शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।
अपनी पहली कठिन यात्रा जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अचानक एक दिन बैठे-बैठे मेरे दिल में खयाल आया कि क्यों न हिमालय की चोटियों और घाटियों को अपनी साइकिल के पहिए से नापा जाए। कुल्लूू मनाली क्षेत्र के १३,००० फीट से अधिक ऊंचे चंद्रखानी पास ट्रैक चला जाए। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड ऐसे प्रदेश हैं, जिनका जर्रा-जर्रा खूबसूरत और आकर्षक है। हर कोई बार-बार और हमेशा के लिए इन्हें अपने जेहन में स्पंदित करने की चाह रखता है। अविवाहित श्री तिवारी चुटकी लेते हुए बताते हैं कि मनाली को उत्तर भारत का हनीमून कैपीटल भी कहते हैं। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के साथ जरूर इस खूबसूरत वादी में आना चाहेंगे, बल्कि बार-बार आते रहेंगे। व्यास नदी के तट पर बसा यह शहर हमेशा पर्यटकों से गुलजार रहता है। कुल्लू की दो चीज काफी मशहूर हैं- ऊनी शाल और दशहरा पर्व। मनाली एडवेंचर में रुचि रखने वालों को भी अपनी ओर खींचता है। इसी चुंबकीय आकर्षण में आकर १३ हजार फीट से अधिक ऊंचे ट्रैक चंद्रखानी पास को फतह करनी की मन में ठान ली। तब मेरे पास उम्दा माउंटेन साइकिल उपलब्ध नहीं थी। एक एडवेंचर क्लब से जुड़े होने पर मुझे किराए पर वह साइकिल उपलब्ध हो गई। जरूरी तैयारी के साथ मैं निकल पड़ा अपनी पहले कठिन सफर पर। मनाली से शुरू होने वाला चंद्रखानी पास ट्रैक मलाना और मनिकर्ण होते हुए बिजली महादेव तक जाता है। चंद्रखानी पास को देवी-देवताओं के मिलन की जगह भी कहा जाता है। समतल सड़कों पर साइकिलिंग की जगह पहली बार ऊंचे शिखर पर साइकिल चलाने का रोमांच ही अलग था। मानो सातवां आसमान छू लिया हो। इस पहली जीत से इस यात्रा को और अधिक रोमांचकारी बनाने का साहस मन में पैदा हुआ। इस बार हाड़ कंपाने वाली सर्दी में हिमालच प्रदेश के बर्फीले पर्वतीय श्रृंखला धौलाधार में कुछ तूफानी करने का तय किया। यहां तो ऐसा लगा जैसे स्वप्रों में देखा स्वर्ग साकार उपस्थित हो गया हो। धौलाधार पर्वत रेंज कांगड़ा जिले का सबसे आकर्षक पर्यटन और साहसिक गतिविधियों का केन्द्र है। इसे १२ माह दूधिया बर्फ से ढंका हुआ देखा जा सकता है। हनुमान का टिंबा या सफेद पर्वत इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी है। धौलाधार की समुद्र तल से ऊंचाई ३५०० से ६,००० मीटर तक है। छोटा हिमालय के नाम से ख्यात धौलाधार पर्वत श्रृंखला डलहौजी के पास से शुरू होती है। इसके बाद साहसिक खेलों में रुचि रखने वाले युवा देवेन्द्र तिवारी ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। जैसे ऊंचे पहाड़ उन्हें आवाज देकर बुलाते हों, वे बार-बार उनके बुलावे पर जाते रहे। छोटा सियाचिन (१४,२०० फीट), रोहतांग पास (१३,०५१ फीट), बड़ा-लाचा-ला-दर्रा (१६,०४० फीट), नकीला पास (१५,५४७ फीट) और दुनिया के दूसरे सबसे ऊंचे चलने योग्य मार्ग तग-लांग-ला दर्रा (१७,५०० फीट) पर भी ग्वालियर के देवेन्द्र तिवारी ने भारत का झंडा फहराया।
मध्यप्रदेश में साइकिलिंग और साहसिक गतिविधियों में अपना योगदान देने के लिए देवेन्द्र तोमर का सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने सम्मान भी किया है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वार और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें साहसिक गतिविधि के लिए सम्मान दिया है। हाल ही में उन्हें वन्देमातरम राष्ट्रीय अलंकरण से नवाजा गया। 

देवेन्द्र तिवारी कहते हैं कि दुनिया को साइकिल के पहिए से नापने की उनकी अदम्य इच्छा है। वे साइकिल से विश्वयात्रा पर निकलकर बेटी बचाओ का संदेश देना चाहते हैं। साथ ही वे पर्यावरण के प्रति भी दुनिया को सचेत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति को दैनिक जीवन में फिर से साइकिल को अपना लेना चाहिए। इसके कई फायदे हैं- शरीर चुस्त रहेगा, ईंधन का संकट कम होगा और महंगाई की मार से भी बचा जा सकेगा। ट्रैकिग पर जाने वाले साथियों को वे सलाह देते हैं कि ट्रैकिंग के लिए जगह और मार्ग चुनने से पहले अपनी रुचि और क्षमताओं को परखना जरूरी है। अगर आपको ऊंचाई पर चढऩे में तकलीफ है तो समतल मैदान ही चुने। यदि ऊंचाई आपको आनंदित करती है और आप लम्बे समय तक पहाड़ों में भटकने का माद्दा रखते हैं तो जरूर लम्बे रास्ते, ऊंची जगह चुने और ऊंचे शिखरों पर जीवन को रोमांच के साथ जिएं। 

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