शुक्रवार, 24 मार्च 2017

हिंदू-मुस्लिम एकता की भव्य इमारत खड़ी करने का अवसर

 भारत  के स्वाभिमान और हिंदू आस्था से जुड़े राम मंदिर निर्माण का प्रश्न एक बार फिर बहस के लिए प्रस्तुत है। उच्चतम न्यायालय की एक अनुकरणीय टिप्पणी के बाद उम्मीद बंधी है कि हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर निर्माण के मसले पर आपसी सहमति से कोई राह निकालने के लिए आगे आएंगे। राम मंदिर निर्माण पर देश में एक सार्थक और सकारात्मक संवाद भी प्रारंभ किया जा सकता है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वह राम मंदिर निर्माण के मसले पर मध्यस्थता करने को तैयार हैं, यदि दोनों पक्ष न्यायालय के बाहर सहमति बनाने को राजी हों। उन्होंने यह भी कहा कि यह एक संवेदनशील और भावनाओं से जुड़ा मसला है। अच्छा यही होगा कि इसे बातचीत से सुलझाया जाए। निश्चित ही मुख्य न्यायमूर्ति का परामर्श उचित है। दोनों पक्षों को उदार मन के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। मुख्य न्यायमूर्ति का विचार इस विवाद के समाधान की आदर्श पद्धति है। समूचा देश भी यही चाहता है भगवान राम का मंदिर अयोध्या में बिना किसी विवाद के बहुत पहले ही आपसी सहमति से बन जाना चाहिए था। लेकिन, यह राह इतनी आसान भी नहीं है। इस राह पर चलने में कुछ लोगों के कदम ठिठकेंगे, तो कुछ लोग इस राह आना ही नहीं चाहेंगे। उच्चतम न्यायालय के मंतव्य पर आईं प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट भी हो गया है कि कुछ लोगों को यह सुझाव रास नहीं आया है। 
          उच्चतम न्यायालय ने राम मंदिर निर्माण पर आपसी सहमति बनाने के बहाने देश में सामाजिक सद्भाव का अभूतपूर्व वातावरण बनाने और हिंदू-मुस्लिम एकता को सिद्ध करने का एक अवसर उपलब्ध कराया है। मुख्य न्यायमूर्ति की पहल को मजबूति के साथ आगे बढ़ाना चाहिए था, जो कि दिख नहीं रहा है। कुछ लोगों को नकारात्मक सोचने, देखने और विचार करने की लाइलाज बीमारी है। उदारवादी, सेकुलर और सहिष्णु होने का दावा करने वाले खेमे के सिपहसलारों ने पहली ही फुरसत में एक सकारात्मक विचार को खारिज कर दिया। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) पार्टी के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेता सीताराम येचुरी ने एक सुर में उच्चतम न्यायालय की पहल को खारिज कर दिया है। इनकी तरह और भी कुछ लोग हैं, जिनका मानना है कि पूर्व में बातचीत असफल रही है, विवाद बाहर नहीं सुलझा, इसीलिए न्यायालय में पहुँचा है। इस मसले का समाधान आपसी सहमति से निकलना संभव नहीं है। एक हद तक इन लोगों का कहना सही दिखता है। क्योंकि, अयोध्या में मंदिर निर्माण का विषय सैकड़ों वर्षों से अनसुलझा है। हमें ज्ञात है कि भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का विषय 1992 या फिर 1948 में उत्पन्न नहीं हुआ है। अपितु, इस देश के नागरिक उसी दिन से व्यथित हैं, जिस दिन अपनी ताकत का उपयोग करते हुए विदेशी आक्रांता बाबर ने राम मंदिर तोड़ा था। देश में राम मंदिर निर्माण का संघर्ष उसी दिन से चल रहा है। आज तक इस विषय में कोई उचित समाधान नहीं निकल सका है। लेकिन, क्या अब भी नहीं निकल सकता? सच्चे मन और उदार मन से क्या एक बार और प्रयास करके नहीं देखना चाहिए? 
          एक ओर, तथाकथित उदारमना यह लोग लकीर के फकीर बनकर बैठ गए हैं। वहीं, जिन्हें सांप्रदायिक, कट्टर और अडिय़ल प्रचारित किया जाता है, वह उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी का स्वागत कर रहे हैं और सकारात्मक रुख दिखा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि मानते हैं कि राम मंदिर निर्माण का मामला न्यायालय के बाहर सुलझ सकता है। यकीनन, यदि दोनों पक्षों के प्रतिनिधि इस प्रकार का सकारात्मक वातावरण बनाएं, तब इस मसले का रचनात्मक समाधान आ सकता है। सकारात्मक वातावरण में सबको इस प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए कि आखिर अयोध्या में राम का मंदिर नहीं बनेगा, तब कहाँ बनेगा? इसके साथ ही, भारतीय मुसलमानों को अपने भीतर इस प्रश्न का उत्तर टटोलना चाहिए कि क्या उनके लिए एक विदेश आक्रांता बाबर महत्त्वपूर्ण है? एक आक्रांता और लुटेरे के नाम पर इस देश में मस्जिद क्यों होनी चाहिए? एक ऐसा स्थान अल्लाह की इबादत के लिए पाक कैसे हो सकता है, जिस पर विवाद है? इस्लाम के हिसाब से वह स्थान अल्लाह की इबादत के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता, जहाँ पहले से कोई अन्य धार्मिक स्थल हो। पुरात्तत्व विभाग की देखरेख में हुई खुदाई में भी यह बात साबित हो चुकी है कि जिस बाबरी ढांचे को 1992 में हटाया गया, उसके नीचे पहले एक विशाल हिंदू मंदिर था। बाबर ने उसी मंदिर को तोड़कर, वहीं मंदिर के अवशेषों पर ही कथित मस्जिद खड़ी करा दी थी। बाबर ने यह निर्णय हिंदू-मुस्लिम एकता को चोट पहुंचाने के लिए किया था। अब अवसर आया है कि हम वहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की मजबूत इमारत खड़ी कर दें, जिसे फिर कभी कोई बाबर नहीं तोड़ पाए। बहरहाल, यदि ईमानदारी से हम सब मिलकर सकारात्मक विमर्श करेंगे, उक्त प्रश्नों के उत्तर तलाशेंगे, तब निश्चित ही आपसी सहमति बनेगी और सभी भारतीय मिलकर एक भव्य और विशाल राममंदिर का निर्माण भगवान श्रीराम की जन्मस्थली पर करेंगे।
------
इस लेख को भी पढ़ें.... 

