सोमवार, 9 जनवरी 2012

अधूरे मंदिर के आंगन में आधा दिन

 भो जपुर अधूरे लेकिन विशाल शिवालय के लिए मशहूर है। बेतवा नदी किनारे 106 फीट लम्बे, 77 फीट चौड़े और 17 फीट ऊंचे चबूतरे पर शिवमंदिर बना है। इसमें दुनिया के विशालतम शिवलिंगों में शुमार है। योनिपट्ट सहित शिवलिंग की ऊंचाई 22 फीट है। इस विशाल मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ कहा जाता है। परमार वंशीय राजा भोज (1010-1055 ई.) को सांस्कृतिक कार्यों, शिव भक्ति और सरस्वती उपासना के लिए इतिहास के पन्नों में जीवत रखा गया है। राजा भोज प्रकांड पण्डित और विद्याप्रेमी थे। ज्योतिष, राजनीति, दर्शन, वास्तु, व्याकरण और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता थे। इन विषयों पर दो दर्जन से अधिक ग्रंथ उन्होंने लिखे थे। राजा भोज के राज्य के संबंध में 11 अभिलेख उज्जैन, देपालपुर, धार, बेटमा और भोजपुर सहित अन्य जगहों से मिले हैं। राजा भोज का राज्य चित्तौड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भिलसा (वर्तमान विदिशा), खानदेश, कोंकण, और गोदावरी की घाटी के उत्तरी भाग तक विस्तृत था। इस विशाल राज्य की राजधानी धारा नगरी (वर्तमान धार) थी। इन्हीं राजा भोज ने भोजपुर में विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि गगन को चूमते इस शिवालय का निर्माण 24 घंटे में किया गया था। किन्हीं कारणों से मंदिर को पूरा नहीं बनाया जा सका। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी विधर्मी ने इसे तोड़ दिया हो। मंदिर अधूरा है लेकिन भव्य है।

      इसी अधूरे मंदिर के आंगन में शानदार दिन बीता अपने साथियों के साथ। 25 दिसंबर, 2011 की इतवारी सुबह थी वह। मौसम सर्दी का था लेकिन अहसास वसंत सा। एक छोटी कार (मारुति 800) में छह लोग (मनीष गीते, अनिल चौधरी, मनोज अवस्थी, बलवीर नेगी, स्मृति मिश्रा और मैं यानी लोकेन्द्र सिंह राजपूत) जमा हुए और निकल पड़े शिवमय होने को। भोपाल से भोजपुर करीब 32 किलोमीटर के फासले पर है। इस फासले को तय करते वक्त ही आपको अहसास होने लगेगा कि आप बेहतरीन सफर पर हैं। मुख्य शहर के पीछे छूटते ही प्रकृति की सुन्दरता का साथ मिलता है। सड़क का एक हिस्सा दोनों और से ऊंचे-ऊंचे तरुओं के बीच था। यहां से गुजरते वक्त लगा कि हरे पेड़ों की गुफा से निकल रहे हैं लेकिन काली खोपड़ी का इंसान इस सुन्दरता को शायद अधिक दिन तक नहीं रहने देगा। सड़क के दोनों ओर स्थित खेतों में अट्टालिकाएं खड़ी करने की तैयारियां हैं। प्रकृति के निश्छल सौंदर्य का आनंद लेते हुए कब शिव के द्वार पहुंच गए पता ही नहीं चला। अमूमन शिवालय में सोमवार को अधिक लोग पहुंचते हैं लेकिन यहां रोज ही सोमवार होता है। हां, यह बात अलग है कि बाकी के दिनों में असल सोमवार की अपेक्षा भीड़ कम होती है लेकिन शिव के दरबार में रोज रौनक रहती है। ऊंचे चबूतरे पर अपना सिंहासन जमाए शिव एक राजा के जैसे ही लगे मुझे तो। लगा कि यहां से वो छोटी-सी दुनिया पर निगाह रखे हुए हैं।
         स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध भूगर्भ विज्ञानी जेम्स हटन ने लिखा है कि चट्टानें पृथ्वी की इतिहास रूपी किताब के पन्ने हैं। भोजपुर शिवालय के समीप पसरी चट्टानें और उन पर उकेरे गए नक्शे जेम्स हटन के कथन को पुख्ता करते हैं। मैं इतिहासवेत्ता नहीं और न ही भूगर्भ वैज्ञानिक लेकिन इन नक्शों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिसर में और भी मंदिर या भवनों का निर्माण होना था। नक्शों के अध्ययन के बाद यह कहा भी जाने लगा है। रास्ते में आते वक्त भोजपुर के समीप की चट्टानों पर अधूरे-पूरे कई शिवलिंग पड़े हुए भी दिखे। संभवत: अन्य मंदिरों में उनका उपयोग किया जाता। नक्शों को सहेजने के लिए जहां-जहां नक्शे हैं रेलिंग लगा दी गई है। चट्टानों पर अंकित नक्शों को देखकर मैं तो यही सोच रहा था कि क्या कमाल के कारीगर थे, पत्थर पर ही कहां, क्या बनना है? कैसे बनना है खींच लिया। मंदिर के गर्भगृह में भी शानदार कारीगरी का नमूना देखने को मिलता है। द्वारपाल, नदी देवी और परिचायकाएं सहित कमलछत्र का सुरुचिपूर्ण अंकन है।
       आगे बढ़ते हैं। शिव मंदिर बेतवा नदी के तीर पर बना है। नदी का अपना आकर्षण होता है। सौंदर्य होता है। इस वक्त बेतवा नि:शब्द थी। जलराशि कम थी। बारिश में बेतवा अपने यौवन पर होती होगी। तब निश्चित ही वह उसके ठहरे हुए पानी में अठखेलियों में मग्न युवतियों की मांनिद इतराती होगी। अपनी हंसी से वह नदी प्रेमी को मदहोश करती होगी। एक कमाल की बात बताता हूं नदी जादूगरनी होती है। मानो न मानो मुझ पर तो उसका जादू चलता है। नदी और पहाड़ का अप्रतिम सौंदर्य हरेक को अपनी ओर खींचता है। नदी को बांधना मुझे कतई पसंद नहीं। उसके बहते रहने में ही आनंद है। खैर नदी की बातें फिर कभी। राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बेतवा को बांधने के लिए बांध बनवाया था। बांध निर्माण के अस्तित्व आज भी मौजूद हैं। उस समय बांध निर्माण आज की तरह नहीं था, न तकनीक के लिहाज से और न स्वार्थ के लिहाज से। राजा ने खेतों की सिंचाई के लिए इसका निर्माण कराया था। बांध बेहद मजबूत था। इस तथ्य का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 15वीं शताब्दी में बांध को तुड़वाने में तीन माह का समय लगा। वहीं डूब क्षेत्र का दलदल सूखने में कई वर्ष लग गए।
      भोजपुर एक शानदार जगह है। यहां से आने का मन तो नहीं हो रहा था लेकिन शाम को दफ्तर पहुंचना था। शिव और नदी से विदा लेकर भोपाल की ओर चल दिए। घुमक्कड़ों को एक बार तो यहां आना ही चाहिए। अपुन तो अब यहां बार-बार आएंगे। आज तो महज आधा दिन ही बिताकर जा रहा हूं किसी दिन पूरा दिन बिताने आऊंगा इस अधूरे मंदिर के आंगन में।




मंदिर के समीप एक प्राचीन प्रतिमा।


मंदिर के समीप की चट्टानों पर अंकित नक्शे।


विशालतम शिवलिंग, भोजपुर।

विशाल लेकिन अधूरा शिव मंदिर।

6 टिप्‍पणियां:

  1. पहली बार इस विशालतम शिवलिंग की जानकारी मिली. सुन्दर चित्रों ने इस पोस्ट को बहुमूल्य बना दिया.आभार!

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  2. अनमोल प्रस्तुति...
    बहुमूल्य चित्रावली..
    सादर आभार.

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  3. सारा अतीत नज़रों के सामने से गुज़र गया... बहुत अच्छी पोस्ट, बहुत सुन्दर चित्र, बहुत कीमती जानकारी!!

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  4. सुन्दर प्रस्तुति और बहुमूल्य जानकारी के लिए धन्यवाद लोकेन्द्र जी!

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