शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

अपने सुख की चाबी अपने जेब में रखें

 च लो आज कुछ दार्शिनिक हुआ जाए। वैसे मैं जिस बात पर दार्शिनिक हो रहा हूं वह मन में कई रोज से चल रही थी। हालांकि उसको अपने व्यक्तित्व में उतार अभी तक नहीं सका हूं। फिर भी आपसे चर्चा कर रहा हूं। वैसे मैं उस बात के लिए किसी को नहीं कहता, जिसका मैं अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता। हां तो मेरा मत है कि 'व्यक्ति को अपने सुख की चाबी अपनी जेब में रखनी चाहिए।' दरअसल होता क्या है कि सामान्य व्यक्ति कुछ लोगों की हरकत से दुखी हो जाता है और खुश भी। उसकी खुशी और दुख का कारण बहुत हद तक ऐसी बातें या कारण होते हैं जिनसे प्रत्यक्षत: उसका जुड़ाव नहीं होता। ऐसे लोग अतिसंवेदनशील श्रेणी में आते हैं। संत श्री १००८ लोकेन्द्र सिंह जी महाराज (हंसो मत) का कहना है कि अति भावुक लोगों को सुख से जीना है तो उन्हें इस प्रवृत्ति का त्याग करना पड़ेगा। उन्हें अपने सुख की चाबी दूसरों की जेब से निकाल कर अपनी जेब में रखनी होगी। महाराज का एक और कहना है कि इस दुनिया में मानवीय संवेदनाओं की कमी हो गई है, इसलिए सुख की चाबी अपनी जेब में रख कर आप भी संवेदनहीन न हो जाना। संवेदनाएं बचा कर रखना। क्योंकि बिना संवेदनाओं के मनुष्य, मनुष्य नहीं रहता। 
 संत श्री १००८ लोकेन्द्र सिंह जी महाराज
        अब आप दुविधा में आ गए होंगे कि यह कैसे संभव है।  सब कुछ हो सकता है साहब प्रयास की जरूरत है। हालांकि पहले ही कह चुका हूं कि मैंने असफलता के डर से प्रयास ही नहीं किया। वैसे मेरे कुछ नजदीकी मित्रों का कहना है कि मेरे स्वभाव में परिवर्तन आया है। थोड़ा बहुत मुझे भी महसूस होता है। हालांकि मैं पलट कर उन्हें यही जवाब देता हूं कि नहीं मैं तो वैसा ही हूं, लेकिन मन ही मन यह विचार भी चलता रहता है कि आप लोगों के व्यवहार की वजह से ही ये बदलाव मुझमें आए हैं। मैंने खुद तो सुख की चाबी अपनी जेब में नहीं रखी, लेकिन मेरा यह काम दूसरों ने कर दिया। उन्होंने वह कीमती चाबी खुद ही अपनी-अपनी जेबों से निकाल कर मेरी जेब में डाल दी। दरअसल किसी को ऐसे व्यक्ति के लिए क्यों दु:खी होना चाहिए जिसे आपका खयाल ही न हो। उस व्यक्ति के लिए क्यों रोएं, जिसका मन आपकी आंखों में आंसू देख प्रफुल्लित होता हो। उस व्यक्ति के लिए क्यों दर्द होना चाहिए, जो बार-बार आपका भरोसा तोड़े?  इनकी फिक्र छोड़ो। कुछ ऐसे दोस्तों को ढूंढ़ों जो आपके जैसे हों। फिर मस्त गजल गाओ-
खूब निभेगी हम दोनों में,
मेरे जैसा तू भी तो है...
दोस्तों एक बात स्पष्ट करता चलूं कि भले ही मुझमें बदलाव आए हों, लेकिन मेरे भीतर की संवेदना अभी तक जिंदा हैं। और एक बात मेरे सुख की चाबी तो कुछ लोगों ने मेरी जेब में सरका दी, लेकिन आपको सलाह है कि आप 'अपने सुख की चाबी अपने ही जेब में रखो।'

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

मेरी कविता छपी स्वदेश में

 भी पिछले पखवाड़े मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। प्रसन्नता का कारण था स्वदेश का दीपावली विशेषांक हाथों में आना। मैं ही क्या शहर के अधिकतर पत्रकार स्वदेश को पत्रकारिता की पाठशाला मानता हूं। शहर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के कई दिग्गज पत्रकार स्वदेश ने दिए हैं। मेरा स्वदेश से विशेष लगाव इसलिए है कि यहीं मैंने पत्रकारिता का कखग सीखा। स्वदेश की परंपरा रही है दीपावली विशेषांक निकालने की। यूं तो इस बार का दीपावली विशेषांक वाकई काबिले तारीफ है। शहर में स्वदेश के दीपावली विशेषांक की मांग उसके पंचाग के कारण भी होती है। इसका पंचाग (राशिफल) शहर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य ब्रजेश श्रीवास्तव तैयार करते हैं। मेरे लिए तो और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि मेरी एक कविता 'जब से शहर आया हूं...' को इसमें स्थान मिला। अब वह कविता आपके समझ प्रस्तुत है।
जब से शहर आया हूं........
जब से शहर आया हूं
हरी साड़ी में नहीं देखा धरती को
सीमेंट-कांक्रीट में लिपटी है
जींस-पेंट में इठलाती नवयौवन हो जैसे
धानी चूनर में शर्माते,
बलखाते नहीं देखा धरती को
जब से शहर आया हूं।
गांव में ऊंचे पहाड़ से
दूर तलक हरे लिबास में दिखती वसुन्धरा
शहर में, आसमान का सीना चीरती इमारत से
हर ओर डामर की बेढिय़ों में कैद
बेबस, दुखियारी देखा धरती को
हंसती-फूल बरसाती नहीं देखा धरती को
जब से शहर आया हूं।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

भारतवर्ष में पैंतालीस साल, मेरी हिन्दी-यात्रा-साइजी माकिनो

 मे रा सारा जीवन हिन्दी के आधार पर ही टिका हुआ है। हिन्दी मेरी मां है। हिन्दी के प्रति मेरी जो वफादारी है, वह मुझे असत्य लिखने नहीं देती। जो कुछ मैं लिखूंगा, सच लिखूंगा। मैं सच्ची निष्ठा से हिन्दी-जापानी दोनों भाषाओं की सेवा करूंगा। सत्य की पूजा और गुणगान ही मेरे शेष जीवन का लक्ष्य है। उक्त उद्घोषणा 'हिन्दी रत्न' (शांति निकेतन - 2006) साइजी माकिनो ने अपनी पुस्तक 'भारतवर्ष में पैंतालीस साल, मेरी हिन्दी-यात्रा' के बैक कवर पर लिखी है। इस उद्घोषणा ने मुझे काफी हद तक प्रभावित किया। वैसे इस पुस्तक से मेरा गहरा लगाव है। इसके दो कारण हैं- एक, मुझे पत्रकारिता का कखग पढ़ाने वाले शिक्षक श्री जयंत तोमर के चाचाश्री डॉ. रामसिंह तोमर जी का और दूसरा, मेरी जन्मस्थली ग्वालियर का इसमें इसमें खास उल्लेख है। श्री जयंत तोमर जी ने इस पुस्तक की चर्चा करते समय कहा था कि लेखक श्री साइजी माकिनो मुरैना के पास ऐतिहासिक महत्व का स्थल है नूराबाद वहां रहे। माकिनो उनके चाचा रामसिंह जी से अक्सर जिक्र करते थे कि चंबल के बच्चे बड़े असभ्य, शैतान और परेशान करने वाले थे। इसका उल्लेख उन्होंने किताब में भी किया है। दरअसल जापानी साफतौर पर भारतीयों से भिन्न दिखते हैं। गांव के बच्चे उनके बालकों को छोटी-छोटी आंखों के चलते खूब चिढ़ाते और सताते थे। गांव के लोग उन्हें 'जापानी मास्टर' कहते थे तो वहीं गांव के ही एक संत रामदास जी महाराज उन्हें 'जापान का भगवान' बुलाते थे।
    ग्वालियर के एक सिनेमा घर में उन्होंने मीना कुमारी और अशोक कुमार द्वारा अभिनीत 'चित्रलेखा' फिल्म देखी। बाद में यहीं उन्होंने इसी नाम का श्री भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास पढ़ा, जिसका बाद में उन्होंने जापानी में अनुवाद किया। इसका बड़ा रोचक किस्सा उन्होंने लिखा है। माकिनो ने ग्वालियर में रहकर लेखक, भ्रमणकारी, शिक्षक, डॉक्टर और जापानी कंपनी में दुभाषिए की भूमिका का निर्वहन किया। साइजी माकिनो जब चंबल से चले गए तब सिनेमा, साहित्य और समाचारों के माध्यम से उन्होंने चंबल में डाकुओं की समस्या पर चिंतन किया। इस विषय में सोचने के बाद उन्होंने वे चंबल के बारे में लिखते हैं - यद्यपि चंबल क्षेत्र भयावह स्थान, डाकुओं की शरणस्थली माना जाता है, तथापि वहां का हवा-पानी शुद्ध है। वहां के लोग सीधे-सादे और ईश्वर-भक्त हैं। चंबल अब प्रगति की राह पर अग्रसर हो रहा है। मेरी इच्छा है कि यदि मैं जिन्दा रहूं, तो और एक बार ऐसे साधना-स्थान में नये सिरे से सांस लेना चाहता हूं। साइजी भारत के विभिन्न राज्यों और शहरों में रहे। गोवा में अतिथि सत्कार के बारे में वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि जब पादरी भक्त घर के घर जाते हैं तो भक्त उन्हें चाय-कॉफी नहीं बल्कि बियर या वाइन पेश करते हैं। पादरी उसे निस्संकोच ग्रहण करते हैं।
भारतवर्ष में पैंतालीस साल, मेरी हिन्दी-यात्रा
- श्री साइजी माकिनो
मूल्य : 110 रुपए
प्रकाशन : भारतीय ज्ञानपीठ
18, इन्स्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली - 110032

 
    श्री साइजी ने गुरु रविन्दनाथ ठाकुर की साधना स्थली शांति निकेतन को जो चित्रण किया है वो बड़ा ही अद्भुत है। शांति निकेतन को पढ़ते हुए पाठक को प्रतीत होता है कि जैसे वह शांति निकेतन में खड़ा है और सब कुछ देख रहा है। वे लिखते हैं कि शांति निकेतन का जीवन सुबह की 'बैतालिक' से शुरू होता है। जिसमें उपनिषद के मंत्र और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ का संगीत अवश्यम्भावी है। शांति निकेतन में समस्त उत्सव गान से शुरू होकर गान पर ही समाप्त होते हैं। इस पुस्तक की सहायता से आप जितना करीब से शांति निकेतन  और भारत को महसूस करते हैं उसी प्रकार जापान और उसकी कला-संस्कृति के भी दर्शन कर सकेंगे। बातों ही बातों में साइजी भारत की वर्षों पुरानी खेती पद्धति (प्राकृतिक खेती) के महत्व को भी स्पष्ट कर जाते हैं। वे भारत का बहुत सम्मान करते हैं, भारत को कई मायनों में सबसे बहुत आगेे पाते हैं। लम्बे समय के बाद साइजी माकिनो अपने देश जापान वापस गए। प्रथम जापान-यात्रा के कुछ समय बाद ही पुन: उनका जापान जाना हुआ। उस समय उन्होंने भारत और जापान में जो अन्तर अनुभव किया उसे वे लिखते हैं-
1 - विशेष चेतावनी न देने पर भी जापानी स्वयं नियमों और कर्तव्यों का पालन करते हैं। भारतीय नियमों की अवहेलना करता है और कहता है कि कोई चिन्ता नहीं, सबकुछ ठीक हो जाएगा।
2- भौतिक रूप से सम्पन्न हर जापानी जीवन को भोगने की चीज मानता है, लेकिन भारतीय हर दिन के जीवन को जीने के लिए बाजी लगाते हैं। जापानी जीते हैं केवल अपने सुख भोगने के लिए, पर भारतीय स्वयं के आनंद के लिए जीते हैं और दूसरों को भी जीने देते हैं।
3- सुख-साधन सम्पन्न सामाजिक कल्याण-व्यवस्था के कारण जापानी वृद्ध निरुत्साही और सुस्त हो गए हैं। लेकिन, भारतीय वृद्ध सादगी और मर्यादा के साथ मृत्यु का इन्तजार करते हुए जी रहे हैं।
4- जापान के लड़के अपने आपको लड़कियों जैसा कमजोर महसूस करने लग गए।
5- जापानी जहां कहीं भी रहेंगे, कीड़े-मकोड़ों, मच्छर-मक्खी से घृणा करते हैं और अपने खिड़कियां दरवाजे बंद कर लेते हैं। लेकिन, भारतीय खुली हवा में रहते हैं।
6- जापानी युवक यदि एक बार भारत भूमि पर पैर रखता है तो उसका मन मोहित हो जाता है। अनेक कष्ट और दुर्घटनाओं के कड़वे अनुभव पाने पर भी इस देश में आने के लिए इच्छुक रहता है।
    अंत में यही कहूंगा कि हो सकता है आप भारत में बड़े लम्बे समय से रह रहे हैं, लेकिन हो सकता है आप भारत को उतना नहीं जान पाए जितना कि साइजी माकिनो पैंतालीस साल के भारत प्रवास में भारत को जान पाए।

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

...यूं तो बहुत बोलते हैं 'मन'

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, मनमोहन मौन
 भा रत के प्रधानमंत्री 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर ऐसे चुप हैं जैसे गुड़ खाए बैठे हों। मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रधानमंत्री और पीएमओ पर टिप्पणी कर जवाब मांगा है। खैर कोई भी जवाब मांगे हमारे पीएम मनमोहन तो अपने मन की भी नहीं सुनते वे तो सिर्फ और सिर्फ अपनी सुपर बॉस सोनिया गांधी की ही सुनते हैं। उनका इशारा जब तक नहीं होगा वे यूं ही मुंह में गुड़  दबाए बैठे रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट जवाब मांगे, विपक्ष चीखे-चिल्लाए और चाहे तो जनता भी हिसाब मांगे, मनमोहन नहीं बोलने वाले। आपको यहां बता दूं पीएम मनमोहन यूं चुप नहीं रहते। वे बहुत बोलते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर आज चुप, तब जोर से बोले थे
    कुछ माह पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी गोदामों में सड़ रहे गेहूं को गरीब जनता में बांटने के लिए सरकार को आदेश दिया था। यही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो 2 जी स्पेक्ट्रम घोटले पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर खामोश बैठे हैं, तब सुप्रीम कोर्ट को नसीहत दे रहे थे कि उसे नीति निर्धारण के मामलों में नहीं पडऩा चाहिए। सरकार के मामले में दखल देने की बजाय अपने कामों पर कोर्ट को ध्यान देना चाहिए।
मनमोहन की टोपी में खरगोश
    भारत के स्वर्ग कश्मीर को अलगाववादियों ने नरक बना रखा है। बीते कुछ समय से कश्मीर में खूब उत्पात मचाया जा रहा है। सब ओर से कश्मीर समस्या के समाधान की बात उठ रही थी, तब भी पीएम बोले। क्या बोले इस पर गौर करें- 'कश्मीर समस्या को लेकर देश को धैर्य दिखाना होगा। 63 वर्षों से इस समस्या का हल निकालने का प्रयास हो रहा है। इस समय मेरे हाथ में कोई समाधान नहीं, हम प्रयत्न कर रहे हैं। टोपी से खरगोश निकालना संभव नहीं।' कश्मीर समस्या के समाधान पर जनता को देश के प्रधानमंत्री से किसी उचित जवाब की आस थी तब हमारे पीएम ने जवाब तो दिया, लेकिन किस स्तर का।
मैं कोई जादूगर या भविष्यवक्ता तो नहीं
    भारत की गरीब और मध्यमवर्ग को इस सरकार ने कुछ दिया है तो वह है बेतहाशा बढ़ती महंगाई। महंगाई डायन से पीडि़त जनता ने जब-जब सरकार से पूछा कि उसे बढ़ती महंगाई से कब राहत मिलेगी। तब-तब पीएम मनमोहन ने जिम्मेदार बयान देने की बजाय जनता के सवाल की तौहीन की। महंगाई कब कम होगी इस सवाल पर उन्होंने आश्चर्य भरे जवाब दिया। कभी उन्होंने कहा कि मेरे पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं कि छड़ी घुमाओ और महंगाई कम। कभी कहा कि मैं कोई भविष्यवक्ता भी नहीं कि बता दूं कब महंगाई कम होगी। देश के ईमानदार छवि वाले प्रधानमंत्री और विख्यात अर्थशास्त्री जनता के सबसे बड़े सवाल का जवाब इस तरह देते हैं।
    मुझे और देश की जनता को आश्चर्य हो रहा है कि इतने बड़बोले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह घोटाले पर क्यों चुप हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा है तब भी शांत है, आखिर बात क्या है? इसका पता तो तभी चलेगा जब तक हमारे-तुम्हारे 'मन' बोलेंगे नहीं। सुप्रीम कोर्ट के बाद विपक्ष ने भी प्रधानमंत्री को घेरने की तैयारी कर ली है। भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री और पीएमओ पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को आजाद भारत के इतिहास में शर्मनाक करार दिया है। वहीं उन्होंने भ्रष्ट्राचार पर प्रधानमंत्री की चुप्पी पर आश्चर्य व्यक्त किया है। माकपा के नेता सीताराम येचुरी ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया कि मनमोहन को सारे मामले की जानकारी 2008 से थी। इतना ही नहीं येचुरी ने और राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने भी प्रधानमंत्री को कई बार पत्र लिखा था। वहीं जनता पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी तो लगातार मामले की जांच के लिए प्रधानमंत्री से अनुरोध करते रहे, लेकिन मनमोहन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, क्यों? इसके अलावा भाजपा नेता और पत्रकार अरुण शौरी ने एक टीवी चैनल पर खुलासा करते हुए कहा कि सीबीआई को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की पूरी जानकारी है। सीबीआई को पता है कि घोटाले का पैसा संभालने वाला शख्स कौन है, लेकिन सीबीआई उससे पूछताछ क्यों नहीं कर रही, इस पर उन्होंने भी आश्चर्य जताया। मतलब हर कोई बेताब है मनमोहन की आवाज सुनने को... मनमोहन सबकी आवाज सुन रहे हो तो बोलो... बोलो 'मन' बोलो...

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

कांग्रेस को लगी मिर्ची

सुदर्शन के बयान से तिलबिला गए सोनिया भक्त
सोनिया के खिलाफ सुदर्शन बयान पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज करने की मांग, गिलानी और अरुंधती के देश के खिलाफ बयान पर चुप्पी क्या जायज है? कांग्रेस ने संघ पर आतंकवादी होने का आरोप लगाया तब कुछ नहीं, कांग्रेस ने संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एजेंट होने का आरोप लगाया तब तो कांग्रेसजनों को खूब मजा आ रहा था, अपनी बारी आई तो दर्द होने लगा। दरअसल कांग्रेसी इस नौटंकी से भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी यूपीए सरकार से देश की जनता का ध्यान हटाना चाहते हैं।
 क हावत है जाके पांव न फटी बिमाई, वो का जाने पीर पराई। यह कहावत सोनिया गांधी को लेकर पूर्व सर संघचालक के. सुदर्शन के बयान पर कांग्रेस की बौखलाहट पर सटीक बैठती है। सुदर्शन जी ने सोनिया पर सीआईए का एजेंट होने का आरोप क्या लगाया, सोनिया के चरण चाटुकारों को मिर्ची लग गई। सबसे पहले तो यह साफ कर दूं कि मैं संघ के पूर्व सर संघचालक के. सुदर्शन के बयान को उचित नहीं मानता। मेरा मानना है सबूत हाथ में हो तब बात की जाए। सुदर्शन ने जो किया वही तो कांग्रेस इतने सालों से संघ के खिलाफ कर रही थी। कांग्रेस ने तो बाकायदा कुछ लोगों को काम सौंप रखा था कि संघ के खिलाफ मौके-बेमौके कुछ न कुछ बोलते रहो, करते रहो ताकि कांग्रेस का एक वोट बैंक मजबूत होता रहेगा। मध्यप्रदेश के कुटिल राजनीतिज्ञ दिग्विजय का तो जब भी मुंह खुलता है वे संघ को आतंकवादी संगठन ठहराने से पीछे नहीं हटते, साबित आज तक नहीं कर पाए। पी. चिदंबरम पवित्र भगवा रंग को आतंकवादी रंग घोषित कर देते हैं। इन्हीं सोनिया गांधी के सुपुत्र राहुल गांधी संघ की तुलना एक आतंकवादी संगठन सिमी से कर देते हैं। कांग्रेस का हर आम-ओ-खास नेता संघ को गरियाता रहा। उस पर आतंकवादी होने का आरोप लगाता रहा, संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को आईएसआई का एजेंट होने का आरोप लगाता रहा तब कांग्रेस चुप रही। कहीं किसी को दर्द नहीं हुआ, जब खुद की पार्टी की एक नेता पर आरोप लगा तो असहनीय पीढ़ा हो उठी।
    हांलाकि संघ ने इस बयान से किनारा कर लिया है और इसे के. सुदर्शन का व्यक्तिगत बयान बताया है। लेकिन, वोटों की राजनीति चमकाने और सोनिया की कृपा के लिए लालायित रहने वाले नेताओं की ओर से तमाम तरह के बयान आने लगे। वे इस मौके को कैसे भी नहीं छोडऩा चाहते। क्योंकि उन्हें देश की जनता का ध्यान भ्रष्टाचार में फंसी कांग्रेस से हटाना है। कांग्रेस के प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने कहा कांग्रेस के कार्यकर्ता कुछ भी कर सकते हैं इसकी जिम्मेवारी संघ की होगी। संघ, भाजपा (भाजपा को जबरन घसीट लिया) और सुदर्शन सोनिया से माफी मांगे। वहीं कांग्रेस की आतंकवादी चेहरे जगदीश टाइटलर ने तो वही पुराना राग अलापा संघ पर प्रतिबंध लगाने का। इतना ही नहीं तो कई बड़े वाले चाटुकारों ने सोनिया को देश की एकता का प्रतीक मान लिया। इसलिए के. सुदर्शन के बयान को देश की एकता-अखण्डता को नुकसान पहुंचाने वाला बता दिया। इन लोगों ने सुदर्शन पर राष्ट्रद्रोह का मुकद्मा दर्ज करने की मांग की है।  ....बस यहीं मुझे आपत्ती है, बाकी सब अपनी जगह है। संघ के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी करने वाले दिग्विजय, हिन्दुओं के पवित्र रंग को आतंक का प्रतीक घोषित करने वाले चिदंबरम और सिमी से संघ की तुलना करने वाले राहुल के खिलाफ कांग्रेस खामोश रही और मात्र एक सोनिया पर आरोप लगा तो इतना हो-हल्ला। ...और जिन सोनिया गांधी के लिए कांग्रेसी नाटक कर रहे हैं, वे भी कम वाचाल नहीं है। भाजपा के स्टार नेता नरेन्द्र मोदी (जिन्होंने गुजरात में कांग्रेस को धूल चटा रखी है) को 'मौत का सौदागर' कहा था। तब कांग्रेसी कहां चले गए थे? चलो इन्हें छोड़ो, ये तो उसके अपने हैं, फिर इन्होंने तो संघ और हिन्दुओं का ही तो अपमान किया है। कांग्रेस की कृपा तो उन पर भी रहती है जो खुलकर भारत विरोध करते हैं। कांग्रेस की नाक के नीचे दिल्ली में अलगाववादी नेता गिलानी और अरुंधती देश विरोधी प्रोपोगंडा फैलाते हैं, कांग्रेस मुंह सिलकर बैठी रही, जबकि इस देश की आम जनता ने इनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह के तहत कार्रवाई की मांग की। लेकिन लगता है कांग्रेस ने सोनिया को इस देश से ऊपर मान लिया है। तभी तो राष्ट्रविरोधी बातें करने वालों पर कांग्रेस का अमृत बरसता है। कश्मीर में राष्ट्रध्वज और सेना को गाली-गलौज करने वालों को यही यूपीए सरकार 100 करोड़ का राहत पैकेज जारी करती है। वहीं एक सुदर्शन का एक कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के खिलाफ बयान देशद्रोह की कैटेगरी में आ जाता है। धन्य है ऐसी चाटुकारिता।
    अंत में एक बार फिर के. सुदर्शन के बयान पर लौटता हूं। उनके बयान से वाकई संघ ने अखिल भारतीय स्तर पर धरने से जो बढ़त हासिल की थी उसे खो दिया है। अगर सुदर्शन जी के पास सबूत हैं तो उनको जनता के सामने पेश करें। बयानबाजी करके कांग्रेस की कैटेगिरी में आने की कोशिश क्यों? सुदर्शन जी ने जो भी कहा फिलहाल तो वह आरोप ही हैं, लेकिन उनके बयानों पर निश्चित तौर पर शोध की जरूरत है। मेरा तो यह मानना शुरू से ही रहा है कि सोनिया गांधी (एंटोनिया माइनो) भी स्वयं शोध का विषय है, जबकि भारतीयों ने खासकर कांग्रेस ने जल्द ही सोनिया को सिरमाथे बिठा लिया। यह सत्य है कि उन्होंने अपनी जन्मतिथि की गलत जानकारी दी, यह भी सत्य की कि उनके पिता स्टेफानो माइनो ने एक नाजी सेना में काम किया और इसी कारण वे द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त रूस के युद्धबंदी रहे। साथ ही सोनिया के बारे में यह भी सभी जानते हैं कि सोनिया ने भारत की नागरिकता बहुत दिन बाद सोच-विचार के बाद ली। इस बात पर भी शोध की आवश्यकता है कि क्या वाकई सोनिया के दखल की वजह से ही इंदिरा गांधी का सुरक्षाकर्मी नहीं बदला जा सका था, जबकि जिसने इंदिरा को गोली मारी उसे हटाए जाने की प्रक्रिया चल रही थी। इंदिरा को तत्काल राममनोहर लोहिया अस्पताल में क्यों नहीं ले जाया गया, एम्स क्यों ले गए। सोनिया गांधी के विषय में समय-समय पर किसी न किसी ने कुछ न कुछ विवादास्पद लिखा है। भाजपा के दीनानाथ मिश्र ने 'सोनिया का सच' लिखा। वहीं डॉ. सुब्रह्मणयम स्वामी ने भी उन पर विस्तृत शोध लिखा है। फिलहाल कांग्रेस द्वारा जो नाटक-नौटंकी चल रही है इसका उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ भष्ट्राचार की खाई में फंसी यूपीए सरकार को संघ की पूंछ पकड़कर पार लगाना है। खैर जो भी चल रहा है उससे यह तो स्पष्ट होता जा रहा है कि देश की राजनीति की दिशा क्या है?

ग्वालियर की कथा कहती 'गोपाचल गाथा'

 मैं  ग्वालियर नगर में ही पैदा हुआ और यहां की माटी में ही खेल-कूद कर बढ़ा हुआ हूं। यहां कि आबा-ओ-हवा मुझे बड़ा ही सुकून देती है। जब से होश संभाला ग्वालियर को निरंतर बदलते देखा। उसके बारे में पढ़ा-सुना। रियासत काल की कल्पना के चित्र मस्तिष्क में खिंचे, लेकिन ग्वालियर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार व सरल हृदय श्री जगदीश जी तोमर की 'गोपाचल गाथा' ने जो दृश्य उपस्थित किए वे अद्भुत रहे। गोपाचल गाथा पढऩे के बाद लगा कि मैं अपने ग्वालियर से कितना अनजान था। ग्वालियर को समझना है या उसके बारे में जानना है तो मैं एक ही पुस्तक का नाम लूंगा वो है 'गोपाचल गाथा'। पुस्तक 'ग्वालियर : प्राचीन भारत की सांस्कृतिक धड़कन' से शुरू होकर परिशिष्ट पर जाकर खत्म होती है। इसी बीच में ग्वालियर का समग्र समाहित है। जिसमें ग्वालियर किले की निमार्ण कथा का खूबसूरत चित्रण हैं। इस पर अधिपत्य के लिए जो संघर्ष हुआ उसका बेजोड़ चित्रण श्री तोमर ने किया है। ग्वालियर के पाल से लेकर सिंधिया वंश के राजाओं के शौर्य व पराक्रम का जिक्र है तो अत्याचारी और विधर्मी मुगलों के अत्याचार का भी सटीक वर्णन हैं। मुगलों ने यहां भी उन्हीं करतूतों को अन्जाम दिया जो पूरे भारतवर्ष को झेलनी पड़ी हैं। ग्वालियर में जैसे ही मुगलों की सल्तनत कायम हुई उन्होंने मंदिरों को ज़मीदोज कर दिया, किले की दीवारों पर उकेरी गईं जैन पंथ के आराध्यों की मूर्तियों को छिन्न-भिन्न कर दिया, शिवजी की विशाल पिण्ड़ी (कोटेश्वर महादेव) को किले से नीचे फिंकवा दिया गया इसके अलावा जगह-जगह इस्लाम की मान्यताओं को दरकिनार कर मस्जिदें तामील करा दी गईं।
गोपाचल गाथा, ग्वालियर का राजनैतिक-सांस्कृतिक सफरनामा
- श्री जगदीश तोमर, वर्तमान में प्रेमचंद सृजनपीठ के निदेशक
मूल्य : 450 रुपए
       प्रकाशन :                             प्रकाशन
मनोज श्रीवास्तव, आयुक्त, जनसंपर्क, मध्यप्रदेश, भोपाल

    'गोपाचल गाथा' में मुगलों से अपने सतीत्व की रक्षा करने के लिए रानियों का जौहर और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में वीर-वीरांगनाओं की शहादत भी मार्मिक वर्णन किया गया। ग्वालियर के सांस्कृतिक इतिहास का तो लाजवाब रेखाचित्र खींचा है श्री जगदीश जी ने। संगीत, साहित्य-परंपरा, चित्रकला और मूर्तिकला साथ ही पत्रकारिता आरंभ एवं उन्नयन का भी खूब बखान किया है। पुस्तक में कोहिनूर कथा का बड़ा रोचक चित्रण है। कोहिनूर दुनिया का सबसे कीमती हीरा है। कभी उसका वजन लगभग साढ़े तीन तोला था। उसके दो टुकड़े हो चुके हैं। उसकी कहानी भारत से आरंभ होती है, किन्तु अब वह इंग्लैंड़ में है। यह सब तो मैं जानता था। नहीं जानता था तो कि कभी ग्वालियर भी इस नायाब हीरे का मालिक रहा। कोहिनूर ग्वालियर के तोमरवंशी राजाओं के पास लगभग 90 वर्ष रहा। एक बार 1437 ई. में मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने ग्वालियर पर आक्रमण किया और वह ग्वालियर नरेश डूंगरेन्द्र सिंह तोमर के हाथों परास्त हो गया। ग्वालियर की सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया। तब वह महाराजा डूंगरेन्द्र सिंह को कोहिनूर भेंट में देकर उनकी गिरफ्त से मुक्त हो सका। वह हीरा 1437 से 1523 ई. तक ग्वालियर के तोमर शासकों के पास रहा। फिर कैसे वह मुगलों के हाथ गया और उनके हाथ से अंग्रेजों के हाथ पहुंचा इसकी रोचक कथा का शानदार चित्रण है गोपाचल गाथा में। इसके साथ ही पुस्तक में आपको ग्वालियर के गौरव महान विभूतियों के बारे में भी जानने को मिलेगा। श्री जगदीश जी तोमर ने अपनी पुस्तक में ग्वालियर के इतिहास पुरुषों के साथ ही वर्तमान में साहित्य सेवा में लगे साहित्य सेवियों का भी समुचित उल्लेख किया है। ग्वालियर की पत्रकारिता भी विस्तार से प्रकाश डाला है।

सोमवार, 1 नवंबर 2010

लक्ष्मी-गणेश या विक्टोरिया-पंचम

सोने-चांदी के सिक्के और दीपावली पूजन

 भा रत का सबसे बड़ा त्योहार है दीपावली। हर कोई देवी लक्ष्मी को प्रसन्न कर उनका स्नेह चाहता है। इसी जद्दोजहद में व्यक्ति अनेकों जतन करता है धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी को। पूजन के दौरान कोई गुलाब के तो कोई कमल के फूलों से उनका आसन सजाता है। घी-तेल के दिए जलाए जाते हैं। इस तरह के अनेक प्रयत्न बड़े ही उल्लास के साथ होते हैं। एक खास बात देखी है मैंने। दीपावली के अवसर पर अधिकांश लोग चांदी या सोने का सिक्का खरीदते हैं। जिसे बाद में देवी के पूजन में रखा जाता है। इन सिक्कों पर कुछेक बरस पहले तक ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया और जॉर्ज पंचम के चित्र मुद्रित हुआ करते थे। दीपावली पर सर्राफ विशेष रूप से विक्टोरिया और पंचम के सिक्के बनवाते थे। जिनकी कीमत वजन के हिसाब से अलग-अलग रहती थी। मेरे गांव में अधिकतर सभी लोग ये सिक्के शहर से खरीद कर लाते और देवी पूजन में रखते। विक्टोरिया का चित्र मुद्रित होने के कारण इस सिक्के का नाम भी विक्टोरिया पड़ गया। गांव में कई लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत अधिक संख्या में विक्टोरिया जमा हो गए। संकट के वक्त कई लोगों के काम आई यह जमा पूंजी। इसी बात को ध्यान में रखकर इसे खरीदने पर जोर रहता था कि इस बहाने घर में सोना-चांदी के रूप में बचत जमा हो जाएगी।
    अंग्रेजो की गुलामी से आजाद होने के बाद भी कई वर्षों तक हमारे देश के टकसाल में सोने-चांदी के ही नहीं अन्य सिक्कों पर भी रानी विक्टोरिया और जॉर्ज पंचम के चित्र मुद्रित होते रहे। उपरोक्त विवरण के आधार पर मैं इस ओर सबका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि किस तरह से हमारा स्वाभिमान सोया पड़ा है। हम आज भी मानसिक रूप से गुलामी को भोग रहे हैं। हम देवी लक्ष्मी के पूजन के साथ उस सिक्के को रखते हैं जिस पर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया या जॉर्ज पंचम का चित्र मुद्रित रहता है। वैसे अब परिवर्तन आया है। वर्तमान में दीपावली पूजन के लिए जो सिक्के गढ़े जा रहे हैं उन पर देवी लक्ष्मी और प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की छवि मुद्रित की जा रही है, लेकिन आज भी विक्टोरिया और जॉर्ज पंचम की छवि वाले सिक्के भी प्रचलन में हैं क्योंकि कई लोग उन्हें ही शुद्ध सिक्का मानते हैं।
सिक्कों का लम्बा इतिहास
देवी लक्ष्मी के अंकनयुक्त सिक्कों का प्रचलन अभी का नहीं है। सैंकड़ों वर्षों पहले से राजा-महाराजा ने भी अपने सिक्कों पर लक्ष्मी की विभिन्न मुद्राओं के अंकन की परम्परा विकसित की थी। इतिहासवेत्ताओं ने यह तो स्पष्ट नहीं किया है कि किस राजा ने इस परंपरा का श्रीगणेश किया, लेकिन अब तक लक्ष्मी के अंकनयुक्त जो सबसे पुराने सिक्के प्राप्त हुए हैं, वे तीसरी सदी ईसा पूर्व के हैं। प्राप्त सिक्के कौशाम्बी के शासक विशाखदेव और शिवदत्त के हैं। सोने के इन सिक्कों पर देवी लक्ष्मी खड़ी मुद्रा में अंकित हैं और दोनों ओर से दो हाथी उन्हें स्नान करा रहे हैं। ईसा पूर्व पहली सदी के अयोध्या नरेश वासुदेव के सिक्के पर भी देवी लक्ष्मी का चित्र मुद्रित है। पांचाल नरेश भद्रघोष, मथुरा के राजा राजुबुल, शोडास और विष्णुगुप्त के सिक्कों पर भी कमल पर बैठी एक देवी प्रदर्शित हैं। जिन्हें कई इतिहासविद हालांकि लक्ष्मी नहीं अपितु गौरी या दुर्गा मानते हैं। उपरोक्त प्रसंग में गुप्तकाल (319 ईस्वी से 550 ईस्वी) का योगदान उल्लेखनीय है। लक्ष्मी के अंकनयुक्त सिक्के इस काल में बहुत मिलते हैं। गुप्तवंश के शासक वैष्णव पंथ के उपासक थे। चूंकि लक्ष्मी विष्णुप्रिया हैं। संभवत: यही कारण रहा कि इस काल के देवी लक्ष्मी के अंकनयुक्त सिक्के बहुतायत में थे। चंद्रगुप्त प्रथम ने सन् 319 ईस्वी में एक सोने का सिक्का ढलवाया था। सिक्के के एक पट पर चंद्रगुप्त अपनी रानी कुमार देवी (जो बेहद खूबसूरत थीं) के साथ अंकित हैं वहीं दूसरे पट पर सिंह पर सवार लक्ष्मी अंकित हैं। इसके बाद समुद्रगुप्त ने अपने शासन में सोने के छह प्रकार के सिक्के चलाए। इसमें ध्वजधारी मुद्रा पर एक ओर गुप्त राजाओं का राजचिह्न 'गरुड़ध्वज' और दूसरी ओर सिंहासन पर विराजमान लक्ष्मी अंकित हैं। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य (375 ई. से सन् 415 ई.) ने सोने-चांदी के अलावा तांबे के सिक्के भी ढलवाए। जिन पर सिंहासन पर सुशोभित लक्ष्मी चित्रित हैं और नीचे श्री विक्रम: लिखा है। कुमार गुप्त (415 ई. से 455 ई.) ने अपने सिक्कों पर लक्ष्मी का चित्रण करवाया। स्कंदगुप्त (455 ई. से 467 ई.) के भी दो सिक्के प्राप्त होते हैं। एक सिक्के पर एक ओर धुनषवाण लिए राजा और दूसरी ओर पद्मासन पर लक्ष्मी को अंकित किया गया है। सिक्के पर श्री विक्रम: की तरह ही श्री स्कंदगुप्त: लिखा गया है। वहीं दूसरे सिक्के पर राजा को कुछ प्रदान करते हुए लक्ष्मी का चित्रण हैं।
    गुप्त काल के बाद महाराष्ट्र और आंद्र प्रदेश के सातवाहन वंश के ब्राह्मण, राजाओं, दक्षिण भारत के चालुक्य नरेश विनयादित्य और कश्मीर के हूण शासक तोरमाण, यशोवर्मन और क्षेमेंद्रगुप्त के सिक्कों पर भी लक्ष्मी का अंकन है। इसके अलावा राजपूत काल में यह परंपरा प्रचलन में रही। इस दौरान मध्यभारत के चेदिवंश के शासक गांगेयदेव ने अपने राज्य के सिक्कों पर सुखासन मुद्रा में बैठी चार हाथों वाली देवी लक्ष्मी  का अंकन कराया। बुंदेलखण्ड के चंदेल शासक कीर्तिवर्धन के चांदी के सिक्कों पर भी लक्ष्मी की सुंदर व कलात्मक मूर्ति का अंकन है।

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2010

भारत सरकार से छीन ली जाएगी करोड़ों की संपत्तियां

मुस्लिम सांसदों के दबाव में शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन स्वीकृत
 इस देश की राजनीति में घुन लग गया है। राष्ट्रहित उसने खूंटी से टांग दिए हैं। इस देश की सरकार सत्ता प्राप्त करने के लिए कुछ भी कर सकती है। अधिक समय नहीं बीता था जब केन्द्र सरकार ने कश्मीर के पत्थरबाजों और देशद्रोहियों को करोड़ों का पैकेज जारी किया। वहीं वर्षों से टेंट में जिन्दगी बर्बाद कर रहे कश्मीरी पंडि़तों के हित की चिंता आज तक किसी भी सरकार द्वारा नहीं की गई और न की जा रही है। मेरा एक ही सवाल है- क्या कश्मीरी पंडि़त इस देश के नागरिक नहीं है। अगर हैं तो फिर क्यों उनकी बेइज्जती की जाती है। वे शांत है, उनके वोट थोक में नहीं मिलेंगे इसलिए उनके हितों की चिंता किसी को नहीं, तभी उन्हें उनकी जमीन, मकान और स्वाभिमान भरी जिन्दगी नहीं लौटाने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। वहीं भारत का राष्ट्रीय ध्वज जलाने वाले, भारतीय सेना और पुलिस पर पत्थर व गोली बरसाने वालों को 100 करोड़ का राहत पैकेज देना, उदार कश्मीरी पंडि़तों के मुंह पर तमाचा है। इतने पर ही सरकार नहीं रुक रही है। इस देश का सत्यानाश करने के लिए बहुत आगे तक उसके कदम बढ़ते जा रहे हैं।
    एक पक्ष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1968 में पाकिस्तान गए लोगों की संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया था, इस संपत्ति पर अब भारत में रह रहे पाकिस्तान गए लोगों के कथित परिजन कब्जा पा सकेंगे। जबकि पाकिस्तान गए सभी लोगों को उनकी जमीन व भवनों का मुआवजा दिया जा चुका है। उसके बाद कैसे और क्यों ये कथित परिजन उस संपत्ति पर दावा कर सकते हैं और उसे प्राप्त कर सकते हैं। 
    दरअसल पाकिस्तान गए लोगों की सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए पहले से ही उनके कथित परिजनों द्वारा प्रयास किया जा रहा है,  क्योंकि 1968 में लागू शत्रु संपत्ति अधिनियम में कुछ खामी थी। उत्तरप्रदेश में यह प्रयास बड़े स्तर पर किए जा रहे हैं। 2005 तक ही न्यायालय में 600 मामलों की सुनवाई हो चुकी है और न्यायालय ने उन्हें वांछित शत्रु संपत्ति पर कब्जा देने के निर्देश दिए हैं। शत्रु संपत्ति हथियाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में 250 और मुम्बई उच्च न्यायालय में 500 के करीब मुकदमे लंबित हैं। मैं यहां कथित परिजन का प्रयोग कर रहा हूं, उसके पीछे कारण हैं। समय-समय पर इस बात की पुष्टि हो रही है कि बड़ी संख्या में पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुसलमान भारत के विभिन्न राज्यों में आकर बस जाते हैं। कुछ दिन यहां रहने के बाद सत्ता लोलुप राजनेताओं और दलालों के सहयोग से ये लोग राशन कार्ड बनवा लेते हैं, मतदाता सूची में नाम जुड़वा लेते हैं। फिर कहते हैं कि वे तो सन् 1947 से पहले से यहीं रह रहे हैं।
    शत्रु संपत्ति अधिनियम-1968 की खामियों को दूर करने और कथित परिजनों को शत्रु संपत्ति को प्राप्त करने से रोकने के लिए गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने 2 अगस्त को लोकसभा में शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 प्रस्तुत किया गया था। इस विधेयक के प्रस्तुत होने पर अधिकांशत: सभी दलों के मुस्लिम नेता एकजुट हो गए। उन्होंने विधेयक में संसोधन के लिए पपेट पीएम मनमोहन सिंह और इटेलियन मैम सोनिया गांधी पर दबाव बनाया। दस जनपथ के खासमखास अहमद पटेल, अल्पसंख्यक मंत्रालय के मंत्री सलमान खुर्शीद, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद के नेतृत्व में मुस्लिम सांसदों ने प्रधानमंत्री से मिलकर उनके कान में मंत्र फंूका कि यह विधेयक मुस्लिम विरोधी है। अगर यह मंजूर हो गया तो कांग्रेस के माथे पर मुस्लिम विरोधी होने का कलंक लग जाएगा और कांग्रेस थोक में मिलने वाले मुस्लिम वोटों से हाथ धो बैठेगा। यह बात मनमोहन सिंह को जम गई। परिणाम स्वरूप विधेयक में संसोधन कर दिया गया और उसे पाकिस्तान गए मुसलमानों के कथित परिजनों के मुफीद बना दिया गया। जिस पर बुधवार को पपेट प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक में मुहर लगा दी गई। अब स्थित अराजक हो सकती है सरकार से उन सभी ऐतिहासिक और बेशकीमती भवनों व जमीन को ये कथित परिजन छीन सकते हैं, जो अभी तक शत्रु संपत्ति थी। जबकि इनका मुआवजा पाकिस्तान गए मुसलमान पहले ही अपने साथ भारत सरकार से थैले में भर-भरकर ले जा चुके हैं।

