पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था। आलोचक डॉ. नामवर सिंह का उस मौके पर व्याख्यान हुआ। व्याख्यान का पोस्टमार्टम करते हुए वाजपेयी ने डॉ. सिंह के लिए बौद्धिक शिथिलता, दयनीय और नैतिक पतन जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें गैर-ईमानदार भी कहा था। यहां ईमानदारी से तात्पर्य अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता से है, जिसका प्रकटीकरण आज साहित्यकारों का यह समूह कर रहा है। नामवर सिंह के संबोधन के लिए वाजपेयी छांट-छांटकर शब्द लाए थे। उनके शब्द चयन पर शुरू हुई बहस के संदर्भ में ही राजेन्द्र यादव ने उक्त टिप्पणी की थी। वैसे जिन उदय प्रकाश के नक्शे-कदम पर अशोक वाजपेयी ने साहित्यक अकादमी सम्मान लौटाकर वितंडावाद खड़ा किया है, एक बार उनके कथन को भी याद कर लेना चाहिए। उदय प्रकाश ने वाजपेयी को 'सत्ता का दलाल' कहा था। बहरहाल, इतनी बात इसलिए की है ताकि अशोक वाजपेयी के शब्दकोश के बारे में सब जान लें। यह भी जान लें कि साहित्य जगत में अशोक वाजपेयी को बतौर साहित्यकार कोई गंभीरता से नहीं लेता है। उन्होंने सत्ता की करीबी का लाभ उठाकर खुद को 'बड़े साहित्यकार' के रूप में स्थापित किया है। भले ही आपके खेमे का व्यवहार धर्मनिरपेक्ष न हो, प्रगतिशील होने के मायने भी नहीं पता हों, साहित्यकार का धर्म भी नहीं जानते हों, लेकिन यह खेमा इन सारे शब्दों पर पट्टा कराकर बैठ गया है। दूसरा पक्ष भले ही सभी धर्मों को समान नजरिए से देखने की बात कह रहा है, लेकिन ये उसे सांप्रदायिक ही कहते हैं। भगवा जैस शब्द को भी इस समूह ने गाली बना दिया है। खैर, छोडि़ए शब्दों के मायाजाल को। आपका शब्दकोश, आपको मुबारक। चलिए, आगे बढ़ते हैं।

रविवार, 1 नवंबर 2015

संघ और राजनीति

 रा ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस दशहरे (22 अक्टूबर, 2015) पर अपने नब्बे वर्ष पूरे कर रहा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने वर्ष 1925 में जो बीज बोया था, आज वह वटवृक्ष बन गया है। उसकी अनेक शाखाएं समाज में सब दूर फैली हुई हैं। संघ लगातार दसों दिशाओं में बढ़ रहा है। नब्बे वर्ष के अपने जीवन काल में संघ ने भारतीय राजनीति को दिशा देने का काम भी किया है। आरएसएस विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है, फिर क्यों और कैसे वह राजनीति को प्रभावित करता है? यह प्रश्न अनेक लोग बार-बार उठाते हैं। जब 'संघ और राजनीति' की बात निकलती है तो बहुत दूर तक नहीं जाती। दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निकटता से नहीं जानने वाले लोग इस विषय पर भ्रम फैलाने का काम करते हैं। राजनीति का जिक्र होने पर संघ के साथ भारतीय जनता पार्टी को नत्थी कर दिया जाता है। भाजपा संघ परिवार का हिस्सा है, इस बात से किसी को इनकार नहीं है। लेकिन, भाजपा के कंधे पर सवार होकर संघ राजनीति करता है, यह धारणा बिलकुल गलत है। देश के उत्थान के लिए संघ का अपना एजेंडा है, सिद्धांत हैं, जब राजनीति उससे भटकती है तब संघ समाज से प्राप्त अपने प्रभाव का उपयोग करता है। सरकार चाहे किसी की भी हो। यानी संघ समाज शक्ति के आधार पर राजसत्ता को संयमित करने का प्रयास करता है। अचम्भित करने वाली बात यह है कि कई विद्वान संघ के विराट स्वरूप की अनदेखी करते हुए मात्र यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा ही संघ है और संघ ही भाजपा है।

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