मंगलवार, 21 नवंबर 2017

बेटी के लिए कविता-3


भले ही तुम हो गई हो
तीन साल की।
फर्क क्या आया? 
आज भी तुम्हारी भाषा-बोली को 
हम दो लोग ही समझते हैं।

हाँ, तुम्हारा भाई भी समझने लगा है
बल्कि, कर्ई दफा 
हमसे ज्यादा वह ही तुम्हें समझता है
जैसे हम दूसरों को बताते हैं
किसी अनुवादक की तरह 
तुमने क्या बोला?
ठीक उसी तरह, कई दफा
वह हमें बताता है
तुमने क्या बोला?

चलो, अच्छा है
हम संवाद के लिए
परस्पर निर्भर हैं। 
उच्चारण स्पष्ट हो जाए
तब भी, एक-दूसरे को समझने की
परस्पर निर्भता बनी रहे। 
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ऋष्वी के जन्मदिन की तीसरी वर्षगाँठ पर... 21 नवंबर, 2017

शनिवार, 18 नवंबर 2017

कांग्रेस की दृष्टि में धर्मनिरपेक्षता अर्थात् हिंदू विरोध

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा, दीपावली पर हिंदू संत को गिरफ्तार कर लिया, परंतु क्या ईद पर मौलवी को पकडऩे का साहस किया जा सकता है?
 भारत  के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'कोअलिशन इयर्स 1996-2012' के एक अध्याय में कांग्रेस के हिंदू विरोध एजेंडे और छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया है। वैसे तो यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। दोनों आरोपों को लेकर कांग्रेस अकसर कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। परंतु, जब प्रणब मुखर्जी इस संबंध में लिख रहे हैं, तब इसके मायने अलग हैं। वह खांटी कांग्रेसी नेता हैं। वह कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी राजनेता हैं। उन्होंने कांग्रेस को बहुत नजदीक से देखा है। कांग्रेस का उत्थान एवं पतन दोनों उनकी आँखों के सामने हुए हैं। आज कांग्र्रेस जिस गति को प्राप्त हुई है, उसके संबंध में भी उनका आकलन होगा। पूर्व राष्ट्रपति प्र्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा है- 'मैंने वर्ष 2004 में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए थे। एक कैबिनेट बैठक के दौरान मैंने गिरफ्तारी के समय को लेकर काफी नाराजगी जताई थी। मैंने पूछा था कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना केवल हिन्दू संतों महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने का साहस दिखा सकती है? ' 
          यदि इस प्रश्न के उजाले में उत्तर तलाशने का प्रयास करें तो हम पाएंगे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में आने के बाद से कांग्रेस तुष्टीकरण से आगे बढ़ कर हिंदू विरोधी नीति पर आ गई। यह अकेली घटना नहीं है। 1998 से अब तक ऐसे अनेक प्रकरण हमारे सामने हैं, जो सिद्ध करते हैं कि कांग्रेस के लिए धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) हिंदू विरोध का पर्याय हो गई। हालाँकि कांग्रेस की नीति प्रारंभ से ही थोड़ी-बहुत हिंदू विरोध की रही है। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए सदैव ही हिंदू विरोधी नीति पर चलना कांग्रेस के लिए सुविधाजनक रहा है। बहरहाल, हम 1998 के बाद की कुछ प्रमुख घटनाओं की बात करते हैं, जिन्होंने कांग्रेस की हिंदू विरोधी नीति को प्रकट किया। 1998 से 2004 तक कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए एक विशेष समुदाय को आकर्षित किया। कांग्रेस ने भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार में विशेष समुदाय की चिंता प्राथमिकता से की जाएगी। अवसर आने पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यह खुलकर कहा भी कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। बाटला मुठभेड़ (2008) में मारे गए दो आतंकवादियों की तस्वीर देख कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी रो पड़ी थीं। यह बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह दावा किया था। हालाँकि बाद में कांग्रेस ने किरकिरी होने पर इस बात को खुर्शीद का निजी बयान बता दिया था। 
          बहरहाल, वर्ष 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने अपनी हिंदू विरोधी नीति का पालन प्रारंभ कर दिया। जिस प्रकरण की पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिक्र किया है, उसकी कल्पना कभी 2004 से पहले किसी ने नहीं की थी। हिंदू बाहुल्य देश में, हिंदू समाज के सबसे बड़े संत को, हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहारों में से एक दीपावली के दिन गिरफ्तार करने की बात क्या 2004 से पहले सपने में भी सोची जा सकती थी? परंतु, यह दुर्भाग्यपूर्ण दिन हिंदुस्थान ने देखना पड़ा। 11 नवम्बर, 2004 को हत्या के आरोप में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को आंध्रप्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो कुछ नहीं बोले, परंतु प्रणब मुखर्जी ने इस प्रकरण में अपनी नाराजगी प्रकट की। (जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक में लिख है।) परंतु, कांग्रेस सरकार पर उनकी नाराजगी का कोई असर नहीं हुआ। उनके इस प्रश्न का उत्तर भी किसी ने नहीं दिया कि क्या ईद के दिन इसी प्रकार किसी मौलवी को गिरफ्तार करने का साहस दिखाया जा सकता है। कांग्रेस ने इस गिरफ्तारी पर तमिलनाडु सरकार से कोई सवाल नहीं पूछा और न ही किसी प्रकार का विरोध ही किया। देश में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ही विरोध प्रदर्शन किया और शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की रिहाई की माँग की। उस समय आम समाज ने यह मान लिया था कि हिंदू धर्मगुरु की गिरफ्तारी के मामले में जयललिता की सरकार को केंद्र की संप्रग सरकार का मौन समर्थन प्राप्त है। परंतु, हिंदू प्रतिष्ठान को बदनाम करने का यह षड्यंत्र असफल साबित हुआ। न्यायालय ने शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती एवं अन्य पर लगे सभी आरोप खारिज कर दिए। 
         बाद में, 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' शब्द देकर कांग्रेस ने हिंदू विरोधी छवि को और अधिक पुष्ट किया। मालेगाँव और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू आतंकवादी हो गए हैं। हालाँकि, कांग्रेस अपनी इस अवधारणा को कभी सिद्ध नहीं कर पाई। हिंदू आतंकवाद को सिद्ध करने के लिए उसने जो षड्यंत्र रचे थे, अब उनसे भी पर्दा उठ रहा है। देश यह जानकर स्तब्ध है कि कैसे इस्लामिक आतंकवाद का बचाव करने के लिए कांग्रेस के नेताओं ने 'भगवा' जैसे पवित्र रंग-शब्द को आतंकवाद से जोडऩे के लिए गहरी साजिशें रचीं। भारतीयता की पहचान 'भगवा' पर कालिख पोतने का प्रयास किया गया। आज भी देश में एक वर्ग भगवा शब्द का उपयोग हिंदुओं को गाली देने के लिए करता है। जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाया गया कि वह ऐसी कहानी और तथ्य गढ़ें, जिनसे हिंदू आतंकवाद की थिअरी को सिद्ध किया जा सके। परंतु, हम सब जानते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते हैं। इसलिए उनका यह झूठ अधिक दूर तक चल नहीं सका।  
          वर्ष 2007 में रामसेतु प्रकरण में भी यही हुआ। भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु को तोड़ने की जिद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने ठान ली थी। हिंदू समाज के तीव्र विरोध को भी दरकिनार कर कांग्रेस सरकार रामसेतु को तोडऩे के लिए आतुर दिखाई दे रही थी। लोकतंत्र में जनभावनाओं की अनदेखी और दुराग्रह के लिए कोई स्थान नहीं होता है। चूँकि आस्थाओं का प्रश्न हिंदू समाज का था, इसलिए सरकार को परवाह नहीं थी। जबकि इसी देश में दूसरे मत-संप्रदायों के विरोध पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी संसद मे पलट दिए गए। हद तो तब हो गई, जब 'सेतु' को तोडऩे पर उतावली कांग्रेस ने 'राम' पर ही चोट कर दी। कांग्रेस ने न्यायालय में हलफनामा देकर कहा कि राम का कोई अस्तित्व नहीं है। राम एक काल्पनिक पात्र हैं। यह राम के अस्तित्व पर और करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट नहीं थी, तो क्या थी? यह कांग्रेस के हिंदू विरोधी स्वभाव का प्रकटीकरण ही तो था। राम इस देश का इतिहास ही नहीं, अपितु पहचान भी है। कांग्रेस ने उसी पहचान को मिटाने का दुस्साहस किया था।  
          कांग्रेस ने वर्ष 2011 में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के नाम पर ऐसा कानून बनाने का प्रयास किया था, जिसकी चक्की में हर हाल में हिंदू समाज को ही पिसना था, भले ही वह सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी हो या नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-2011' का मसौदा तैयार किया था। सोनिया गाँधी की इस परिषद में ज्यादातर हिंदू विरोधी व्यक्ति शामिल थे। यह कानून भी हिंदुओं के दमन के लिए तैयार कराया गया था और इस काम में परिषद के ज्यादातर सदस्य माहिर थे। उन्होंने ऐसा मसौदा तैयार किया, जो अगर लागू हो जाता, तब प्रत्येक सांप्रदायिक दंगे के लिए हिंदू को दोषी बनाया जाता। भाजपा, आरएसएस और हिंदू समाज ने इस विधेयक का इतना विरोध किया कि कांग्रेस को इसे ठण्डे बस्ते में डालना पड़ा। 
          यह कुछेक प्रकरण हैं, ऐसे और भी प्रकरण हैं। एक लेख में सबकी चर्चा करना संभव नहीं। कांग्रेस के हिंदू विरोधी व्यवहार को देख कर ही देश की जनता ने वर्ष 2014 में उसे मात्र 44 सीटों पर समेट दिया और बाद में राज्यों से भी विदा कर दिया। वर्ष 2014 की ऐतिहासिक और शर्मनाक पराजय के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता (ईसाई) एके एंटनी ने भी पराजय के कारणों की समीक्षा में माना कि 'हिंदू विरोधी छवि के कारण यह दुर्गति हुई है। तुष्टीकरण की नीति पर चलते-चलते कांग्रेस की जो हिंदू विरोध छवि बन गई है, उससे उसे मुक्त होना होगा।' परंतु, कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को नहीं माना और वह बदस्तूर हिंदू विरोध की नीति पर चल रही है। हाल में पशुओं को बचाने के केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने वीभत्स तरीका अपनाया। केरल में कांग्रेस ने खुलेआम हिंदू आस्था की प्रतीक गाय का गला काटा और चौराहे पर खड़े होकर गौमाँस खाया एवं वितरित किया। सोनिया गाँधी के बेटे एवं कांग्रेस के उपाध्यक्ष (जल्द ही अध्यक्ष होंगे) राहुल गाँधी भी अपने बयानों से बार-बार हिंदू समाज को लक्षित करते हैं। ऐसे अनेक अवसर समय-समय पर आते हैं, जब कांग्रेस स्पष्टतौर पर हिंदू विरोधी पाले में खड़ी नजर आती है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के नाते कांग्रेस को भी विचार करना चाहिए कि 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर वह जिस प्रकार का व्यवहार करती है, क्या वह देशहित में है?
      (पांचजन्य, १२ नवम्बर, २०१७ में प्रकाशित लेख)


रविवार, 5 नवंबर 2017

हिंदी मीडिया के चर्चित चेहरों से मुलाकात कराती किताब

 हम  जिन्हें प्रतिदिन न्यूज चैनल पर बहस करते-कराते देखते हैं। खबरें प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं में जिनके नाम से प्रकाशित खबरों और आलेखों को पढ़कर हमारा मानस बनता है। मीडिया गुरु और लेखक संजय द्विवेदी की किताब 'हिंदी मीडिया के हीरो' पत्रकारिता के उन चेहरों और नामों को जानने-समझने का मौका उपलब्ध कराती है। किताब में देश के 101 मीडिया दिग्गजों की सफलता की कहानी है। किन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पत्रकारिता शुरू की? कैसे-कैसे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते गए? उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है? टेलीविजन पर तेजतर्रार नजर आने वाले पत्रकार असल जिन्दगी में कैसे हैं? उनके बारे में दूसरे दिग्गज क्या सोचते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब यह किताब देती है। किताब को पढ़ते वक्त आपको महसूस होगा कि आप अपने चहेते मीडिया हीरो को नजदीक से जान पा रहे हैं। यह किताब पत्रकारिता के छात्रों सहित उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आगे बढऩा चाहते हैं। पुस्तक में जमीन से आसमान तक पहुंचने की कई कहानियां हैं। पत्रकारों का संघर्ष प्रेरित करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं को यह भी समझने का अवसर किताब उपलब्ध कराती है कि मीडिया में डटे रहने के लिए कितनी तैयारी लगती है। इस तरह के शीर्षक से कोई सामग्री किताब में नहीं है, यह सब तो अनजाने और अनायस ही पत्रकारों के जीवन को पढ़ते हुए आपको जानने को मिलेगा।

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर

 कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्रेणी का है। यदि चिदंबरम का नाम छिपा कर किसी से भी यह पूछा जाए कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का नारा कौन लगाता है, तब निश्चित ही उत्तर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी नेताओं का नाम ही आएंगे। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का नाम भी अनेक लोग ले सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी के नेता पी. चिदंबरम ने बीते शनिवार को कहा था कि जब कश्मीरी कहें आजादी तो समझिए स्वायत्तता। उन्होंने कहा कि 'कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है। इसका मतलब है कि वो अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। चिदंबरम का यह बयान भारतीय हित को नुकसान पहुँचाता है।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

गौ-हत्यारों एवं तस्करों के विरुद्ध कब मुखर होंगे हम

 गौरक्षा  के नाम पर पिछले समय में हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर देश का तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग एवं मीडिया काफी मुखर रहा है। रहना भी चाहिए। संविधान एवं कानून के दायरे से बाहर जाकर गौरक्षा हो भी नहीं सकती। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं भी गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा का विरोध कर चुके हैं। इसके बाद भी कथित बुद्धिजीवी एवं पत्रकारों ने हिंसा की घटनाओं को आधार बना कर गौरक्षा जैसे पुनीत कार्य और सभी गौरक्षकों को लांछित करने का प्रयास किया है। इसके लिए वह असहिष्णुता, मॉबलिंचिंग और नॉटइनमायनेम जैसी मुहिम चला चुके हैं। परंतु, उनकी प्रत्येक मुहिम संदेहास्पद रही है। उनके प्रत्येक आंदोलन का उद्देश्य और एजेंडा भेदभावपूर्ण रहा है, इसलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अयोध्या की दीपावली

 दीपावली  भारत का प्रमुख पर्व है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन के बाद दीपावली मनाई गई थी। श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और अत्याचारी रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे। समूची अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। कार्तिक अमावस्या के अंधेरे को दूर करने के लिए प्रत्येक अयोध्यावासी ने अपने राजा राम के लिए देहरी-देहरी दीप जलाए थे। अयोध्या जग-मग हो उठी थी। तभी से पूरे देश में दीपावली मनाई जाती रही है। परंतु, दु:ख की बात है कि राम जिस देश की आत्मा हैं, उसी देश में उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है। पहले राम के जन्मस्थल पर बने मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ विधर्मियों और आक्रांताओं ने मस्जिद तामीर करा दी थी। अब वहाँ मस्जिद तो नहीं है, परंतु मंदिर भी नहीं है। अपने ही घर में राम तंबू में हैं। सहिष्णु और उदार हिंदू समाज न्याय के मंदिर की ओर अपेक्षा से देख रहा है। उसे न्याय की प्रतीक्षा है। केन्द्र और राज्य में सरकार बदलने से जनमानस में एक भरोसा पैदा हुआ है। सरकार की ओर से भी मंदिर निर्माण पर सकारात्मक संकेत दिए जा रहे हैं। हालाँकि, सभी पहले न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

संघ के प्रति दुष्प्रचार कांग्रेस का एकमात्र ध्येय

कल्पना परुलेकर को मिली सजा से नहीं लिया सबक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुड्डू ने आरएसएस को बदनाम करने फेसबुक पर साझा किया फर्जी चित्र
यह फर्जी फोटो है,
असली फोटो लेख के आखिर में देखें
 राजनीति  में अपने विरोधियों को घेरने के लिए झूठ और तथ्यहीन जानकारियों का उपयोग अमर्यादित ढंग से करने की प्रवृत्ति में बढ़ गई है। यह प्रवृत्ति स्वच्छ राजनीति के लिहाज से कतई अच्छी नहीं है। विरोध करना और अपने विरोधी को घेरना अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके लिए झूठ का सहारा लेकर उनकी छवि बिगाड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में राजनेताओं, पार्टियों और संगठनों ने संज्ञान लेना प्रारंभ किया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में कांग्रेस की तत्कालीन विधायक कल्पना परुलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी तस्वीर का उपयोग किया था। पिछले दिनों ही कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को फर्जी फोटो के मामले में न्यायालय ने सजा सुनाई है। किंतु लगाता है कि कांग्रेस के नेता अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कल्पना परुलेकर को मिली सजा से सबक न लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी फोटो का सहारा लिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों का फोटो साझा किया है। यह दो फोटो को मर्फ करके बनाया गया फर्जी फोटो है, जो एबीपी न्यूज चैनल के वायरल सच कार्यक्रम में भी झूठा साबित हो चुका है। संघ के इंदौर विभाग के प्रचार प्रमुख सागर चौकसे ने इस मामले में प्रेमचंद गुड्डू और अन्य के विरुद्ध हीरा नगर थाने (इंदौर) में शिकायत दर्ज कराई है। इसके साथ ही इंदौर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक और इंदौर के पुलिस अधीक्षक को त्वरित कार्रवाई के लिए ज्ञापन दिया है। हालाँकि, पुलिस में शिकायत के बाद और अपने झूठ की पोल खुलने पर कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने फर्जी फोटो और आपत्तिजनक संदेश अपने फेसबुक पेज से हटा लिया है।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास


विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा
 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ की वर्तमान नीति भी स्पष्ट होती है, इसलिए स्वयंसेवकों के अलावा बाकी अन्य लोग भी सरसंघचालक के उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इस दशहरे पर संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में महत्त्वपूर्ण विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। अपने इस उद्बोधन में उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास किया है। समाज में सज्जन लोगों का प्रतिशत और उनकी शक्ति अधिक है, लेकिन महावीर हनुमान की तरह समाज को अपनी सज्जनशक्ति का स्मरण नहीं है। रामकथा में माता सीता की खोज पर निकले हनुमान सहित अन्य वीर जब समुद्र के विस्तार को देखते हैं, तब उनका उत्साह कम हो जाता है। तब जामवन्त ने हनुमान को उनके पराक्रम से परिचित कराया था। जब पराक्रमी हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण होता है, तब 100 योजन विशाल समुद्र भी उनके मार्ग में बाधा नहीं बन सका। जब समाज की सज्जनशक्ति को अपने बल का परिचय प्राप्त हो जाएगा, तब भारत को विश्वगुरु की खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

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