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

बुखारी, कांग्रेस और दिग्विजय

बुखारी आतंकवादी ने संपादक को पीटा, कांग्रेस ने दिल्ली के निर्देश पर की मंत्रियों से धन उगाही और दिग्विजय सिंह शुक्र करो तुम्हारा जबड़ा नहीं टूटा... क्योंकि संघ सिमी या बुखारी नहीं
गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010 को दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ का समापन सभी प्रकार की मीडिया के लिए प्राथमिक और प्रमुख समाचार रहा वहीं एक घटना और रही जो मीडिया और हर भारतवासी के लिए अति महत्वपूर्ण रही। जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी ने मीडिया के मुंह पर तमाचा मारा, वो भी कस के। दरअसल इमाम बुखारी अयोध्या मसले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की पैरवी करने के लिए नबाबों के शहर लखनऊ पहुंचे थे। वह एक पत्रकारवार्ता को संबोधित कर रहा था (किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो पहुंचती रहे, लेकिन मैं बुखारी के लिए किसी भी प्रकार की सम्मानीय भाषा का उपयोग नहीं करूंगा), तभी उर्दू अखबार दास्तान-ए-अवध के संपादक अब्दुल वाहिद चिश्ती ने बुखारी से एक प्रश्न पूछा। जिस पर वह भड़क गया। एक संपादक की सत्ता को ललकार बैठा। तहजीब सिखाने का ठेकेदार बदतमीजी पर उतर आया। उसकी भाषा ऐसी थी कि जैसे किसी गली के नुक्कड़ पर खड़ा होने वाला छिछोरा लौंडा बात कर रहा हो। दास्तान-ए-अवध के संपादक का सवाल इतना सा था कि सन् 1528 के खसरे में उक्त भूमि पर मालिकाना हक राजा दशरथ के नाम से है, जो अयोध्या के राजा थे। इस नाते यह जमीन उनके बेटे राम की होना स्वाभाविक है, क्यों न मुसलमान इसे हिन्दू समाज को दे दें। वैसे भी हिन्दुओं ने बहुत सी मस्जिदों के लिए जगह दी है। एक और प्रश्न था-क्या इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट लेने की आपकी राय से मुल्क के सारे मुसलमान इत्तेफाक रखते हैं? इन प्रश्नों को सुनते ही बुखारी अपने रंग में दिखे। वैसे मुझे नहीं लगता ये इतने कठोर प्रश्न थे कि बुखारी को अपनी औकात पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़। इसके बाद तो दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी संपादक को जान से मारने की धमकी देते हुए कहता है- चोप बैठ जा, नहीं तो वहीं आकर नाप दूंगा। खामोश बैठ जा, चुपचाप...... तेरे जैसे 36 फिरते हैं मेरे आगे-पीछे........ बदमाश कहीं का, एजेंट..... इतना ही नहीं बुखारी का मन इससे भी नहीं भरा। उसने संपादक के साथ हाथापाई की। बुखारी ने अपने शागिर्दों को कहा-मार दो साले को... वरना ये नासूर बन जाएगा, अपन लोगों के लिए। यह सुनते ही बुखारी के शागिर्द टूट पड़े संपादक अब्दुल वाहिद पर।
    घटना के बाद सारे पत्रकार एकजुट होकर बुखारी से पूछते हैं- आपको एक पत्रकार को मारने का हक किसने दिया। बुखारी इस पर कहते हैं-मारूंगा, तुम कर क्या लोगे। यह है महान बुखारी। वैसे बुखारी के इस कृत्य पर चौकने की कतई जरूरत नहीं। इस तरह की हरकतें करना इन महाशय की फितरत बन चुका है। सन् 2006 में भी इसने प्रधानमंत्री निवास के सामने पत्रकारों के साथ मारपीट की थी। आपको एक बात और बता देना चाहूंगा कि यह वही बुखारी है जिसने जामा मस्जिद से हजारों लोगों की भीड़ के सामने भारतीय सरकार और व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहा था- मैं हूं सबसे बड़ा आतंकवादी। अगर है किसी में दम तो करे मुझे गिरफ्तार। उस समय सारे बुद्विजीवी और कथित सेक्युलर अपनी-अपनी मांद में छुप कर बैठ गए। किसी ने कागद कारे नहीं किए। मुझे उन लोगों पर आज भी पूरा यकीन है। वे या तो बुखारी के इस कृत्य को उचित सिद्ध करने के लिए कलम रगड़ेंगे या फिर खामोश रह कर किसी और मुद्दे की ओर ध्यान खींचेंगे, लेकिन वे एक शब्द लिखकर भी इमाम बुखारी और उसकी मानसिकता का विरोध नहीं करेंगे।
-       आज की एक और घटना अधिक चर्चित रही। वह है कांग्रेस की सुपर मैम सोनिया गांधी की वर्धा रैली के लिए धन उगाही की। इस घटना का खुलासा बड़ा रोचक रहा। दरअसल किसी आयोजन के समाप्त होने के बाद महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष माणिक राव ठाकरे और पूर्व मंत्री सतीस चतुर्वेदी निश्चिंत बैठ गुफ्तगूं में मशगूल हो गए। दोनों वर्धा रैली में किस-से कितना पैसा वसूला गया, इस पर चर्चा कर रहे थे। अहा! किस्मत, तभी किसी कैमरे में दोनों रिकॉर्ड (यह कोई स्टिंग ऑपरेशन नहीं था) हो गए। माणिक राव पूर्व मंत्री सतीस से कह रहे थे कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पहले तो पैसे देने से ना-नुकुर कर रहा था, लेकिन बाद में दो करोड़ ले ही लिया। बाकी मंत्रियों से दस-दस लाख रुपया लिया गया है। इस मसले पर दोनों की काफी देर तक बात चली। सब कुछ कैमरे में कैद हो गया और खबरिया चैनलों के माध्यम से जनता के सामने आ गया। सब साफ है, लेकिन फिर भी कोई कांग्रेसी स्वीकार नहीं कर रहा कि रैली के लिए कांग्रेस धन उगाही करती है। रैली के लिए करोड़ और लाख-लाख रुपए की वसूली के निर्देश दिल्ली से आए थे, यह दोनों की बातचीत से स्पष्ट हुआ। हमारे प्रदेश के बयान वीर दिग्विजय सिंह इतना ही कह सके कि कांग्रेस में रैली व अन्य आयोजनों के नाम पर धन उगाही नहीं होती, जबकि सबूत हिन्दोस्तान की सारी जनता के सामने था। घटना के बाद बड़े सवाल पीछे छूट गए कि इतना पैसा मंत्रियों के पास आता कहां से है? जनता सवाल भी जानती है और जवाब भी, लेकिन बाजी जब जनता के हाथ होती है तो वह भूल जाती है अपना कर्तव्य।
    वहीं बयानवीर दिग्विजय सिंह ने एक और अनर्गल बयान जारी किया है कि संघ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से पैसा लेता है। उनका कहना है कि उनके पास सबूत हैं। वे एक माह में सब दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे। दिग्विजय आपके पास तो इस बात के भी सबूत थे कि संघ पार्टी में अवैध हथियार बनते हैं, बम बनाए जाते हैं, लेकिन आप आज तक वो सबूत पेश नहीं कर पाए। दरअसल दिग्विजय को सच या तो पचता नहीं है या दिखता नहीं है। उनकी पार्टी का महान कारनामे की वीडियो फुटेज टीवी चैनल पर चल रही थी, तब भी राजा साहब कह रहे थे कि कांग्रेस धन उगाही नहीं करती। क्या दिग्विजय को इतना बड़ा सबूत नहीं दिखा। खैर मैं तो बड़ी बेसब्री से एक माह बीतने का इंतजार कर रहा हूं, जब राजा साहब एक बड़ा खुलासा करेंगे।  मैंने इससे पूर्व के लेख में लिखा था कि संभवत: राहुल के कान दिग्गी ने ही भरे होंगे या फिर अपने लिए लिखा भाषण राहुल से पढ़वा दिया होगा। तभी राहुल बाबा बिना ज्ञान के संघ की तुलना सिमी से कर गए थे। उसके बाद राहुल के बचाव में दिग्विजय बड़े जोर-शोर से जुटे हैं और संघ को सिमी जैसा बताने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। दिग्गी शुक्र करो संघ इमाम बुखारी या सिमी जैसा नहीं है.... देखा होगा इमाम ने तो एक सामान्य सवाल पूछने पर ही एक उर्दू अखबार के संपादक का मुंह तोड़ दिया।

गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी एक से दिखे बाबा को

राहुल चले दिग्विजय के नक्शेकदम पर, कहा संघ और सिमी एक जैसे

रा हुल 'बाबा' ने बुधवार को मध्यप्रदेश के प्रवास पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी की तुलना करते हुए दोनों को एक समान ठहरा दिया। हर किसी को राहुल की बुद्धि पर तरस आ रहा है। जाहिर है मुझे भी आ रहा है। उनके बयान को सुनकर लगा वाकई बाबा विदेश से पढ़कर आए हैं, उन्होंने देश का इतिहास अभी ठीक से नहीं पढ़ा। उन्हें थोड़ा आराम करना चाहिए और ढंग से भारत के इतिहास का अध्ययन करना चाहिए।  या फिर लगता है कि अपनी मां की तरह उनकी भी हिन्दी बहुत खराब है। राष्ट्रवादी और राष्ट्रविरोधी में अंतर नहीं समझ पाए होंगे। अक्टूबर एक से तीन तक मैं भोपाल प्रवास पर था। उसी दौरान भाजपा के एक कार्यकर्ता से राहुल को लेकर बातचीत हुई। मैंने उनसे कहा कि वे पश्चिम बंगाल गए थे, वहां उन्होंने वामपंथियों का झंड़ा उखाडऩे की बात कही। कहा कि वामपंथियों ने बंगाल की जनता को धोखे में रखा। लम्बे समय से उनका एकछत्र शासन बंगाल में है, लेकिन उन्होंने बंगाल में कलकत्ता के अलावा कहीं विकास नहीं किया। तब वामपंथियों ने बाबा को करारा जवाब दिया कि राहुल के खानदान ने तो भारत में वर्षों से शासन किया है। उनका खानदान भारत तो क्या एक दिल्ली को भी नहीं चमका पाए। इस पर राहुल दुम दबाए घिघयाने से दिखे, उनसे इसका जवाब देते न बना। अब राहुल मध्यप्रदेश में आ रहे हैं। तब उन भाजपा कार्यकर्ता ने कहा आपको क्या लगता है वह यहां कुछ उल्टा-पुल्टा बयान जारी करके नहीं जाएंगे। मैंने कहा बयान जारी करना ही तो राजनीति है, लेकिन मैंने राहुल से इस बयान की कल्पना भी नहीं की थी।
    संघ मेरे अध्ययन का प्रिय विषय रहा है। आज तक मुझे संघ और सिमी में कोई समानता नहीं दिखी। इससे पूर्व एक पोस्ट में मैंने लिखा था कि ग्वालियर में संघ की शाखाओं में मुस्लिम युवा और बच्चे आते हैं। इसके अलावा संघ के पथ संचलन पर मुस्लिम बंधु फूल भी बरसाते हैं। इससे तात्पर्य है कि संघ कट्टरवादी या मुस्लिम विरोधी नहीं है। राहुल के बयान से तो यह भी लगता है कि उन्हें इस बात की भी जानकारी न होगी कि संघ के नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच का गठन भी किया गया है। जिससे हजारों राष्ट्रवादी मुस्लिमों का जुड़ाव है। जबकि सिमी के साथ यह सब नहीं है। वह स्पष्टतौर पर इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन है। जो इस्लामिक मत के प्रचार-प्रसार की आड़ में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा है। ऐसे में वैचारिक स्तर पर भी कैसे संघ और सिमी राहुल को एक जैसे लगे यह समझ से परे है।

    राहुल बाबा से पूर्व संघ पर निशाना साधने के लिए उन्होंने एक बंदे को तैनात किया हुआ है। संघ आतंकवादी संगठन है, उसके कार्यालयों में बम बनते हैं, पिस्टल और कट्टे बनते हैं। इस तरह के बयान देने के लिए कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह की नियुक्ति की हुई है। इसलिए संघ की इस तरह से व्याख्या अन्य कांग्रेसी कभी नहीं करते। बाबा ने यह कमाल कर दिखाया। बाबा ने यह बयान भोपाल में दिया। मुझे एक शंका है। कहीं दिग्विजय सिंह ने अपना भाषण उन्हें तो नहीं रटा दिया। क्योंकि जब राहुल के बयान की चौतरफा निंदा हुई तो उनके बचाव में सबसे पहले दिग्विजय ही कूदे। खैर जो भी हुआ हो। यह तो साफ हो गया कि राहुल की समझ और विचार शक्ति अभी कमजोर है। वे अक्सर भाषण देते समय अपने परिवार की गौरव गाथा सुनाते रहते हैं। मेरे पिता ने फलां काम कराया, फलां विचार दिया। इस बार उन्होंने यह नहीं कहा कि जिस संघ को वे सिमी जैसा बता रहे हैं। उनके ही खानदान के पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संघ को राष्ट्रवादी संगठन मानते हुए कई मौकों पर आमंत्रित किया। 1962 में चीनी आक्रमण में संघ ने सेना और सरकारी तंत्र की जिस तरह मदद की उससे प्रभावित होकर पंडित नेहरू ने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस समारोह में सम्मिलित होने के लिए संघ को आमंत्रित किया और उनके आमंत्रण पर संघ के 300 स्वयं सेवकों ने पूर्ण गणवेश में दिल्ली परेड में भाग लिया। कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा विरोध होने पर नेहरू ने कहा था कि उन्होंने देशभक्त नागरिकों को परेड में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। अर्थात् नेहरू की नजरों में संघ देशभक्त है और राहुल की नजरों में आतंकवादी संगठन सिमी जैसा। इनके परिवार की भी बात छोड़ दें तो इस देश के महान नेताओं ने संघ के प्रति पूर्ण निष्ठा जताई है। उन नेताओं के आगे आज के ये नेता जो संघ के संबंध में अनर्गल बयान जारी करते हैं बिल्ली का गू भी नहीं है।
    1965 में पाकिस्तान ने आक्रमण किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री व प्रात: पूज्य लाल बहादुर शास्त्री जी ने सर्वदलीय बैठक बुलाई। जिसमें संघ के सर संघचालक श्री गुरुजी को टेलीफोन कर आमंत्रित किया। पाकिस्तान के साथ 22 दिन युद्ध चला। इस दौरान दिल्ली में यातायात नियंत्रण का सारा काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सौंपा गया। इतना ही नहीं जब भी आवश्यकता पड़ती दिल्ली सरकार तुरंत संघ कार्यालय फोन करती थी। युद्ध आरंभ होने के दिन से स्वयं सेवक प्रतिदिन दिल्ली अस्पताल जाते और घायल सैनिकों की सेवा करते व रक्तदान करते। यह संघ की देश भक्ति का उदाहरण है।
    1934 में जब प्रात: स्मरणीय गांधी जी वर्धा में 1500 स्वयं सेवकों का शिविर देखने पहुंचे तो उन्हें यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि अश्पृश्यता का विचार रखना तो दूर वे एक-दूसरे की जाति तक नहीं जानते। इस घटना को उल्लेख गांधी जी जब-तब करते रहे। 1939 में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर पूना में संघ शिक्षा वर्ग देखने पहुंचे। वहां उन्होंने डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (संघ के स्थापक) से पूछा कि क्या शिविर में कोई अस्पृश्य भी है तो उत्तर मिला कि शिविर में न तो 'स्पृश्य' है और न ही 'अस्पृश्य'। यह उदाहरण है सामाजिक समरसता के। जो संघ के प्रयासों से संभव हुआ।
    वैसे सिमी की वकालात तो इटालियन मैम यानि राहुल बाबा की माताजी सोनिया गांधी भी कर चुकी हैं। मार्च 2002 और जून 2002 में संसद में भाषण देते हुए सोनिया गांधी ने सिमी पर प्रतिबंध लगाने के लिए एनडीए सरकार के कदम का जोरदार विरोध किया। सोनिया की वकालात के बाद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने 2005 में प्रतिबंध की अवधि बीत जाने के बाद चुप्पी साध ली, लेकिन उसे फरवरी 2006 में फिर से प्रतिबंध लगाना पड़ा। इसी कांग्रेस की महाराष्ट्र सरकार ने 11 जुलाई 2006 को हुए मुंबई धमाकों में सिमी का हाथ माना और करीब 200 सिमी के आतंकियों को गिरफ्तार किया। सिमी के कार्यकर्ताओं को समय-समय पर राष्ट्रविरोधी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त पाया गया है।
क्या है सिमी
    स्टूडेन्ट्स इस्लामिक मूवमेन्ट ऑफ इण्डिया (सिमी) की स्थापना 1977 में अमरीका के एक विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा प्राप्त प्राध्यापक मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीकी ने की थी। वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता और जनसंचार में प्राध्यापक था। सिमी हिंसक घटनाओं तथा मुस्लिम युवाओं की जिंदगी बर्बाद करने वाला धार्मिक कटट्रता को पोषित करने वाला गिरोह है। संगठन की स्थापना का उद्देश्य इस्लाम का प्रचार-प्रसार करना बतलाया गया। लेकिन इसकी आड़ में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दिया गया।
दुनिया भर के आतंकी संगठनों से मिलती रही सिमी को मदद-
-वल्र्ड असेम्बल ऑफ मुस्लिम यूथ, रियाद
  • इंटरनेशनल इस्लामिक फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट ऑर्गनाइजेशन, कुवैत
  • जमात-ए-इस्लाम, पाकिस्तान
  • इस्लामी छात्र शिविर, बांग्लादेश
  • हिज उल मुजाहिदीन
  • आईएसआई, पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था
  • लश्कर-ए-तोएयबा
  • जैश-ए-मोहम्मद
  • हरकत उल जेहाद अल इस्लाम, बांग्लादेश

बुधवार, 22 सितंबर 2010

हटानी है तो धारा ३७० हटाओ, हालात सुधर जाएंगे

भारत सरकार घाटी में फैले अलगावाद पर कठोर कार्रवाई करने की बजाय विद्रोहियों से बातचीत कर सुलह चाहती है। इसके लिए ३८ सदस्यीय सर्वदलीय शिष्टमंडल घाटी में है। कश्मीर आजादी या फिर सेना को पंगु बनाने की शर्त पर ही अलगाववादी शांत होंगे (उसके बाद कुछ और भी मांग कर सकते हैं), यह निश्चित तौर पर तय है।
        दरअसल जम्मू-कश्मीर और शेष भारत के बीच अलगाव का मुख्य कारण है संविधान की अस्थायी धारा ३७०। जम्मू-कश्मीर समस्या भारत की अनेक समस्याओं की तरह पंडित जवाहरलाल नेहरू की ही देन हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण हैं शेख अब्दुल्ला। अब्दुल्ला उनकी दुर्बलता था। खैर इतिहास में जाने की बजाय वर्तमान में ही विचरण कर लेते हैं।
... बहुत ही चिंता का विषय है कि हम अलगाववादियों को दबाने, उन्हें निस्तनाबूत करने की बजाय हम उनसे बात करने को आतुर रहते हैं। यह समस्या सिर्फ कश्मीर के अलगाववादियो के साथ नहीं है वरन नक्सलियों के साथ भी है। कश्मीर में उत्पात मचा रहे पाकिस्तान के भाड़े के टट्टू भारत के वीर सैनिकों का विरोध कर रहे हैं। जिनकी दम पर आज तक कश्मीर और जम्मू बचा हुआ है। ये चाहते हैं कि सेना से विशेष सैन्य अधिकार कानून को वापिस ले लिया जाए, ताकि खुलकर पाकिस्तान से आए घुसपैठियों की खातिरदारी कर सकें और उन्हें दिल्ली, जयपुर व मुंबई में बम फोडऩे के लिए भेज सकें। बाद में भारत विरोधी लोगों का वर्चस्व घाटी में बढ़ाकर कश्मीर को भारत से छीन लिया जाए। राष्ट्रवादी चिंतक, सेना के अधिकारियों का साफ मत है कि अगर विशेष सैन्य अधिकार वापिस लिया जाता है या उसमें कटौती की जाती है तो हालात सुधरने के बजाय निश्चित तौर पर बिगड़ जाएंगे। तुष्टिकरण की नीति के चलते हमारे देश की राजनीति हमेशा से अलगाववादियों से मुकाबला करने की जगह उनके आगे घुटने टेक देती है। उसी का नतीजा है भारत को कोई भी आंखे दिखा देता है। चीन भी उनमें से एक है। हे प्रभु उस ३८ सदस्यीय शिष्टमंडल को ज्ञान देना ताकि कोई ऊलजलूल निर्णय न कर बैठे और विपक्ष और भारत भक्तों को इतनी ताकत देना की वे ऐसे किसी निर्णय को पारित न होने दें। जिससे जलते अंगारों के बीच हमारे सेना के जवानों को नंगा करके खड़ा न करा जा सके।
    मेरा मत है कि अगर वाकई कश्मीर के हालत सुधारना चाहते हैं तो वहां लागू अस्थायी धारा ३७० को हटा देना चाहिए। यह धारा कश्मीर को शेष भारत से पृथक करती है। इस धारा के कारण ही वहां अलगाववादियों को पनपने का मौका मिलता है। धार ३७० और अलगाववादियों के कारण कश्मीर में अब तक क्या हुआ है जरा गौर करें-
  • घाटी बदरंग हो गई। वहां से हिन्दू को निकाल बाहर कर दिया गया। वे अपना शेष जीवन शरणार्थी शिविरों में काटने को मजबूर हैं। कई मौत के घाट उतार दिए गए तो कई बलात् मुसलमान बना लिए गए।
  •  राज्य के दिशा-निर्देश नहीं बल्कि अलगाववादियों का बनाया कैलेंडर घाटी में चलता है। उत्पातियों के दबाव में इस्लामी देशों की तर्ज पर रविवार का अवकाश रद्द कर शुक्रवार का अवकाश दिवस बना दिया गया है। विश्वविद्यालय, सरकारी कार्यालय, बैंक व अन्य संस्थानों ने उसी अनुसार दैनिकक्रम तय कर लिया है।
  •  जब चाहे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान कर दिया जाता है। बीच-चौराहे पर ध्वज जलाकर सरकार को सीधे-सीधे चुनौती दी जाती है।
  • घाटी में जाने वाले वाहनों से अलगाववादियों ने वीजा मांगना शुरू कर दिया है।
  • २० वर्षों में १६०० से अधिक दिन हड़ताल में बीते हैं। यानी २० वर्षों में पांच वर्ष हड़ताल और बंद में बीते हैं।

सोमवार, 20 सितंबर 2010

रैन, रिले और रिश्ते

क्वींस बैटन रिले का सम्मान भी और विरोध भी
फिर दिखी सांप्रदायिक एकता की झलक मेरे शहर में
 १९  सितंबर खास रहा ग्वालियर के लिए। एक तो १९ वें कॉमनवेल्थ गेम्स की क्वींस बैटन रिले का आगमन था। जाते-जाते बदरा इतना बरसे की शहर का हर जर्रा भीग गया। इक और खास और अति महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहा उदारवादी मुसलमानों का सही बात के लिए आगे आना।
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क्वींस बैटन रिले का विरोध करते लोग।
शनिवार-रविवार दरमियानी रात से ही शहर में बादलों ने नेमत बरसानी शुरू कर दी। जो अभी यानी रविवार-सोमवार की रात १:२६ मिनट पर भी जारी है। मानसून बीत गया। पहली बार बरसाती (रैनकोट) पहनकर दफ्तर आना पड़ा। इसी झमाझम बारिस में शाम के वक्त क्वींस बैटन रिले का आगमन हुआ। जिसकी शहरभर में परिक्रमा कराई गई। नतीजतन जगह-जगह जाम लगा। लोगों को खामख्वाह परेशानी उठानी पड़ी। घुटनों तक पानी से भरी सड़क पर जाम खुलने का इंतजार किया। जगह-जगह शहर की विभिन्न संस्थाओं ने बैटन रिले का स्वागत किया। वहीं एक ओर एक सामाजिक संस्था ने वीरागंना महारानी लक्ष्मीबाई समाधी के सामने बैटन रिले का विरोध किया। उसे गुलामी का प्रतीक माना। कुल मिला कर बैटन रिले की अच्छी झांकी जम गई। हां एक और बात बताते हैं जहां प्रदेश के मुखिया शिवराज चौहान ने बैटन रिले को थामने से इनकार कर दिया। वहीं उनकी पार्टी की ग्वालियर महापौर समीक्षा गुप्ता और क्षेत्रीय सांसद यशोधरा राजे सिंधिया ने शहर में इसकी आगवानी की।
यूं ही कायम होंगे मीठे रिश्ते
शांति की अपील के लिए आगे आए मुस्लिम।
  दूसरी बात पर आते हैं जो इस समय बहुत महत्वपूर्ण है। २४ सितंबर को अयोध्या राम जन्मभूमि का फैसला आना है। दोनों पक्षों (हिन्दू-मुसलमान) को बड़ी बेसब्री से इसका इंतजार है। जरा-सी चिंगारी धार्मिक भावनाएं भड़का सकती है। यह जानकर सभी लोग शांति की कामना लेकर आगे आ रहे हैं। दोपहर में एक टीवी चैनल पर बहस देख रहा था। वहां भी दोनों पक्षों के बड़े नेता धैर्य से काम लेने की बात करते दिखे। उन्होंने भी लोगों से शांति की अपील की। मेरे शहर के मुसलमान बंधुओं ने भी एक मिशाल कायम करने की कोशिश की। वे हाथ में बैनर-पोस्टर लेकर शहर में निकले। जिन पर लिखा था- हम अमन चाहते हैं। बहुत अच्छा लगा, देखकर। मैं अक्सर कहता भी रहता हूं कि अच्छी बात कहने के लिए जो उदारवादी मुसलमान हैं उन्हें आगे आना होगा। अक्सर होता यह है कि कट्टरवादी सोच के मुस्लिम उन्हें पीछे छोड़ देते हैं या उनकी आवाज का गला घोंट देते हैं। जिससे मुस्लिम समुदाय के सकारात्मक लोगों का पक्ष सामने नहीं आ पाता। आज जो हुआ यह एक अच्छी पहल है। इससे पहले भी मैं एक बार सांप्रदायिक एकता की मिशाल अपने शहर में देख चुका हूं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दशहरे पर प्रतिवर्ष पथ संचलन निकलता है। जिसका जगह-जगह लोग फूल बरसा कर स्वागत करते हैं। बीते वर्ष मैंने देखा कि एक-दो मुस्लिम गुट भी पथ संचलन के स्वागत के लिए आगे आए। उपनगर ग्वालियर में संघ की एक शाखा पर कुछ मुस्लिम बालक और  युवा भी आते रहे हैं। इन बातों से यह मत सोचना कि मेरे शहर में कट्टर मानसिकता के मुसलमान नहीं रहते। वे भी बड़ी संख्या में रहते हैं। एक-दो बार पाकिस्तान के लिए जासूसी करते भी धरे गए हैं तो कुछ बस्तियों में  पाकिस्तान के जीतने पर आतिशबाजी भी करते हैं। मैं आज इसीलिए खुश हूं कि उनको पीछे धकिया कर उदारवादी और सच्चा मुसलमान अब आगे आ रहा है।

बुधवार, 15 सितंबर 2010

हिन्दी हृदय की भाषा है

''हिन्दी में भाव हृदय की गहराई से निकलते हैं और अंग्रेजी में दिमाग की ऊपरी सतह से।"
इन्ही में एक है कुशल शर्मा..
 १४   सितंबर है, हिन्दी दिवस है। सबने लिखा, खूब लिखा। समर्थन में लिखा। विरोध में लिखा। किसी ने बहुत अच्छा लिखा तो किसी ने औसत लिखा। किसी न किसी तरह हिन्दी को याद किया। एक मैं ही रह गया था। हिन्दी की सेवा में ही उलझा था। फुरसत हुई तो देखा हिन्दी दिवस को अंग्रेजी कलेण्डर के हिसाब से बीते हुए २० मिनट हो चुके हैं, लेकिन एक ऐसी याद जेहन में आ गई कि लिखने को बैचेन हो उठा। व्यक्तिगत अनुभव है हो सकता है उससे सब सहमत न हो। वैसे भी किसी के अनुभव ही क्या, किसी के विचार से सब सहमत हो ऐसा नहीं होता। अगर ऐसा होता तो निश्चित ही आज भारत में हिन्दी का बोलबाला उतना ही होता, जितना आज हिन्दी प्रेमियों और सेवियों ने चाहा है। खैर बात को आगे बढ़ाते हैं। बात कोई आठ-नौ साल पुरानी होगी। मैं दिल्ली और हरियाणा की सीमा पर स्थित साधना स्थली झिंझौली में एक शिविर में प्रशिक्षण ले रहा था। यह शिविर सूर्या फाउंडेशन ने आयोजित किया था। यह संस्था बड़े नेक उद्देश्य के साथ समाजकार्य में लगी है।
.          यहीं मेरी कई लोगों से मित्रता हुई। जिससे मेरी दोस्ती उडीसा, पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, औरंगाबाद और दिल्ली सहित कई राज्यों तक फैल गई। सभी मित्रों से पत्रों के माध्यम से जीवंत संपर्क था। डाकिया मेरी मां से कहता था कि आपका लड़का करता क्या है? भारत के कई राज्यों से इसके पत्र आते रहते हैं। मैं भी एक साथ सौ-दो सौ पोस्टकार्ड खरीद लाता था। स्थानीय पोस्ट ऑफिस के बाबू कभी भी २५-५० से अधिक पोस्टकार्ड देते ही नहीं थे, तो सीधे मुख्य डाकघर से ही खरीदने पड़ते थे। हां तो इन्हीं दोस्तों में से एक अजीज था कुशल शर्मा। पंजाब से है। एकदम मस्तमौला। उसने शिविर के दौरान मुझे भांगड़ा सिखाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन वह सफल नहीं हो पाया। उसके और मेरे बीच में प्रति सप्ताह दो पत्र तय थे। मेरी अंग्रेजी बहुत कमजोर थी और आज भी वैसी ही लंगड़ी है। उसने एक दफा कहा कि चल आज से हम अंग्रेजी में पत्र लिखा करेंगे जिससे तेरी अंग्रेजी अच्छी हो जाएगी। फिर शुरू हुआ अंग्रेजी पत्राचार। काफी लम्बे समय तक चला। उसके कहे अनुसार मेरी अंग्रेजी में निश्चित तौर पर सुधार हुआ। ठीक-ठीक याद नहीं फिर भी शायद उसका जन्मदिन था। इस अवसर पर मैंने उसे अंग्रेजी मैं पत्र नहीं लिखा, अपने हृदय की भाषा से अपने अंतर्मन के विचारों को अंतर्देशी पर उतारा था। पत्र का जवाब भी हिन्दी में ही आया। वह पत्र आज भी मेरे पास संभाल कर मेरे संदूक में रखा हुआ है। इस वक्त मैं कार्यालय में हूं वरना वह पत्र जरूर प्रकाशित करता। उसमें लिखा था- ''भाई आज से हम हिन्दी में ही पत्र लिखा करेंगे। हिन्दी में भाव हृदय की गहराई से निकलते हैं और अंग्रेजी में दिमाग की ऊपरी सतह से।"

सोमवार, 30 अगस्त 2010

क्यों बने आक्रांता का मकबरा?

बाबर कोई मसीहा नहीं अत्याचारी, अनाचारी, आक्रमणकारी और इस देश के निवासियों का हत्यारा है
सितम्बर में अयोध्या (अयुध्या, जहां कभी युद्ध न हो) के विवादित परिसर (श्रीराम जन्मभूमि )  के मालिकाना हक के संबंध में न्यायालय का फैसला आना है। जिस पर चारो और बहस छिड़ी है। फैसला हिन्दुओं के हित में आना चाहिए क्योंकि यहां राम का जन्म हुआ था। वर्षों से यहां रामलला का भव्य मंदिर था, जिसे आक्रांता बाबर ने जमींदोज कर दिया था। एक वर्ग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि निर्णय मुसलमानों के पक्ष में होना चाहिए, क्योंकि वे बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं। उनकी आस्थाएं हिन्दुओं की आस्थाओं से अधिक महत्व की हैं। मुझे इस वर्ग की सोच पर आश्चर्य होता है। कैसे एक विदेशी क्रूर आक्रमणकारी का मकबरा बने इसके लिए सिर पीट रहे हैं। एक बड़ा सवाल है - क्या अत्याचारियों की पूजा भी होनी चाहिए? क्या उनके स्मारकों के लिए अच्छे लोगों के स्मारक को तोड़ देना चाहिए? (कथित बाबरी मस्जिद रामलला के मंदिर को तोड़कर बनाई गई है।), क्या लोगों की हत्या करने वाला भी किसी विशेष वर्ग का आदर्श हो सकता है? (बुरे लोगों का आदर्श बुरा हो सकता है, लेकिन अच्छे लोगों का नहीं। रावण प्रकांड पंडित था, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दु समाज का आदर्श नहीं। कंस बहुत शक्तिशाली था, लेकिन कभी हिंदुओं का सिरोधार्य नहीं रहा। हिन्दुओं ने कभी अत्याचारियों के मंदिर या प्रतीकों के निर्माण की मांग नहीं की है। फिर एक अत्याचारी और विदेशी का मकबरा इस देश में क्यों बनना चाहिए? क्यों एक वर्ग विशेष इसके लिए सिर पटक-पटक कर रो रहा है।)
    इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव
काबुल-गांधार देश, वर्तमान अफगानिस्तान की राजधानी है। १० वीं शताब्दी के अंत तक गांधार और पश्चिमी पंजाब पर लाहौर के हिन्दूशाही राजवंश का राज था। सन् ९९० ईसवी के लगभग काबुल पर मुस्लिम तुर्कों का अधिकार हो गया। काबुल को अपना आधार बनाकर महमूद गजनवी ने बार-बार भारत पर आक्रमण किए। १६ वीं शताब्दी के शुरू में मध्य एशिया के छोटे से राज्य फरगना के मुगल (मंगोल) शासक बाबर ने काबुल पर अधिकार जमा लिया। वहां से वह हिन्दुस्तान की ओर बढ़ा और १५२६ में पानीपत की पहली लड़ाई विजयी होकर दिल्ली का मालिक बन गया। परन्तु उसका दिल दिल्ली में नहीं लगा। वही १५३० में मर गया। उसका शव काबुल में दफनाया गया। इसलिए उसका मकबरा वहीं है।
         बलराज मधोक ने अपनी पुस्तक 'जिन्दगी का सफर-२, स्वतंत्र भारत की राजनीति का संक्रमण काल'  में उल्लेख किया है कि वह अगस्त १९६४ में काबुल यात्रा पर गए। वहां उन्होंने ऐतिहासिक महत्व के स्थान देखे। संग्रहालयों में शिव-पार्वती, राम, बुद्ध आदि हिन्दू देवी-देवताओं और महापुरुषों की पुरानी पत्थर की मूर्तियां देखीं। इसके अलावा उन्होंने काबुल स्थित बाबर का मकबरा देखा। मकबरा ऊंची दीवार से घिरे एक बड़े आहते में स्थित था। परन्तु दीवार और मकबरा की हालत खस्ता थी। इसके ईदगिर्द न सुन्दर मैदान था और न फूलों की क्यारियां। यह देख बलराज मधोक ने मकबरा की देखभाल करने वाले एक अफगान कर्मचारी से पूछा कि इसके  रखरखाव पर विशेष ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? उसका उत्तर सुनकर बलराज मधोक अवाक् रह गए और शायद आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएं। उसने मधोक को अंग्रेजी में जवाब दिया था - “Damned foreigner why should we maintain his mausaleum.”  अर्थात् कुत्सित विदेशी विदेशी के मकबरे का रखरखाव हम क्यों करें?
       काबुल में वह वास्तव में विदेशी ही था। उसने फरगना से आकर काबुल पर अधिकार कर लिया था। परन्तु कैसी विडम्बना है कि जिसे काबुल वाले विदेशी मानते हैं उसे हिन्दुस्तानी के सत्ताधारी और कुछ पथभ्रष्ट बुद्धिजीवी हीरो मानत हैं और उसके द्वारा श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर बनाई गई कथित बाबरी मस्जिद को बनाए रखने में अपना बड़प्पन मानते हैं। इसका मूल कारण उनमें इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव होना है।
लगातार बाबर के वंशजों के निशाने पर रही जन्मभूमि : पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी गुट लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद ने पिछले कुछ वर्षों में करीब आठ बार रामलला के अस्थाई मंदिर पर हमले की योजना बनाई, जिन्हें नाकाम कर दिया गया। ५ जुलाई २००५ को तो छह आतंकवादी मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच गए थे। जिन्हें सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दो लड्डू और पंद्रह अगस्त

 ई साल बीत गए बोलते हुए गांधी जी की जय। वह वर्षों से देखता आ रहा है, स्कूल, तहसील और पंचायत की फूटी कोठरी पर तिरंगे का फहराया जाना। इतना ही नहीं मिठाई के लालच में हर साल शामिल होता है वह २६ जनवरी और १५ अगस्त के कार्यक्रम में, लेकिन अब तक नहीं समझ पाया बारेलाल आजादी का अर्थ
            दोपहर हो गई थी। सूरज नीम के विशाल पेड़ के ठीक ऊपर चमक रहा था। पेड़ चौपाल के ठीक बीच में था। नीम इतना विशाल था कि उसकी शाखाओं ने पूरी चौपाल और आसपास के रास्ते को ढक रखा था। इस वक्त चौपाल पर सूरज की एक-दो किरणें ही नीम की शाखाओं से जिरह करके आ पा रही थीं वरना तो पूरी चौपाल नीम की शीतल छांव के आगोश में थी। इधर-उधर कुछ बच्चे कंचे खेल रहे थे और कुछ बुजुर्ग नित्य की तरह ताश खेल रहे थे। पंचू कक्का अपनी चिलम बना रहे थे। उनका एक ही ऐब था चिलम पीना। यह भी उम्र के साथ आया। चौपाल पर इस वक्त लोगों का आना शुरू हो जाता है। बारेलाल भी अपने पशुओं को इसी वक्त पानी पिलाकर सीधे चौपाल पर आता है। आज उसे आने में थोड़ी देर हो गई थी। बारेलाल आज बड़े मास्साब के साथ आ रहा था।
           मास्साब ने आते ही पंचू कक्का को राम-राम कहा। कक्का ने पूछा- काहे बड़े बाबू कैसे हो? भोत दिनन में इतको आए हो, काहा बात है? सब खैरियत तो है। मास्साब ने कहा-बस दादा सब ईश्वर की कृपा और आपका आशीर्वाद है। बात यह है कि दो दिन बाद १५ अगस्त है। सो आपको न्योता देने आया था। कक्का की चिलम अब तक तैयार हो चुकी थी। उन्होंने एक दम लगाकर कहा-अरे मास्टर जी जा काम में न्योता की का जरूरत है, हम तो हर साल अपए आप ही चले आत हैं। सब बच्चा लोगन का नाटक, गीत-संगीत सुनत हैं। मास्साब ने सहमति में सिर हिलाते हुए निवेदन किया-कक्का वो तो हम भी जानते हैं आप स्कूल को लेकर बड़े संजीदा रहते हैं। बीच-बीच में भी बच्चों की पढ़ाई की जानकारी लेते रहते हैं। इस बार हम आपको स्वाधीनता दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में न्योता देने आए हैं। कक्का ने हंसते हुए कहा- अरे सरकार रहन दो आप। अतिथि और काहू को बनाए लो, हम तो ऐसेई आ जाएंगे। बारेलाल ने भी हां में हां मिलाई। मास्साब चाहते थे कि इस बार कक्का को ही मुख्य अतिथि बनाया जाए। असल में वह कक्का के विचारों और बच्चों की पढ़ाई को लेकर उनकी सजगता से काफी प्रभावित थे। कक्का की मदद से ही जर्जर स्कूल भवन का जीर्णोद्धार हो सका था। जब से गांव में शराब का प्रचलन बढ़ा, बुराइयों का जमावड़ा गांव में हो गया था। शराबी बोतल की जुगाड़ के लिए स्कूल के गेट-खिड़की तक उखाड़ ले गए थे। वो तो कक्का ही थे जिन्होंने पहल करके स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था चौकस की। मास्साब ने जिद करके उनसे कहा कि नहीं इस बार तो आपको ही झंडा फहराना है। बड़े मास्साब सहमति प्राप्त करके वापस चले गए।
          मास्साब के जाने के बाद व्याकुल बारेलाल ने पंचू कक्का से कहा-कक्का ये १५ अगस्त का होत है और ये १५ अगस्त को ही काए आतो है। तब कक्का ने उसे विस्तार से भारत का इतिहास सुनाया। तब जाकर बारे बारेलाल को कुछ पल्ले पड़ा। उसने सिर खुजाते हुए कहा-धत् तेरे की! मैं तो अब तक जो सब जानत ही नहीं हतो। मैं तो बस जई जानतो हतो की जा दिना पुराने स्कूल और तहसील की पीली बिल्डिंग पर झंडा लहराओ जात है। और सही बताऊं तो मैं जा दिना स्कूल में सिर्फ दो लडुआ (लड्डू) लेवे ही जात हतो। अब समझ में आई जै दिन तो हमें बड़े जतन के बाद नसीब हुआ था। जै हो उन वीरां लोगन की जिनकी बदौलत हमें आजादी की आबो-हवा मिली है।

बुधवार, 11 अगस्त 2010

कपटी लोगों का धर्म इस्लाम

चर्च में जलाई जाएंगी कुरान
बर है कि फ्लोरिडा के एक चर्च में ११ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुरान को जलाने (इंटरनेशनल बर्न ए कुरान डे) के दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। न्यूयॉर्क के समाचार पत्रों के अनुसार ११ सिंतबर २००१ को हुए आतंकी हमले की घटना की नौवीं बरसी पर चर्च ने यह कदम उठाने का फै सला लिया है। फ्लोरिडा के 'द डोव वल्र्ड आउटरीच सेंटरÓ में ९/११ की बरसी पर एक शोक सभा आयोजित की जाएगी। जिसके तहत इस्लाम को कपटी और बुरे लोगों का धर्म बताकर कुरान को जलाया जाएगा।
संसद में उछला मुद्दा
चर्च द्वारा कुरान की प्रतियां जलाने के बारे में अमरीकी चर्च की घोषणा के मुद्दे को ९ अगस्त सोमवार को लोकसभा में उठाते हुए इस पर चर्चा कराए जाने की मांग की गई। बसपा डॉ. शफीकुर रहमान बर्क ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार को अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के समक्ष इस मसले को रखना चाहिए। भारत और दुनिया के मुसलमान अपने पवित्र धर्मग्रंथ के किसी भी तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
नोट:- इस महाशय ने कभी-भी उस वक्त आपत्ति दर्ज नहीं कराई, जब मुस्लिमों द्वारा कई बार बीच सड़क पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज जलाए। लगता है ये देश का अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं... साथ ही इन्हें दूर देश में क्या हो रहा है इस बात की तो चिंता रहती है, लेकिन अपने देश में सांप्रदायिक ताकतें क्या गुल खिला रही हैं यह नहीं दिखता।
कुरान- इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब थे। इनका जन्म अरब देश के मक्का शहर में सऩ ५७० ई में हुआ था। अपनी कट्टर सोच के कारण इन्हें अपनी जान बचाने के लिए मक्का से भागना पड़ा। इस्लाम के मूल हैं-कुरान, सुन्नत और हदीस। कुरान वह ग्रंथ है जिसमें मुहम्मद साहब के पास ईश्वर के द्वारा भेजे गए संदेश संकलित हैं। कुरान का अर्थ उच्चरित अथवा पठित वस्तु है। कहते हैं कुरान में संकलित पद (आयतें) उस वक्त मुहम्मद साहब के मुख से निकले, जब वे सीधी भगवत्प्रेरणा की अवस्था में थे।
मुहम्मद साहब २३ वर्षों तक इन आयतों को तालपत्रों, चमड़े के टुकड़ों अथवा लकडिय़ों पर लिखकर रखते गए। उनके मरने के बाद जब अबूबक्र पहले खलीफा हुए तब उन्होंने इन सारी लिखावटों का सम्पादन करके कुरान की पोथी तैयार की, जो सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है।
ईसाइयों से विरोध
कुरान सबसे अधिक जोर इस बात पर देती है कि ईश्वर एक है। उसके सिवा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। हिन्दुओं से तो इस्लाम का सदियों से सीधा विरोध है। हिन्दू गौ-पालक और गौ-भक्त हैं तो मुस्लिम गौ-भक्षक, हिन्दू मूर्ति पूजा में विश्वास करते हैं तो इस्लाम इसका कट्टर विरोधी है। ईसाइयों से भी उसका इस बात को लेकर कड़ा मतभेद है कि ईसाई ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र कहते हैं। कुरान का कहना है कि ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र कतई नहीं हो सकते, क्योंकि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुण को जोडऩा उसे मनुष्य की कोटि में लाना है।
दोनों से भला हिन्दुत्व
कुछ लोगों को हिन्दुत्व से बड़ी आपत्ति है, लेकिन मैं भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं कि मैं हिन्दू जन्मा। हिंदू होने के नाते मुझे सभी धर्मों का आदर करने की शिक्षा मिली है। मैं मंदिर जा सकता हूं, मस्जिद और दरगाह पर श्रद्धा से शीश झुका सकता हूं और चर्च में प्रार्थना भी कर सकता हूं। जिस तरह से एक आतंककारी घटना से ईसाइयों में इस्लाम के प्रति इतना क्रोध है कि कुरान को चर्च में जलाने का निर्णय ले लिया। इससे तो हिन्दू भले हैं। हिन्दुओं ने तो मुगलों के अनगिनत आक्रमण और आंतकी हमले झेले हैं, लेकिन कभी भी कुरान जैसे ग्रंथ को जलाने का निर्णय नहीं लिया। भले ही इस देश के मुसलमान सड़कों पर यदाकदा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जलाते रहे हों या फिर राष्ट्रगीत वन्देमातरम् के गाने पर एतराज जताते हों।
                असल में इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्म अति कट्टर हैं। वे अपने से इतर किसी अन्य धर्म की शिक्षाओं को न तो ठीक मानते हैं और न उनका आदर करते हैं। एक ने अपने धर्म का विस्तार तलवार की नोक पर किया तो दूसरे ने लालच, धोखे और षडय़ंत्र से भोले-मानुषों को ठगा। खैर चर्च में कुरान जलाने का मसला तूल पकड़ेगा। इसके विरोध में पहली प्रतिक्रिया भारतीय संसद में हो चुकी है।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

इसे कहते हैं मति फिरना

लगता है सरकार और सरकार के लोग पगलाय गए हैं?
मने कई बार अपने से बड़ी उम्र या हमउम्र लोगों से सुना होगा कि तेरी मति फिर गई है क्या? जो इस तरह का काम कर रहा है। दूसरा वाक्य बदल भी सकता है। जैसे तेरी मति फिर गई है क्या? जो वहां मरने के लिए जा रहा है। अपन ने भी कई बार सुना है और हर बार सोचा है कि मति कैसे फिरती है? मति चकरी की तरह गोल-गोल फिरती है क्या? या फिर बावरे मन की तरह यहां-वहां फिरता है? नहीं तो यह होता होगा कि मति पहले खोपड़ी के आगे वाले हिस्से में होती होगी बाद में फिर कर पीछे चली जाती होगी, तब कहते होंगे मति फिर गई। जो भी हो अपन तो समझे नहीं उस समय, क्योंकि तब अपन बच्चे थे सो थोड़े कच्चे थे जी। अब केंद्रीय सरकार के एक कानून के बारे में सुनकर समझ आ गया है। पता चला है कि केंद्र एक नए कानून को व्यवहार में लाने की सोच रहा है, जिससे बच्चों पर हो रहा अत्याचार रुकेगा। कानून में तय किया जा रहा है कि गुरुजन ही नहीं माता-पिता भी अपने बच्चे को पिटाई नहीं कर सकेंगे। अगर वे बच्चों को पीटते हैं तो उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।
        लगता है केंद्र में बैठे लोगों की मति ही फिरी होगी तभी इस कानून को लाने का विचार किया गया। अब भला सज्जन पुरुषों से यह पूछो कौन माता-पिता अपने बच्चे को जान-बूझकर मारना चाहते हैं और क्या उनकी मार में अत्याचार होता है? क्या वह मां बच्चे पर अत्याचार कर सकती है जो खुद नौ माह कष्ट में रह कर उसे जन्म देती है? पैदा होने के बाद उसे अपने कलेजे से चिपकाकर रखती है। क्या वह मां उस पर बेवजह लाठी चला सकती है? जिसे वह बड़े लाड़ से पालती है, बिझौना जब बच्चे के सूसू से गीला हो जाता है तो वह ममता की मूर्ति स्वयं गीले में सो जाती है और अपने कलेजे के टुकड़े को सूखे में सुलाती है। पिता की बात करें तो वह भी बच्चे को प्रेम करने में मां से कहीं पीछे नहीं रहता। बाहर से कठोर दिखने वाला पिता अंदर से मां सा ही कोमल होता है। उसका बच्चा सुख से जी सके इसके लिए ही तो पिता सारे जतन करता है। क्या ये माता-पिता बच्चे पर अत्याचार कर सकते हैं? मुझे तो लगता है नहीं कर सकते। यह लिखने से पहले मैं कई लोगों से इस विषय पर बहुत लोगों से चर्चा कर चुका हूं। सबने ऐसे कानून की उपयोगिता पर आश्चर्य व्यक्त किया। तो क्या केंद्र सरकार में बैठे लोगों की मति फिर गई है? लगता तो यही है। वे जो कानून बना रहे हैं उसके तहत अगर माता-पिता बच्चे को मारते हैं तो उन्हें जेल हो सकती है, जुर्माना भी देना होगा। जो कानून बनने चाहिए उन पर तो सरकार ध्यान नहीं दे रही, लेकिन ऐसे हास्यपद कानूनों की तैयारी में जुटी है। आतंकवाद रुके, नक्सलवाद को नकेल लगे, महंगाई डायन के अत्याचार से जनता को कैसे बचाएं, लगातार बढ़ रहे अपराध को कैसे रोका जाए। इन सब पर तो कुछ काम नहीं किया जा रहा।
        मेरा मत है कोई भी गुरुजन व माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षा देने के लिए थोड़ा-बहुत पीट सकता है, जो अत्याचार की श्रेणी में नहीं आता। यह जरूरी भी है वरना बच्चों को बिगडऩे से कोई नहीं रोक सकेगा। मान लो सरकार यह कानून कठोरता से लागू कर देती है तो क्या स्थितियां निर्मित होंगी।
  • - बच्चे का मन स्कूल जाने का नहीं हो रहा, माता-पिता उसे पिटाई का डर तो दिखा नहीं सकते। ऐसे में हो सकता है वे उसे स्कूल जाने के लिए कोई लालच दें, अगर ऐसा होता है तो बच्चे में रिश्वत लेने की आदत बचपन से ही पैदा हो जाएगी।
  • - बच्चा स्कूल का होमवर्क ले जाए या नहीं टीचर उसे पीट तो सकता नहीं है। माता-पिता से शिकायत करके भी क्या फायदा। क्लास रूम में धमा-चौकड़ी मचाते हैं तो भी शिक्षक कुछ न कर सकेंगे।
  • - माना वह शिक्षक उसे डांट और बालक इसका बदला लेने के लिए शिक्षक के मुंह पर थूक दे, चांटा मार दे, धूल फेंक दे या फिर शिक्षक रास्ते से जा रहा हो और वह उन्हें पत्थर मार दे। तब क्या किया जाए?
  • - बच्चा सुबह से कार्टून चैनल देख रहा है। मना करने और समझाने पर मान नहीं रहा, तब माता-पिता क्या करें? क्या जेल जाने के भय से उसे अपना भविष्य खराब करते रहने दें। उसे लगातार टीवी देखकर अपनी आंखे खराब करते रहने दिया जाए।
  • - वह गली-मोहल्ले में किसी दूसरे बच्चे से मारपीट करके आता है, तब क्या करें परिजन की वह भविष्य में ऐसा न करें।
  • - पत्थरों से वह पड़ोसियों के खिड़की के कांच तोड़ दे, तब पिता उसे कैसे समझाए और समझाने के बाद बार-बार वह ऐसा करे तब क्या करें?
  • - मान लो वह कहीं से गंदी-गंदी गालियां सीखकर आता है और जोर-जोर से बकता है। आपकी लड़की को भी वह अपशब्द कहे तो क्या करोगे?
         लगता है यह सब केंद्र सरकार ने सोचा ही नहीं। लगता है मति फिरने के बाद दिमाग सोचना बंद कर देता होगा। ऐसे में तो बच्चों का वर्तमान ही नहीं भविष्य भी खराब हो जाएगा। सरल-सी बात है कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को बेवजह नहीं मारता। उनकी मार में भी सीख होती है। उपरोक्त स्थितियों में बच्चा समझाने से न समझेगा तो दण्ड स्वरूप उसकी पिटाई करनी ही पड़ेगी वरना वह उद्ण्ड़ होकर समाज के लिए समस्या बन जाएगा। सरकार को चाहिए बादम (इसे खाने से दिमाग ठीक रहता है और सही काम करता है) खाए और जरूरत की जगह बुद्धि का इस्तेमाल करे। आतंकवाद, उग्रवाद, धर्मांतरण, घुसपैठ, अपराध पर रोक लगाने और देश की तरक्की में सहायक कानूनों का मसौदा तैयार करने पर ध्यान दे।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

...ऐसे तो ब्रिटेन के म्यूजियम खाली हो जाएंगे

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन अपनी पहली दो दिवसीय यात्रा पर भारत आए। सुना है कि ब्रिटेन को फांके पड़ रहे हैं। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बदहाल है। प्रधानमंत्री डेविड कैमरन की इस यात्रा मुख्य उद्देश्य ब्रिटेन की डूबती नैया के लिए सहारा जुटाना था। कैमरन भारत के साथ व्यापार बढ़ाना चाहते हैं और 600 अरब रुपए के सौदे को भुनाने की ताक में थे।  जिसमें उन्हें कामयाबी हासिल हुई।
         चलिए शीर्षक से जुड़े विषय पर आते हैं। कैमरन ने एक अंग्रेजी खबरिया चैनल को साक्षात्कार दिया है। साक्षात्कार में डेविड कैमरन उस वक्त सोच में पड़ गए, जब साक्षात्कारकर्ता ने उनसे प्रश्न किया - 'भारत सरकार यदि ब्रिटेन से कोहिनूर मांगता है तो क्या ब्रिटिश सरकार कोहिनूर दे सकेगी?' प्रश्न सुनते ही जेम्स टेंशन में आ गए और सोच-विचारने वाली मुद्रा में बैठ गए। थोड़ी देर बाद बोले - 'यह तो संभव नहीं है, क्योंकि एक के लिए हां बोला तो ब्रिटेन का सारा म्यूजियम खाली हो जाएंगा।' उन्होंने ठीक ही कहा था, कहने से पहले सोचा भी था न। वैसे तो यह मुद्दे से इतर जाने का अच्छा जवाब था, लेकिन बहुत कुछ सच तो इसमें भी छुपा था। वो यूं कि, कैमरन का कहना था, यदि वह एक कोहिनूर को वापस करने के लिए हां बोलते है तो हो सकता है कि एक-एक कर सारी लूटी हुई वस्तुओं की मांग भारत करने लगे, फिर तो ब्रिटेन के  सारे म्यूजियम खाली होने ही हैं। क्योंकि ब्रिटेन के म्यूजियम लूटी हुई चीजों से ही भरे और सजे पड़े हैं। दो सौ साल बहुत होते हैं किसी देश को लूटने के लिए। ब्रिटेन  व्यापार का बहाना लेकर इस देश में घुसा और फिर धीमे-धीमे उसने लूटमार मचाना शुरू किया जो करीब दो सौ साल चला। उसी दो सौ साल में जो कुछ लूटा उसमें से आंशिक ही हिस्सा है जो ब्रिटेन के म्यूजियमों की शोभा बढ़ा रहा है। बाकी का बहुत सारा हिस्सा तो कहां, किस ब्रिटश कंपनी के अफसर के पेट में और अन्य जगह खप गया होगा पता नहीं।
          इतना ही नहीं सवाल और जवाब के बीच उन्होंने यह भी सोच लिया होगा कि अगर ब्रिटेन भारत के लिए हां करता है तो बाकि के वे देश भी तो अपनी चीजें वापस मांग सकते हैं, जो कभी अत्याचारी ब्रिटिश उपनिवेश के गुलाम हुआ करते थे। इस तंगहाली के दौर में अगर सबने अपनी-अपनी चीजें मांगनी शुरू कर दीं तो ब्रिटेन नंगा हो जाएगा।
इससे शायद महोदय पी. चिदंबरम की आंखे खुलें
    इस मामले से मुझे याद आया कि अक्टूबर 2007 में पी. चिदंबरम ने कहा था कि भारत तो कभी सोने की चिडिय़ा रहा ही नहीं। वे उस समय वित्त मंत्री हुआ करते थे। मुझे उस समय चिदंबरम की बुद्धि पर बड़ा आश्चर्य हुआ था कि पता नहीं इतना बड़ा सच पी. चिदंबरम साहब कहां से खोज लाए हैं? बचपन से तो हम यही पढ़ते आ रहे थे कि इस देश में अकूत संपदा थी जिसे समय-समय पर लुटेरों ने लूट लिया। हाथी, घोड़ों और ऊंटों पर लादकर ले गए। इतना ही नहीं कई आक्रांताओं ने तो बार-बार लूट मचाई। चिदंबरम द्वारा उद्घाटित यह सच तो उन वामपंथियों बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों की नजरों से भी औझल रहा, जो समय-बेसमय भारत को दीन-हीन और असभ्य बताते रहे हैं। चिदंबरम साहब को उस वक्त मैंने अपने शहर के एक प्रतिष्ठित अखबार में पत्र संपादक के नाम पत्र लिखकर पूछा था कि .....
- अगर भारत गरीब और कंगाल था तो क्यों विभिन्न आक्रांताओं ने इस देश पर बार-बार आक्रमण किया?
- क्यों बाबर (एक अत्याचारी जिसके तथाकथित मकबरे के लिए इस देश में खूब खून बहा है और राजनीति हुई है और हो री है। इतना ही नहीं इस देश के कई लोगों ने इस लुटेरे को अपना आदर्श बना रखा है।), तैमूर लंग और मुहम्मद गजनी, मुहम्मद गौरी आदि ने भारत में लूट मचाई?
- भारत गरीब था तो क्यों ईस्ट इंडिया कंपनी यहां व्यापार के लिए आई और नंगो-भिखारियों के देश में दो सौ साल तक क्या करती रही?
         इन सवालों की गूंज पी. चिदंबरम के कानों तक तो उस समय न पहुंची होगी, लेकिन उम्मीद करता हूं कैमरन ने जो कहा उस पर तो उन्होंने गौर किया ही होगा। आखिर महाशय भारत के गृह मंत्री हैं।

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

और खूंखार हो गए सचिन

चिन के बारे में सिद्ध हो चुका है कि वे अपने आलोचकों को जवाब माइक से नहीं बल्कि अपने बल्ले से देते हैं। सचिन के खेल पर जब-जब किसी ने ऊंगली उठाई है, तब-तब उन्होंने इसका करारा जबाव बल्ले से दिया है।  अभी-अभी 168 वें मैच में पांचवा दोहरा शतक ठोककर उन्होंने सुनील गावस्कर (टेस्ट में चार दोहरे शतक) को पीछे छोड़ते हुए राहुल द्रविड़ की बराबरी कर ली है। टेस्ट क्रिकेट में अब उनके 48 शतक हो गए हैं।  इसके साथ ही टेस्ट और वनडे में उनके कुल 94 शतक हो चुके हैं और वे शतकों के शतक से महज 6 कदम पीछे हैं।  पिछले तीन सालों से उन्होंने जो गति पकड़ी है उसे देखकर तो लगता है वे जल्द ही शतकों के शतक की चोटी पर होंगे। श्रीलंका के खिलाफ इस दूसरे मैच में सचिन ने 19 वीं बार 150 से या इससे अधिक रन बनाने का सर डान बै्रडमैन का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया। इम मामले में वे अब वेस्टइंडीज के लारा की बराबरी पर हैं।
.       उनका यह दोहरा शतक उन लोगों के लिए जवाब है जो उन्हें बूढ़ा (सचिन की दाड़ी के बाल सफेद पक गए हैं।) मानकर कह रहे थे कि श्रीलंका का यह दौरा सचिन का आखिरी दौरा होगा। सचिन के बल्ले ने लगातार रनों की बारिश कर जता दिया कि उनकी उम्र जरूर 37 हो गई है, लेकिन मन तो अभी बच्चा है जी!  पिछले तीन सालों से उनके खेल को देखकर तो लगता है कि वे जवानी के दिनों से अधिक खूंखार हो गए हैं। क्रिकेट का कोई-सा भी फोर्मेट हो, उनका जोश काबिल-ए-तारीफ है। वनडे, 20-20 और टेस्ट सभी में वे लगातार बेहतरीन प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में उनका टेस्ट क्रिकेट का औसत 97 रहा है। वर्ष 2010 में अब तक छह टेस्ट मैंचों में पांच शतक लगा चुके हैं। हम आशा और प्रार्थना करते हैं कि सचिन इससे भी बेहतर प्रदर्शन करते रहें। ताकि अन्य देश के गेंदबाजों के दिल में भारत के इस शेर का खौफ बना रहे।
.           चलते-चलते मित्रों को एक जानकारी और दे देता हूं। हालांकि वह पहले ही आप तक पहुंच गई होगी। सचिन की आत्मकथा की विशेष प्रतियों में उनके खून के प्रयोग की बात निराधार है। सचिन ने मीडिया को यह जानकारी दी है कि किताब के पृष्ठ तैयार करने के लिए उनके रक्त के उपयोग की जानकारी बेबुनियाद है। वे ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं। यदि प्रकाशन मंडल ऐसी कोई योजना बना रहा है तो वे इस बात का समर्थन नहीं करेंगे। सचिन के फैन्स को इस खबर से कुछ राहत मिली है। सुनने में आ रहा था कि कई फैंस को किताब में खून के प्रयोग की बात अच्छी नहीं लग रही थी। 
वनडे में सचिन के दोहरे शतक का आंखो देखा हाल पढऩे के लिए क्लिक करें........ 

बुधवार, 21 जुलाई 2010

सचिन की आत्मकथा से करोड़ो प्रशंसकों को निराशा

 चिन के प्रशंसको के एक वर्ग को खासी प्रसन्नता हो सकती है यह जानकर कि सचिन की आत्मकथा छपकर आने जा रही है। किताब के रूप में वे सचिन को अपने पास सहेजकर रख सकेंगे। महान खिलाड़ी के प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे इस खबर से प्रसन्नता से अधिक निराशा हो रही है उसके अपने-अपने कारण हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि वे शायद ही सचिन की आत्मकथा को खरीद सके और तो और शायद ही उन्हें यह पढऩे को नसीब हो, क्योंकि सचिन की आत्मकथा की कीमत बहुत अधिक है। 
   ........ अद्भुत सचिन की तरह उनकी आत्मकथा को भी अद्भुत बनाया जा रहा है। किताब का नाम होगा तेंदुलकर ओपस (Tendulkar opus) आत्मकथा के प्रारंभिक दस संस्करण बहुत ही खास रहने वाले हैं। इनके हस्ताक्षर पृष्ठ में सचिन के खून के कतरे मिलाए जाएंगे। सचिन का खून कागज तैयार करते समय उसकी लुगदी में मिलाया जाएगा। इस पृष्ठ का रंग हल्का लाल रहेगा। उनके डीएनए की जानकारी भी इस किताब में शामिल रहेगी। इसमें 852 पृष्ठ होंगे। खास बात यह रहेगी कि इसमें सचिन से संबंधित ऐसे फोटोग्राफ्स होंगे जो पहले कहीं भी प्रकाशित नहीं हुए हैं। 2011 के क्रिकेट विश्वकप से पहले इसके बाजार में आने की उम्मीद है।
     ........ अब अगर आप इस खास किताब को खरीदने का मन बना रहे हैं तो आपको निराशा ही हाथ लगने वाली है। इसका कारण है कि इस खास संस्करण की एक प्रति की कीमत करीब 35 लाख रुपए है। अब 35 लाख रुपए एक किताब के लिए खर्च करना शायद आपके बस की बात न हो, मान लो आपके बस की है भी तो भी आप नहीं खरीद सकते क्योंकि ये सभी दस किताबों अभी से बुक हो चुकी हैं। इसके अलावा इस किताब करीब एक हजार सस्ते संस्करण निकाले जाने हैं। ये कितने सस्ते हैं यह तो इनकी कीमत सुनकर आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। इनकी कीमत 90 हजार से लेकर सवा लाख रुपए तक रहने वाली है। अब ऐसे में सचिन के ऐसे करोड़ो लोगों के लिए तो इस खबर से निराशा ही होगी जो दो जून की रोटी की जुगाड़ बमुश्किल कर पाते हैं। हम-तुम जो उनसे थोड़े सी ठीक स्थिति में हैं, मन होते हुए भी किताब खरीदने की हैसियत में नहीं। अब आम पाठक यह सोचे की चलो किसी पुस्तकालय में बैठकर ही सचिन की आत्मकथा पढ़ लेंगे तो शायद यह भी संभव न हो, क्योंकि इतनी मंहगी किताब बेजार हो रहे पुस्तकालय शायद ही खरीद पाएं। सो दोस्तो सचिन की आत्मकथा पढऩे का खयाल दिल से निकालना ही बेहतर होगा।

शुक्रवार, 16 जुलाई 2010

.... बुरे फंस गए यार

फ! बड़े दिन बाद कुछ लिखने का मौका मिला है। थोड़ी राहत की सांस ले रहा हूं। पत्रकारिता में आकर बुरा फंस गया हूं, लेकिन जितना फंसा हूं उतना ही मजा भी आ रहा है। .... तो साहब अपनी फिलहाल तो यह स्थिति है कि रबड़ी खा भी रहे हैं और उसके दोष भी गिना रहे हैं। जब से पत्रकारिता के मैदान में कूदा हूं न खाने का वक्त बचा है, न सोने का कोई ठीक समय है। हमारे पुरखे कहते हैं कि ब्रह्म मूहूर्त में उठो, लेकिन हम उसी समय सोने के लिए बिस्तर टटोलते हैं। सुबह का सूरज चादर तले कभी सपने में दिख जाए तो ठीक नहीं तो जय रामजी की। मध्य प्रदेश का वासी हूं सो जब आँख  खुलती है तो जलता हुआ बल्ब भी नसीब नहीं होता। इसी बात पर एक चुटकुला याद आया- एक अंग्रेज आया हिन्दी सीखने, मप्र में रहने लगा और जब गया तो दो वाक्य सीखे हिन्दी के दो वाक्य सीखे एक बिजली आ गई और दूसरा बिजली चली गई।  हां तो कह रहा था कि सुबह का सूरज... और शाम का डूब जाता है ऑफिस में,  कम्प्यूटर के आगे गिटर-पिटर करते-करते।
...........सामाजिक रिश्तों से यूं  दूर हुआ कि मेरे पडोस में रहने वाला दोस्त भी कहता है कि कहां गया था यार, बहुत दिन से दिखा नहीं। किताबें पढऩे का शौक तो लगता है बहुत दूर छूटते जा रहा है। कई दोस्तों से किताबें ले रखी हैं पढऩे के लिए वक्त मिले तो पढूं। उनकी किताबें वापस न करने से अपनी तो साख पर बट्टा लग गया है। जिसे देखो कह देता है देखो लोकेन्द्र बदल गया है इसे किताबें न देना, मेरी अभी तक वापस नहीं की हैं। पहले अपन जिससे किताब लेते थे नियत समय पर वापस करते थे या फिर थोड़ी शेष रहने की स्थिति में उससे अनुमति लेकर कुछ दिन रख लेते थे।
...........मेरी होने वाली पत्नी की सौत हो गई है पत्रकारिता। वो जब भी फोन करती हैं तब या तो हम सो रहे होते हैं या फिर अखबार पढ़ रहे होते हैं। अक्सर यह कहकर फोन काट देती हैं कि-जब आपके अपने अखबारों से फुरसत मिल जाए तो इस सबला नारी को भी याद कर लेना, हम होंठ सिले सुनते रहते हैं और उनके फोन काटने का इंतजार करते हैं। ...........अरे यार मैं भी न.... समय मिला तो कुछ लिखने की जगह अपनी व्यथा सुनाने लगा आपको। चलो यार अब जैसी भी जिंदगी है इसे भी मजे से जीना है और जो भी लिख गया है आप उसे उतने ही मजे से पढ़ लीजिएगा। वैसे एक सलाह दूं (चेतावनी : मुफ्त की सलाह से बचो) - अगर कोई पत्रकारिता में आना चाह रहा हो तो न आना और न ही अपने बच्चों को भेजना ओके। रहने दो आप तो आ ही जाना बड़ा मजा आएगा शानदार करियर है इस क्षेत्र में बस आत्मविश्वास और जूझने की प्रवृत्ति हो आपके मन में, फिर कोई पंगा नहीं। पहले रखना पहले वाली मुफ्त की सलाह थी।

मंगलवार, 29 जून 2010

... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?

क्या मुसलमान ऐसे हिन्दुओं का दिल जीत सकते हैं ?
इस लेख के बाद हो सकता है कुछ खास विचारधारा के ब्लॉगरों की जमात मुझे फास्सिट घोषित कर दे। हो सकता है मुझे कट्टरवादी, पुरातनंपथी, दक्षिणपंथी, पक्षपाती, ढकोसलावादी, रूढ़ीवादी, पुरातनवादी, और पिछड़ा व अप्रगतिशीस घोषित कर दिया जाए। इतना ही नहीं इस पोस्ट के बाद मुझ पर किसी हिन्दूवादी संगठन का एजेंट होने का आरोप भी मढ़ दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन मुझे डर नहीं, जो सच है कहना चाहता हूं और कहता रहूंगा। 

एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।


एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।
           इसी खानदान का उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।" पढ़ें.....
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।

>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।

>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास-
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?"

जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-
अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे।
- अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे)
- जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पढें....  वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
- एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका।
- बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी।
- नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं।
- आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

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