क्यों बने आक्रांता का मकबरा?

गुरुवार, 23 मार्च 2017

कौन हैं मुसलमानों को योगी का डर दिखाने वाले लोग?

 उत्तरप्रदेश  में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से जिन्हें प्रदेश में मुसलमानों के लिए संकट दिखाई दे रहा है, वे लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित तो हैं ही, भारतीय समाज के लिए भी खतरनाक हैं। उनके पूर्वाग्रह से कहीं अधिक उनका बर्ताव और उनकी विचार प्रक्रिया सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए हौव्वा बनाकर यह लोग उत्तरप्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगाडऩा चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, वह कट्टर हैं, मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद से ही मुस्लिम समुदाय के लोग दहशत में है, अब उत्तरप्रदेश में मुस्लिमों के बुरे दिन आ गए, उन्हें मारा-पीटा जाएगा और उनका शोषण होगा, इस प्रकार की निराधार आशंकाएं व्यक्त करने का और क्या अर्थ हो सकता है? दरअसल, मुसलमानों को योगी आदित्यनाथ का डर दिखाने वाले लोग राजनीतिक और वैचारिक मोर्चे पर बुरी तरह परास्त हो चुके हैं। योगी के खिलाफ अनर्गल बयानबाजी और लिखत-पढ़त करके यह लोग अपनी हताशा को उजागर कर रहे हैं। राजनीतिक तौर पर निराश-हताश और विभाजनकारी मानसिकता के इन लोगों को समझ लेना चाहिए कि उत्तरप्रदेश की जनता क्या, अब देश भी उनके कुतर्कों को सुनने के लिए तैयार नहीं है। उत्तरप्रदेश के रण में पराजय का मुंह देखने वाली कांग्रेस, बसपा और सपा से कहीं अधिक बेचैनी कम्युनिस्ट खेमे में दिखाई दे रही है। कम्युनिस्ट खेमे के राजनेता, विचारक और पत्रकार ठीक उसी प्रकार के 'फ्रस्टेशन' को प्रकट कर रहे हैं, जैसा कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर किया गया था। उस समय इन्होंने नरेन्द्र मोदी के नाम पर देश के मुसलमानों को डराने और भड़काने का प्रयास किया, आज योगी आदित्यनाथ के नाम पर कर रहे हैं। देश के मुसलमानों पर न तो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से कोई खतरा आया है और न ही योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से कोई संकट खड़ा होने वाला है।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा

 असम  के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी फतवे से नहीं डरती हैं। इंडियन आइडल से प्रसिद्ध हुई नाहिद आफरीन ने हाल में आतंकवाद और आईएसआईएस के विरोध में गीत गाए थे। आशंका है कि कट्टरपंथियों को यह बात चुभ गई होगी। सुरीली आवाज का गला घोंटने के लिए कट्टरपंथियों ने 46 फरमान जारी करते हुए नाहिद को 25 मार्च को संगीत कार्यक्रम की प्रस्तुति नहीं देने के लिए धमकाया है। आफरीन के खिलाफ मंगलवार को मध्य असम के होजई और नागांव जिलों में कई पर्चे बांटे गए, जिनमें असमिया भाषा में फतवा और फतवा जारी करने वाले लोगों के नाम हैं। इन फतवों के अनुसार, 25 मार्च को असम के लंका इलाके के उदाली सोनई बीबी महाविद्यालय में 16 साल की नाहिद को गीत गाना है, जिसे पूरी तरह से शरिया के खिलाफ बताया गया है। फतवों की माने तो संगीत संध्या जैसी चीजें पूरी तरह से शरिया के खिलाफ हैं। दरअसल, इन मौलवियों के दिमाग में जहर भरा हुआ है। यही कारण है कि उन्हें एक बच्ची की प्रतिभा दिखाई नहीं दे रही। इन्हें भारत में इस्लाम और संगीत के रिश्ते की समझ भी नहीं है। 21वीं सदी में आगे बढ़ने की जगह इस्लाम के यह ठेकेदार अपनी कौम को पीछे धकेलने का निंदनीय कृत्य कर रहे हैं। अब भी यह कूपमंढूक बने रहना चाहते हैं।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

हार की जिम्मेदारी ईवीएम पर

 उत्तरप्रदेश,  पंजाब, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल पर बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने दूसरी बार प्रेसवार्ता आयोजित करके ईवीएम में छेड़छाड़ कर बेईमानी से चुनाव जीतने के आरोप भारतीय जनता पार्टी पर लगाए हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा की जीत ईमानदारी की नहीं है, बल्कि ईवीएम में धांधली करके यह जीत हासिल की है। मायावती ने इस मामले पर उच्चतम न्यायालय जाने और आंदोलन करने की बात कही है। वहीं, बुधवार को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी एक प्रेसवार्ता में यह आरोप लगाए कि ईवीएम में गड़बड़ी करके पंजाब चुनाव में उनके मत चुराकर अकाली दल और भाजपा के गठबंधन को हस्तांतरित किए गए हैं।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

लाल हिंसा के खिलाफ देशभर में जनाक्रोश

केरल में राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध लोगों की हत्या और कम्युनिस्ट अत्याचार के विरुद्ध देशभर में आम समाज ने बुलंद की आवाज
 केरल  में पिछले 50 वर्षों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेविका समिति सहित अन्य सभी राष्ट्रीय विचार से संबंद्ध संगठनों के सामान्य स्वयंसेवकों की हत्या की जा रही है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नृशंसता से अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। दस माह पहले केरल में माकपा की सत्ता आने के बाद से लाल आतंक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। मई, 2016 से अब तक 20 से अधिक स्वयंसेवकों की हत्याएं माकपा के गुण्डों ने की हैं। केरल राज्य के कन्नूर जिले मंअ स्थितियां और भी भयावह हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन सहित माकपा पोलित ब्यूरो के अधिकतम सदस्य कन्नूर जिले से ही आते हैं। लेकिन, हैरानी की बात है कि देश का तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का बहुसंख्यक वर्ग इस आतंक पर खामोश है। दिल्ली से उठते अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता के नारे केरल क्यों नहीं पहुंचते? राष्ट्रभक्त लोगों के लहू से लाल हो रही देवभूमि क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रही है? तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग और मीडिया की चुप्पी के बीच केरल में भयंकर रूप धारण कर चुके लाल आतंक के खिलाफ अब देश खड़ा हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आह्वान पर देशभर में नागरिक अधिकार, जनाधिकार और मानव अधिकार मंचों के तहत आम समाज एकजुट होकर लाल आतंक के खिलाफ जनाक्रोश व्यक्त कर रहा है। मार्च के पहले सप्ताह में एक, दो और तीन तारीख को देश के प्रमुख स्थानों पर समाज के संवेदनशील नागरिक बंधुओं ने 'संवेदना मार्च' निकाले और धरने आयोजित किए हैं।

बुधवार, 1 मार्च 2017

रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों?

 रामजस  महाविद्यालय प्रकरण से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारा तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का एक वर्ग भयंकर दोगला है। एक तरफ ये कथित धमकियों पर भी देश में ऐसी बहस खड़ी कर देते हैं, मानो आपातकाल ही आ गया है, जबकि दूसरी ओर बेरहमी से की जा रही हत्याओं पर भी चुप्पी साध कर बैठे रहते हैं। वामपंथ के अनुगामी और भारत विरोधी ताकतें वर्षों से इस अभ्यास में लगी हुई हैं। अब तक उनका दोगलापन सामने नहीं आता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के अन्य माध्यमों के विस्तार के कारण समूचा देश इनके पाखण्ड को देख पा रहा है। इस पाखण्ड के कारण आज पत्रकारिता जैसा पवित्र माध्यम भी संदेह के घेरे में आ गया है। पिछले ढाई साल में अपने संकीर्ण और स्वार्थी नजरिए के कारण इन्होंने असहिष्णुता और अभिव्यक्ति की आजादी को मजाक बना कर रख दिया है। रामजस महाविद्यालय का प्रकरण भी इसकी ही एक बानगी है।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

हिंदू आबादी घटने पर विवाद नहीं चिंता करनी चाहिए

 अरुणाचल  प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख रहे हैं।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

हिन्दू सम्मलेन का सन्देश

 मध्यप्रदेश  के वनवासी समाज बाहुल्य जिले बैतूल में संपन्न हिन्दू सम्मलेन से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संगठित हिन्दू से समर्थ भारत का सन्देश दिया है। अर्थात भारत के विकास और उसे विश्वगुरु बनाने के लिए उन्होंने हिन्दू समाज में समरसता एवं एकता को आवश्यक बताया। उनका मानना है कि दुनिया जब विविध प्रकार के संघर्षों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही है और भारत को विश्वगुरु की भूमिका में भी देख रही है, तब भारत को विश्वगुरु बनाने की जिम्मेदारी इस देश हिन्दू समाज की ही है। यह सही भी है इस देश की संतति ही संगठित नहीं होगी तो देश कैसे विश्व मंच पर ताकत के साथ खड़ा होगा।

जेएनयू की बीमारी, 'देशद्रोह' के प्रोफेसर

 जवाहरलाल  नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) अपने विद्यार्थियों और शिक्षकों के रचनात्मक कार्यों से कम बल्कि उनकी देश विरोधी गतिविधियों से अधिक चर्चा में रहता है। पिछले वर्ष जेएनयू परिसर देश विरोधी नारेबाजी के कारण बदनाम हुआ था, तब जेएनयू की शिक्षा व्यवस्था पर अनेक सवाल उठे थे। यह सवाल भी बार-बार पूछा गया था कि जेएनयू के विद्यार्थियों समाज और देश विरोधी शिक्षा कहाँ से प्राप्त कर रहे हैं? शिक्षा और बौद्धिक जगत से यह भी कहा गया था कि जेएनयू के शिक्षक हार रहे हैं। वह विद्यार्थियों का मार्गदर्शन करने में असफल हो रहे हैं। लेकिन, पिछले एक साल में यह स्पष्ट हो गया है कि जेएनयू के शिक्षक हारे नहीं है और न ही विद्यार्थियों के मार्गदर्शन में असफल रहे हैं, बल्कि वह अब तक जीतते रहे हैं और अपनी शिक्षा को विद्यार्थियों में हस्थातंरित करने में सफल रहे हैं। 

कांग्रेस से लोकतंत्र है या लोकतंत्र से कांग्रेस

 संसद  में कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि उसके कारण भारत में लोकतंत्र बचा हुआ है। कांग्रेस की ओर से संसद में उसके नेता मल्लिकार्जुन खडगे ने कहा कि कांग्रेस को देश में लोकतंत्र बनाए रखने का श्रेय मिलना चाहिए, जिसके कारण एक गरीब परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी भी भारत के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा पाए। संसद में यह भाषण करते वक्त खडग़े भूल गए कि कांग्रेस ने १९७५ में लोकतंत्र का गला घोंटने की पूरी कोशिश की थी। आजादी के आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कलम पर पहरा बैठा दिया गया था। विरोधी विचारधारा के लोगों को पकड़-पकड़ कर जेलों में ठूंसा गया और उनको यातनाएं दी गईं। लेकिन, जनशक्ति के सामने कांग्रेस की तानाशाही टिक नहीं सकी और इस देश में लोकतंत्र को खत्म करने के षड्यंत्र में कांग्रेस कामयाब नहीं हो सकी। आजादी के बाद से अब तक ७० साल में कांग्रेस ने जितने घोटाले किए हैं, उनके आधार पर उसे सत्ता मिलनी ही नहीं चाहिए, लेकिन यह लोकतंत्र है कि देश में भ्रष्टाचार का नाला बहाने के बाद भी कांग्रेस आज न केवल अस्तित्व में है, बल्कि कुछेक राज्यों में सत्तासीन भी है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को समझना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र उनके कारण नहीं बचा है, बल्कि लोकतंत्र के कारण वह बची हुई है। 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails