सोमवार, 16 जनवरी 2017

तस्वीर की जगह गांधी विचार पर बहस होनी चाहिए

 कैलेंडर  और डायरी पर महात्मा गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर से उत्पन्न विवाद बेवजह है। यह इसलिए, क्योंकि भारत में इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कागज के टुकड़े पर चित्र प्रकाशित नहीं होने से गांधीजी के व्यक्तित्व पर पर्दा पड़ जाएगा। यह तर्क तो हास्यास्पद ही है कि गांधीजी के चित्र की जगह प्रधानमंत्री का चित्र इसलिए प्रकाशित किया गया है, ताकि गांधी की जगह मोदी ले सकें। गांधीजी की जगह वास्तव में कोई नहीं ले सकता। आश्चर्य की बात यह है कि गांधीजी के चित्र को लेकर सबसे अधिक चिंता उन लोगों को हो रही है, जिन्होंने 70 साल में गांधीजी के विचार को पूरी तरह से दरकिनार करके रखा हुआ था। सिर्फ राजनीति की दुकान चलाने के लिए ही यह लोग गांधी नाम की माला जपते रहे हैं। वास्तव में आज जरूरत इस बात की है कि गांधीजी के विचार पर बात की जाए। इस बहस में इस पहलू को भी शामिल किया जाए कि आखिर इस देश में गांधीजी के विचार को दरकिनार करने में किसकी भूमिका रही है? आखिर अपने ही देश में गांधीजी कैलेंडर, डायरी, नोट और दीवार पर टंगे चित्रों तक ही सीमित क्यों रह गए? उनके विचार को व्यवहार में लाने की सबसे पहले जिम्मेदारी किसके हिस्से में आई थी और उन्होंने क्या किया?
          ताजा बहस के संदर्भ में एक आश्चर्यजनक पहलू यह भी सामने आया है कि स्वयं को गांधी की राजनीति का उत्तराधिकारी बताने वाली कांग्रेस के ही शासनकाल में खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के कैलेंडर पर चार बार अर्थात् 2005, 2011, 2012 और 2013 महात्मा गांधी की तस्वीर प्रकाशित नहीं की गई थी। लेकिन, तब इस संबंध में किस ने न तो सवाल पूछा और न ही वितंडावाद खड़ा किया। कैलेंडर पर महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं है, यह सिर्फ इसी सरकार के समय में ही क्यों याद आ रहा है। इस बहस में सवाल यह भी उठता है कि कैलेंडर पर गांधीजी की तस्वीर नहीं छापकर प्रधानमंत्री मोदी का चित्र छापने का निर्णय क्या केंद्र सरकार का है? यदि इस निर्णय में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तब इस मामले के लिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री किस प्रकार जवाबदेह हो सकते हैं? इस संबंध में जिसकी जवाबदेही है, उस खादी ग्रामोद्योग बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि खादी ग्रामोद्योग में सिर्फ गांधीजी की ही फोटो होनी चाहिए। इसलिए किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है। 
          बोर्ड ने यह भी कहा है कि कोई भी महात्मा गांधी का स्थान नहीं ले सकता है। चूँकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खादी को प्रचार-प्रसार किया है। वर्ष 2004 से 2014 तक खादी की बिक्री 2 से 7 फीसदी ही होती थी। लेकिन मोदी सरकार के बाद खादी की बिक्री में 5 गुना वृद्धि हुई है। अब खादी की बिक्री 35 फीसदी से ज्यादा है। यह बात सही है कि प्रधानमंत्री मोदी खादी के 'ब्रांड एंबेसडर' की तरह हमारे सामने प्रस्तुत हैं। प्रधानमंत्री ने खादी को 'फैशन' में ला दिया है। आज मोदी कुर्ता और मोदी जैकेट के कारण खादी की बिक्री में जबरदस्त उछाल आया है। सप्ताह में एक दिन खादी पहनने के उनके आह्वान को देश के अनेक लोगों ने स्वीकार किया है। यह संभव है कि बोर्ड ने खादी के प्रचार-प्रसार के लिए 'ब्रांड मोदी' का उपयोग किया हो। 
            यह बात भी सही है कि इस अतार्किक बहस का अंत खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के स्पष्टीकरण के बाद ही हो जाना चाहिए था, लेकिन भाजपा के कुछ नेताओं के बेमतलब बयानों ने आग में घी का काम किया। आखिर बोर्ड और भाजपा के स्पष्टीकरण के बाद हरियाणा के भाजपा नेता अनिल विज को बयानबाजी करने की क्या जरूरत थी? निश्चित ही उनका बयान आपत्तिजनक है। यही कारण है भाजपा ने भी उनके बयान से पल्ला झाड़ लिया और अंत में स्वयं विज को भी अपना बयान वापस लेना पड़ा। 
          बहरहाल, हंगामा खड़ा कर रहे राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों से एक प्रश्न यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने खादी और गांधी के विचार के लिए अब तक क्या किया है? जो लोग गांधीजी के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा पर संदेह कर रहे हैं, उन्हें ध्यान करना चाहिए कि नरेन्द्र मोदी ने अपने सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे अधिक प्रचारित 'स्वच्छ भारत अभियान' को महात्मा गांधी को ही समर्पित किया है। इस अभियान के प्रचार-प्रसार के लिए गांधीजी के चित्र और उसके प्रतीकों का ही उपयोग किया जाता है। इसलिए इस बात की आशंका निराधार है कि खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर नरेन्द्र मोदी का चित्र छापकर उन्हें गांधीजी का स्थान देने का प्रयास किया गया है। वास्तव में महात्मा गांधी की तस्वीर की अपेक्षा उनके विचारदर्शन पर बहस की जानी चाहिए। इस बहस में यह भी देखने की कोशिश करनी चाहिए कि गांधी की विचारधारा के अनुयायी बताने वाले राजनीतिक दल और गांधी विचार के विरोधी ठहराये जाने वाले दल में से वास्तव में कौन गांधी विचार के अधिक समीप है? किस सरकार की नीतियों में गांधी विचार के दर्शन होते हैं और कहाँ सिर्फ नारों में गांधीजी हैं? इन सवालों के जवाब तलाशने जब तार्किक और तथ्यात्मक बहस आयोजित होंगी, तब स्पष्ट हो सकेगा कि आखिर महात्मा गांधी हितैषी कौन है?

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

सांप्रदायिक निर्णय के बाद भी कांग्रेस सेक्युलर!

 जुमे  की नमाज के लिए मुस्लिम कर्मचारियों को 90 मिनट का अवकाश देकर उत्तराखंड सरकार ने सिद्ध कर दिया है कि कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म का लबादा भर ओढ़ रखा है, असल में उससे बढ़ा सांप्रदायिक दल कोई और नहीं है। कांग्रेस के साथ-साथ उन तमाम बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों के सेक्युलरिज्म की पोलपट्टी भी खुल गई है, जो भारतीय जनता पार्टी या किसी हिंदूवादी संगठन के किसी नेता की 'कोरी बयानबाजी' से आहत होकर 'भारत में सेक्युलरिज्म पर खतरे' का ढोल पीटने लगते हैं, लेकिन यहाँ राज्य सरकार के निर्णय पर अजीब खामोशी पसरी हुई है। उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के घोर सांप्रदायिक निर्णय के खिलाफ तथाकथित प्रगतिशील और बुद्धिजीवी समूहों से कोई आपत्ति नहीं आई है। सोचिए, यदि किसी भाजपा शासित राज्य में निर्णय हुआ होता कि सोमवार को भगवान शिव पर जल चढ़ाने के लिए हिंदू कर्मचारियों-अधिकारियों को 90 मिनट का अवकाश दिया जाएगा, तब देश में किस प्रकार का वातावरण बनाया जाता? सेक्युलरिज्म के नाम पर यह दोगलापन पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यह विडम्बना है कि वर्षों से इस देश में वोटबैंक की राजनीति के कारण समाज को बाँटने का काम कांग्रेस और उसके प्रगतिशील साथियों ने किया है, लेकिन सांप्रदायिक दल होने की बदनामी समान नागरिक संहिता की माँग करने वाली भारतीय जनता पार्टी के खाते में जबरन डाल दी गई है।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

जनप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज के 11 वर्ष

 मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के यशस्वी कार्यकाल को 29 नवम्बर को 11 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। निश्चित ही उनकी यह यात्रा आगे भी जारी रहेगी। इंदौर में आयोजित 5वीं ग्लोबल इन्वेस्टर समिट-2016 के समापन समारोह में उन्होंने कहा भी है कि अगली इन्वेस्टर समिट 2019 में उनकी ही सरकार कराएगी। मुख्यमंत्री के इस बयान को कुछ लोग उनका आत्मविश्वास कह सकते हैं और कुछ लोग अति विश्वास भी कहने से नहीं चूकेंगे। वास्तव में यह जनता का भरोसा है, जिसके आधार पर शिवराज यह कह गए। अपनी इस यात्रा में शिवराज बड़ों को आदर देकर, छोटों को स्नेह देकर और समकक्षों को साथ लेकर लगातार आगे बढ़ रहे हैं। यह उनके नेतृत्व की कुशलता है। उनका व्यक्तित्व इतना सहज है कि जो भी उनके नजदीक आता है, उनका मुरीद हो जाता है। शिवराज के राजनीतिक विरोधी भी निजी जीवन में उनके व्यवहार के प्रशंसक हैं। सहजता, सरलता, सौम्यता और विनम्रता उनके व्यवहार की खासियत है। उनके यह गुण उन्हें राजनेता होकर भी राजनेता नहीं होने देते हैं। वह मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जनता के मुख्यमंत्री हैं। 'जनता का मुख्यमंत्री' होना उनको औरों से अलग करता है। प्रदेश में पहली बार शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री निवास के द्वार समाज के लिए खोले। वह प्रदेश में गाँव-गाँव ही नहीं घूमे, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को मुख्यमंत्री निवास पर बुलाकर भी उनको सुना और समझा। अपने इस स्वभाव के कारण शिवराज सिंह चौहान 'जनप्रिय' हो गए हैं। मध्यप्रदेश में उनके मुकाबले लोकप्रियता किसी मुख्यमंत्री ने अर्जित नहीं की है।

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

नर्मदा संरक्षण का बड़ा प्रयास

 मध्यप्रदेश  के मुध्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार ने नर्मदा नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने का संकल्प लिया है। यह शुभ संकल्प है। मध्यप्रदेश के प्रत्येक नागरिक को प्रार्थना करनी चाहिए कि मुख्यमंत्री का यह संकल्प पूरा हो, बल्कि उचित होगा कि अधिक से अधिक नागरिक इस संकल्प की पूर्ति में अपना योगदान दें। क्योंकि नर्मदा नदी प्रदेश की जीवनरेखा है। यह प्रदेश को आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बना रही है। यह पेयजल, सिंचाई और बिजली देती है। वृक्षों के कटने और प्रदूषण से नर्मदा के जलप्रवाह पर प्रभाव हुआ है। इसलिए समय की आवश्यकता है कि नर्मदा नदी को प्रदूषण से मुक्त किया जाए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की संवेदनशीलता है कि उन्होंने इस संबंध में 'नमामि देवी नर्मदे' यात्रा जैसा महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है। अपने कार्यकाल के 11 साल पूरे होने पर उन्होंने इस यात्रा की घोषणा करते हुए कहा था कि वे नर्मदा की गोदी में पले-बढ़े हैं। यह यात्रा माँ नर्मदा का कर्ज उतारने का प्रयास है। हालाँकि, किसी सरकार और एक मुख्यमंत्री के बूते नर्मदा को प्रदूषण मुक्त बनाना संभव नहीं है। हाँ, यह सुखद और सकारात्मक है कि सरकार और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस कार्य के लिए आगे आए हैं। हम सब मध्यप्रदेश के निवासी भी आगे आएं और इस अभियान की सफलता सुनिश्चित करें, क्योंकि नर्मदा का जितना कर्ज मुख्यमंत्री पर है, उतना ही हम सब लोगों पर भी है। इस ऋण से उऋण होना संभव नहीं, लेकिन कुछ लौटाने का प्रयास तो करना ही चाहिए।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

राष्ट्रगान का सम्मान

 देश  के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रगान के सम्मान में सराहनीय निर्णय सुनाया है। कुछ समय पहले जब इस तरह के मामले सामने आए कि सिनेमाघर या अन्य जगह राष्ट्रगान बजाया गया तब कुछेक लोग उसके सम्मान में खड़े नहीं हुए। इस संबंध में उनका कहना था कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि जब राष्ट्रगान हो रहा हो, तब खड़े होना अनिवार्य है। इसी बीच सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य करने की माँग ने भी जोर पकड़ा। इस माँग के बाद देशभर में राष्ट्रगान के सम्मान और अपमान की बहस ने जन्म लिया था। इस बहस में आ रहे तर्क-कुतर्कों पर उच्चतम न्यायालय ने विराम लगा दिया है। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कहा है कि सिनेमाघरों में फिल्मों का प्रदर्शन शुरू होने से पहले राष्ट्रगान अवश्य बजाया जाना चाहिए। साथ ही परदे पर राष्ट्रध्वज की तस्वीर भी दिखाई जानी चाहिए। जिस वक्त राष्ट्रगीत बज रहा हो, वहां उपस्थित लोगों को उसके सम्मान में खड़े रहना जरूरी है। इसके अलावा राष्ट्रगान का किसी भी रूप में व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसकी धुन को बदल कर गाने या फिर इसे नाटकीय प्रयोजन के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए।

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

नोटबंदी : नरेन्द्र मोदी का वाजिब सवाल

 प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने आगरा में परिवर्तन रैली को जिस अंदाज में संबोधित किया है, उसे दो तरह से देखा जा सकता है। एक, उन्होंने विपक्ष पर करारा हमला बोला है। दो, नोटबंदी पर सरकार और प्रधानमंत्री को घेरने के लिए हाथ-पैर मार रहे विपक्ष से प्रधानमंत्री ने सख्त सवाल पूछ लिया है। ऐसा सवाल जिसका सीधा उत्तर विपक्ष दे नहीं सकता। नोटबंदी का विरोध कर रहे नेताओं की ओर प्रधानमंत्री मोदी ने नागफनी-सा सवाल उछाल दिया है, जो निश्चित तौर पर उन्हें लहूलुहान करेगा। उन्होंने पूछ लिया कि यह कदम कालेधन वालों के खिलाफ उठाया गया है, फिर आपको परेशानी क्यों हो रही है? यकीनन प्रधानमंत्री का यह सवाल वाजिब है, क्योंकि परेशानी उठा रही आम जनता को भी यह समझ नहीं आ रहा है कि विपक्ष ने आखिर हाय-तौबा किस बात के लिए मचा रखी है? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि कालेधन के खिलाफ कार्रवाई हो? क्या विपक्ष नहीं चाहता कि जाली मुद्रा को खत्म किया जाए? आखिर विपक्ष की मंशा क्या है? वह क्यों चाहता है कि नोटबंदी का निर्णय वापस लिया जाए और फिर से 500 और 1000 के पुराने नोट चलन में आएं? प्रधानमंत्री के तर्कसंगत सवाल से विपक्ष कठघरे में खड़े किसी अपराधी से कम नजर नहीं आ रहा है।

रविवार, 20 नवंबर 2016

नोटबंदी पर एक से बढ़कर एक कुतर्क

 कालेधन  के विरुद्ध लड़ाई में नोटबंदी के निर्णय पर प्रतिपक्ष के नेता एक से बढ़कर एक कुतर्क प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके कुतर्क यह भी साबित कर रहे हैं कि वह जमीन से जुड़े नेता नहीं हैं। उन्हें भारतीय जन के मानस की बिल्कुल भी समझ नहीं है। विपक्षी नेताओं के बयानों को सुनकर यह समझना मुश्किल हो रहा है कि वह आम जनता के शुभचिंतक हैं या फिल कालेधन वालों के? उनकी बौखलाहट देखकर संदेह यह भी है कि उनके पास भी कालेधन का भंडार है। वरना क्या कारण है कि नोटबंदी की वापसी के लिए चेतावनी जारी की जा रही हैं? साफ नजर आ रहा है कि विपक्षी नेता आम जनता की परेशानी की आड़ में अपने कालेधन की चिंता कर रहे हैं? तथाकथित पढ़े-लिखे नेता चौराहों की भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं। कुतर्क देखिए कि पाँच सौ और दो हजार रुपये का नया नोट चूरन की पुडिय़ा में निकलने वाले नकली नोट जैसा है। आश्चर्य है इनकी समझ पर।

शनिवार, 19 नवंबर 2016

दुर्भाग्य है नायसमंद की घटना

 नये  दौर में छूआछूत और भेदभाव की घटना किसी भी समाज के लिए कलंक से कम नहीं हैं। यह समूची मनुष्य जाति का दुर्भाग्य है कि समाज में कुछ लोग, कुछ लोगों को अपने से कमतर मानते हैं। उनके साथ अमानवीय व्यवहार करते हैं। किसी मनुष्य के खेत में पैर रखने से क्या सफल सूख सकती है? क्या उसके छूने से पवित्रता समाप्त हो सकती है? यदि इसका प्रश्न हाँ है तब समूची धरती तथाकथित सवर्णों के लिए रहने लायक नहीं है। समूची धरती एक है और उसका स्पर्श हजारों हजार तथाकथित निम्न जाति के लोग करते हैं। उस भूमि को वह अपनी माता मानते हैं। यह अधिकार और ज्ञान तथाकथित सवर्ण समाज को किसने दिया कि एक वर्ग विशेष नजरें उठाकर नहीं चल सकता, उनकी औरतें-बेटियाँ सज-धज नहीं सकतीं, उन्हें होटल या धर्मशाला में पानी चुल्लू में लेकर पीना चाहिए?

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

लोकमंथन : नए भारत निर्माण की राह

 लोकहित  में चिंतन और मंथन भारत की परंपरा में है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं, जिनमें यह परंपरा दिखाई देती है। महाभारत के कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद से लेकर नैमिषराण्य में ज्ञान सत्र के लिए 88 हजार ऋषि-विद्वानों का एकत्र आना, लोक कल्याण के लिए ही था। भारत में चार स्थानों पर आयोजित होने वाले महाकुम्भ भी देश-काल-स्थिति के अनुरूप पुरानी रीति-नीति छोडऩे और नये नियम समाज तक पहुंचाने के माध्यम थे। ज्ञान परंपरा से समृद्ध भारत और उसकी संतति का यह दुर्भाग्य रहा कि ज्ञात-अज्ञात कारणों से उसकी यह परंपरा कहीं पीछे छूट गई थी और यह सौभाग्य है कि अब फिर से वह परंपरा जीवित होती दिखाई दे रही है। भारत की चिंतन-मंथन की ऋषि परंपरा को आगे बढ़ाने का सौभाग्य भी विचारों की उर्वर भूमि मध्यप्रदेश को प्राप्त हुआ है। पिछले चार-पाँच वर्षों से ज्ञान सत्र आयोजित करने में मध्यप्रदेश की अग्रणी भूमिका रही है। अंतरराष्ट्रीय धर्म-धम्म सम्मेलन, मूल्य आधारित जीवन पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, सिंहस्थ महाकुंभ की धरती पर विचार महाकुंभ का आयोजन और अब 'राष्ट्र सर्वोपरि' की भावना से ओतप्रोत विचारकों एवं कर्मशीलों का राष्ट्रीय विमर्श 'लोकमंथन : देश-काल-स्थिति' का आयोजन, यह सब आयोजन नये भारत के निर्माण की राह तय करने वाले हैं। बौद्ध धर्म के गुरु एवं तिब्बत सरकार के पूर्व प्रधानमंत्री सोमदोंग रिनपोछे भी मानते हैं कि लोकमंथन से भारतीय इतिहास में नये युग का सूत्रपात हुआ है। निश्चित ही लोकमंथन 'औपनिवेशिक मानसिकता' से मुक्ति और भारतीयता की अवधारणा को पुष्ट करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है।

बुधवार, 16 नवंबर 2016

जनता प्रसन्न, विपक्ष परेशान क्यों?

 केन्द्र  सरकार के नोटबंदी के निर्णय को आम आदमी सकारात्मक ढंग से ले रहा है। लेकिन, विपक्षी दलों के नेताओं की तकलीफ समझ पाना मुश्किल हो रहा है। वह कह रहे हैं कि लोग परेशान हो रहे हैं, लोगों को बैंक और एटीएम में कतार में लगना पड़ रहा है। छोटे नोट की कमी के कारण जनता हलाकान हो रही है। यह सच है कि जनता परेशान हो रही है। लेकिन, उसकी परेशानी देश से बड़ी नहीं है। यह बात आम आदमी जानता है। इसलिए कतार में खड़ा देशभक्त आदमी कह रहा है कि वह राष्ट्रहित के लिए थोड़ी-बहुत परेशानी उठाने के लिए तैयार है। सरकार के निर्णय का समर्थन करने के लिए अनेक स्वयंसेवी कार्यकर्ता भी जरूरतमंदों की मदद के लिए सड़कों पर उतर आए हैं। यह लोग बैंक से पैसा निकालने में लोगों की मदद कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपानीत सरकार का विरोध करने को अपना धर्म समझने वाले आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी सामान्य व्यक्ति की भावना को समझने में भूल कर रहे हैं। इसे समझने के लिए इन दलों और नेताओं को 'इनशॉर्ट' की ओर से कराए गए सर्वेक्षण का अध्ययन करना चाहिए।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails