बुधवार, 31 अगस्त 2016

अब सिंधुस्थान की माँग

 भारत  के एक दाँव ने पाकिस्तान को चित कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गिलगित, बलूचिस्तान और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर का मामला दुनिया के सामने लाकर न केवल पाकिस्तान को आईना दिखाया है बल्कि पाकिस्तान के अत्याचार से पीडि़त जनमानस को साहस दिया है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी चरित्र से संघर्ष कर रहे लोगों में नया जोश आ गया है। ये लोग जहाँ हैं, वहीं से पाकिस्तान के दमनकारी चेहरे को विश्व के सामने ला रहे हैं। पड़ोसी देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने वाले पाकिस्तान का पहली बार हकीकत से सामना हुआ है। भारत की जमीन पर कब्जा करने वाले और उसके टुकड़े करने का ख्वाब देखने वाले पाकिस्तान को अब अपनी ही जमीन बचाने के लाले पड़ रहे हैं। गिलगित, बलूचिस्तान और पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर के नागरिक पाकिस्तान से आजादी की माँग कर ही रहे थे, अब सिंध प्रांत के लोगों ने भी अगल देश की माँग शुरू कर दी है। सिंध के मीरपुर खास में सोमवार को सड़कों पर उतरकर अनेक लोगों ने आजादी के नारे लगाते हुए सिंधुदेश की माँग की है। अमेरिका, लंदन से लेकर जर्मनी तक गिलगित, बलूचिस्तान, पीओके और सिंध की आजादी को लेकर प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं। 
सिंध पाकिस्तान के बड़े प्रांतों में से एक है। यह पाकिस्तान के दक्षिण-पूर्व मे स्थित है। यह सिंधियों का मूल स्थान माना जाता है। बँटवारे से पूर्व यहाँ बड़ी संख्या में हिंदू आबादी थी। लेकिन, बँटवारे के दौरान कट्टरपंथियों ने हिंदुओं को यहाँ से भागने के लिए मजबूर कर दिया। अपने दुकान-मकान सबकुछ छोड़-छाड़कर अधिकांश हिंदू परिवार भारत आ गए। भारत से पाकिस्तान जाने वाले अधिकतर मुस्लिम परिवारों को सिंध में हिंदुओं द्वारा छोड़े घरों में बसा दिया गया। इसलिए भारत से पाकिस्तान गए मुसलमान भी इसी क्षेत्र में सर्वाधिक हैं। इसके अलावा पाकिस्तान की सर्वाधिक हिंदू आबादी भी सिंध में ही बसती है। पाकिस्तान के कट्टरपंथी समुदायों ने हिंदुओं को तो कभी स्वीकार किया ही नहीं, भारत से पाकिस्तान गए मुसलमानों को भी हेय की दृष्टि से देखते हैं। सिंध प्रांत में पाकिस्तान के कट्टरपंथी धड़े खुलेआम गुंडागर्दी करते हैं लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं देती है। हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण करने के सर्वाधिक मामले इसी क्षेत्र से सामने आते ही हैं। सिंध प्रांत के लोगों की भाषा पर भी कट्टरपंथी धड़े चोट कर रहे हैं। यहाँ के रहवासियों पर जबरन अरबी और उर्दू थोपी जा रही है। इसका विरोध स्थानीय स्तर पर किया जाता रहा है। अमेरिका के सांसदों की एक रिपोर्ट की माने तो सिंध में हिंदुओं के लिए रहने लायक स्थितियां नहीं हैं। 
दरअसल, पाकिस्तान का निर्माण जिस वैचारिक पृष्ठभूमि के तहत हुआ है, वह पृष्ठभूमि ही पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए खतरनाक साबित हो रही है। हमें ध्यान रखना होगा कि बलूचिस्तान के प्रति भी पाकिस्तान का दोहरा बर्ताव इसलिए है क्योंकि बलूचिस्तान ने प्रारंभ में पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया था। बलूचिस्तान के उस विरोध और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को पाकिस्तान आज तक पचा नहीं सका है। पाकिस्तान जिन प्रांतों की आबादी को स्वीकार नहीं करता है, उन सभी प्रांतों का वह सिर्फ दोहन और दमन कर रहा है। यही कारण है कि गिलगित, बलूचिस्तान, पाक अधिक्रांत जम्मू-कश्मीर और सिंध के हालात एकसमान हैं। लेकिन, अब यहाँ की जनता लामबंद हो गई है। उनकी बुलंद होती आवाज को कुचलना पाकिस्तान के लिए आसान नहीं होगा। भारत का साथ मिल जाने से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे यहाँ के नागरिकों को बल मिला है। इसीलिए वह भारत के प्रति धन्यवाद भी ज्ञापित कर रहे हैं और हमसे अपेक्षाएँ भी कर रहे हैं। बहरहाल, पाकिस्तान के अलग-अलग प्रमुख प्रांतों से आ रही 'पाकिस्तान से आजादी' की माँगें जरूर उसे विचलित कर रही होंगी। इन आवाजों से पाकिस्तान को सबक लेना चाहिए। वरना, एक नया बांग्लादेश बनने में देर नहीं लगेगी। 

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

मुलायम के बोल-वचन और वोट बैंक की राजनीति

 उत्तर  प्रदेश के चुनाव सिर पर आ गए हैं। इस बार समाजवादी पार्टी की नैया भंवर में दिखाई पड़ रही है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 'मुस्लिम प्रेम' नजर आने लगा है। वह किसी भी प्रकार अपने वोटबैंक को खिसकने नहीं देना चाहते हैं। मुसलमानों को रिझाने के लिए उन्होंने फिर से 'बाबरी राग' अलापा है। मुलायम सिंह यादव ने अपने जीवन पर लिखी किताब 'बढ़ते साहसिक कदम' के विमोचन अवसर पर अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को साहसिक बताया है। उनका कहना है कि देश की एकता को बचाने के लिए कारसेवकों पर गोली चलाने का उनका फैसला सही था। गोली नहीं चलती तो मुसलमानों का भरोसा उठ जाता। देश की एकता बचाने के लिए 16 की जगह 30 जान भी लेनी पड़ती तो ले लेता। गौरतलब है कि जनवरी, 2016 में भी मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने के अपने फैसले को सही ठहराया था।

शनिवार, 27 अगस्त 2016

राहुल गांधी तय कीजिए, संघ ने गांधीजी की हत्या की या नहीं

 महात्मा  गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को जिम्मेदार ठहराने के अपने बयान पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी स्थिति तय नहीं कर पा रहे हैं। एक तरफ, सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने हलफनामे में राहुल गांधी ने दावा किया है कि उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक संगठन के तौर पर कभी भी जिम्मेदार नहीं बताया है। उन्होंने संघ से जुड़े कुछ लोगों पर महात्मा गांधी की हत्या करने का आरोप लगाया था। वहीं दूसरी तरफ, न्यायालय के बाहर वह गर्जन-तर्जन कर रहे हैं कि संघ को लेकर दिए बयान पर वह कायम हैं और संघ की विचारधारा के खिलाफ उनकी लड़ाई जारी रहेगी। राहुल गांधी को समझना चाहिए कि विचारधारा की लड़ाई लडऩा अच्छा माना जा सकता है लेकिन गलत तथ्यों के आधार पर एक सम्मानित संगठन को बदनाम करना कतई उचित नहीं है। इसे राजनीतिक अपरिपक्वता ही कहा जाएगा कि पारदर्शिता के इस जमाने में वह न्यायालय में कुछ हलफनामा पेश करते हैं और न्यायालय से बाहर कुछ और बयानबाजी करते हैं। जनता उस व्यक्ति को संदेह की दृष्टि से देखती है, जिसकी कथनी में बार-बार अंतर दिखाई देता है। राहुल गांधी यदि यह सोच रहे हैं कि जनता को भ्रमित किया जा सकता है, तब वह बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार हैं। संघ के लोग भी संचार माध्यमों का उपयोग करने लगे हैं, इसलिए संघ के खिलाफ किसी झूठ को गढऩा अब पहले की तरह आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में दिए माफीनामे जैसा हलफनामा प्रस्तुत करते समय राहुल गांधी को इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि समूचे देश तत्काल उनके 'यू-टर्न' की खबर फैल जाएगी। इस 'यू-टर्न' को लेकर बने माहौल ने ही उन्हें फिर से संघ के खिलाफ बोलने के लिए मजबूर कर दिया। लेकिन, यहाँ भी राहुल गांधी गलत हैं। न जाने उन्हें क्यों लगता है कि उनका राजनीतिक करियर संघ को गरियाने से ही आगे बढ़ सकता है। न जाने क्यों उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि देश उनसे गंभीर राजनीति की अपेक्षा करता है, लेकिन वह प्रत्येक अवसर पर सबको निराश कर देते हैं।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

बोफोर्स का सच इसलिए है दफ़न

 बोफोर्स  घोटाले का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है। देश के वरिष्ठ राजनेता और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने बोफोर्स घोटाले के मामले में एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके बयान को आपराधिक स्वीकारोक्ति कहना अधिक उचित होगा। बुधवार को लखनऊ के राममनोहर लोहिया विधि विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस समारोह में उन्होंने कहा कि 'जब मैंने बोफोर्स तोप को देखा तो पाया कि वह ठीक से काम कर रही है। उस वक्त मेरे मन में पहला विचार यह आया कि राजीव गांधी ने बढिय़ा काम किया है, इसलिए मैंने उससे जुड़ी फाइलों को गायब कर दिया। लोगों का ऐसा मानना है कि बोफोर्स सौदा राजीव गांधी की गलती थी, लेकिन रक्षा मंत्री के तौर पर मैंने देखा कि यह सही सौदा था और राजीव ने अच्छा काम किया।' मुलायम सिंह यादव की इस स्वीकारोक्ति ने देश को बता दिया है कि देश में किस तरह बड़े घोटालों का सच छिपाया जाता है। जाँच को कैसे भटकाया जाता है। सबूत किस तरह नष्ट किए जाते हैं। हमारे जिम्मेदार राजनेता ही जब फाइलें गायब करा देते हैं, तब जाँच में क्या खाक साबित होगा? उल्लेखनीय है कि मुलायम सिंह यादव वर्ष 1996 से 98 के दौरान जब रक्षा मंत्री थे, तब राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में स्वीडन की एबी बोफोर्स कंपनी से 400 हॉविट्जर तोपों की खरीद में कथित घोटाले का मुकदमा अदालत में चल रहा था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो वर्ष 1990 से ही इस मामले की जाँच कर रहा था, लेकिन ब्यूरो कोई ठोस सबूत नहीं जुटा सका। भला सबूत मिलते भी कैसे, स्वयं रक्षामंत्री ने फाइलें गायब करा दी थीं।

रविवार, 14 अगस्त 2016

लोकेन्द्र पाराशर के कंधों पर भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी : उनका संक्षिप्त परिचय

 सहजता,  सरलता, सादगी और बेबाकी इन सबको मिला दिया जाए तो एक बेहद उम्दा इंसान आपके सामने होगा। लोकेन्द्र पाराशर। जो उनके भीतर है, वह ही बाहर भी। कथनी-करनी में किंचित भी अंतर नहीं। खरा-खरा कहना, चाहे किसी को बुरा लगे या भला। आपसे मित्रवत मिलेंगे और हर संभव आपकी मदद करने को हर पल तैयार। समाजकंटकों के लिए अपनी लेखनी की आग और समाजचिंतकों के लिए अपनी आंखों के पानी के लिए वे देशभर में ख्यात हैं। वे लम्बे समय तक पत्रकारिता की पाठशाला कहे जाने वाले दैनिक स्वदेश (ग्वालियर) के संपादक रहे हैं। उनका चिंतन राष्ट्रवादी है। वे समाज और देशहित से जुड़े मुद्दों पर गहरी पकड़ रखते हैं। ग्रामवासी होने के कारण भारत को औरों की अपेक्षा कहीं अधिक नजदीक से देखते और समझते हैं। उनका चिंतन, उनकी सोच और उनके विचार उनके लेखन में झलकता है।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

शोभा डे की अशोभनीय टिप्पणी

 रियो  ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे खिलाडिय़ों के संबंध में विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्वीटर पर अशोभनीय टिप्पणी करके अपनी ओछी मानसिकता का प्रदर्शन किया है। भारतीय दल के शुरुआती प्रदर्शन पर उन्होंने लिखा कि 'ओलंपिक में भारतीय खिलाडिय़ों के लक्ष्य हैं- रियो जाओ, सेल्फी लो, खाली हाथ वापस आओ, पैसे और मौकों की बरबादी।' जिस वक्त समूचा देश रियो में भारत के बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रार्थना कर रहा है, तब इन महोदया के दिमाग में इस घटिया विचार का जन्म होता है। शोभा डे की इस बेहूदगी की सब ओर से निंदा की गई। यहाँ तक कि ओलंपिक में हिस्सा ले रहे खिलाड़ी भी आहत होकर खुद को शोभा डे के विरोध में टिप्पणी करने से नहीं रोक सके। निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने नसीहत देते हुए कहा कि शोभा डे यह थोड़ा अनुचित है। आपको अपने खिलाडिय़ों पर गर्व होना चाहिए, जो पूरी दुनिया के सामने मानवीय श्रेष्ठता हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं। पूर्व हॉकी कप्तान वीरेन रसकिन्हा ने सही ही कहा कि हॉकी के मैदान में 60 मिनट तक दौड़कर देखिए, अभिनव और गगन की राइफल ही उठाकर देख लीजिए, आपको समझ आ जाएगा कि आप जैसा सोचती हैं, यह काम उससे कहीं अधिक कठिन है। कुछ मिलाकर सब जगह शोभा डे की भद्द पिट रही है।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

जरा याद करो कुर्बानी

 आजादी  की 70वीं सालगिरह से ठीक पहले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मभूमि भाबरा में 'आजादी 70 साल, याद करो कुर्बानी' अभियान की शुरुआत करने का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निर्णय सराहनीय है। प्रधानमंत्री मोदी ने मध्यप्रदेश के अलीराजपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद स्मारक जाकर उन्हें याद किया और देशवासियों से आह्वान किया कि आजादी के 70 साल और भारत छोड़ो आंदोलन के 75 साल पूरे होने के मौके पर हमारा कर्तव्य बनता है कि हम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने वाले लोगों को याद करें। हम उन लक्ष्यों को पाने की कोशिश करें, जिन्हें पाने का सपना लेकर आजादी के नायकों ने अपना जीवन कुर्बान किया। कहने को हम कह सकते हैं कि हम स्वतंत्रता सेनानियों को भूले कब हैं, जो याद करें। लेकिन, कलेजे पर हाथ रखकर खुद से पूछिए कि सवा सौ करोड़ भारतवासियों में से कितनों को स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान याद है। कितने लोग हैं, जो कम से कम दस बलिदानियों के नाम भी बता पाएंगे? उससे भी जरूरी सवाल यह है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने किस बात के लिए अपने प्राणों की आहूति दी?

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

गोरक्षकों की प्रतिष्ठा का प्रश्न

 गोरक्षा  की आड़ में निंदनीय घटनाओं को अंजाम दे रहे तथाकथित गोरक्षकों के संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की टिप्पणी के गहरे निहितार्थ हैं। उतावलेपन से प्रधानमंत्री के बयान की गंभीरता को समझना मुश्किल होगा। प्रधानमंत्री के बयान के महत्त्व को समझने के लिए गंभीरता, धैर्य और वास्तविकता को स्वीकार करने का सामथ्र्य चाहिए। प्रधानमंत्री ने दो टूक कहा है कि इन दिनों कई लोगों ने गोरक्षा के नाम पर दुकानें खोल रखी हैं। दिन में यह लोग गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं और रात में गोरखधंधा करते हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन तथाकथित गोरक्षकों का डोजियर तैयार किया जाए, तब इनमें से तकरीबन 80 प्रतिशत असामाजिक तत्त्व निकलेंगे। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर कुछ हिंदूवादी संगठन गुस्से में हैं। उन्होंने इस बयान की निंदा की है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री ने गोरक्षकों को बदनाम किया है। लेकिन, क्या इन संगठनों ने एक बार भी सोचा है कि जिस तरह से पिछले कुछ समय में देशभर में गोरक्षा के नाम पर हत्या, मारपीट, धमकाने और धन वसूलने के मामले सामने आए हैं, उनसे गोरक्षकों का कितना मान बढ़ा है? गोरक्षा के नाम पर आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले इन लोगों ने वास्तविक गोरक्षकों की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया है। पूरी ईमानदारी से गो-सेवा में शामिल भोले-भाले लोगों को भी समाज में संदिग्ध निगाह से देखा जाने लगा है। हिंदू संगठनों को यह भी समझना चाहिए कि तथाकथित गोरक्षकों की इन हरकतों से उनकी स्वयं की प्रतिष्ठा भी धूमिल हो रही है। सच्चे गोरक्षकों की प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए इन नकली गोरक्षकों को बेनकाब किया जाना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि सच्चे गोरक्षकों को इन नकली गोरक्षकों से सजग रहना चाहिए। वरना, मुट्ठीभर गंदे लोग आपको बदनाम कर देंगे।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

सना से सीखें कट्टरपंथियों को जवाब देना

 सांप्रदायिक  और कट्टर सोच को उजागर करती दो घटनाएं हमारे सामने हैं। एक, मायानगरी मुम्बई की घटना है। दूसरी घटना मध्यप्रदेश की धर्मनगरी उज्जैन की है। घर-घर 'आराध्या' नाम से पहचानी जाने वाली सना अमीन शेख टीवी कलाकार हैं। धारावाहिक 'कृष्णदासी' में सना का नाम आराध्या है। धारावाहिक में वह एक विवाहित मराठी महिला का किरदार कर रही हैं। भूमिका के अनुसार उन्हें माँग में सिंदूर भरना होता है और गले में मंगलसूत्र पहनना होता है। गजब की धार्मिक असहिष्णुता है कि पर्दे पर अपने किरदार को निभाने के लिए सना द्वारा सिंदूर भरने और मंगलसूत्र पहनने भर से ही इस्लाम खतरे में आ गया। सना ने धारावाहिक की शूटिंग के कुछ चित्र सामाजिक माध्यम (सोशल मीडिया) पर साझा किए, तबसे वह कट्टरपंथी मानसिकता के निशाने पर हैं। ओछी सोच के अनेक मुसलमान उन्हें नसीहत देने लगे हैं, यथा - 'मुस्लिम लड़कियों को सिंदूर नहीं लगाना चाहिए। तुम एक मुस्लिम लड़की हो, मंगलसूत्र क्यों पहनती हो? किसी भी मुस्लिम महिला को चाहे वह अभिनेत्री हो, सबसे पहले अपने धर्म का सम्मान करना चाहिए। कुछ अतिवादी तो धमकाने की हद तक पहुँच गए। सना शेख ने इन मनोरोगियों की कट्टरपंथी सोच को करारा जवाब दिया है। उसने सामाजिक माध्यम पर खुला खत लिखकर सांप्रदायिक सोच को लताड़ लगाई है। सना ने लिखा है कि क्या सिंदूर लगाने से अल्लाह मुझे दोजख में भेज देंगे और विरोध करने वालों को जन्नत में भेजेंगे? सना ने कहा कि शूटिंग के वक्त मेरी माँग में भरा सिंदूर तब तक मेरे बालों में रहता है जब तक मैं नहाती नहीं हूँ। सना ने संकुचित मानसिकता के लोगों को उनकी ही भाषा में आईना दिखाने का प्रयास भी किया। उसने कहा कि यदि अपने किरदार को निभाने के लिए मेरा सिंदूर लगाना और मंगलसूत्र पहनना इस्लाम के खिलाफ है तब मेरा धारावाहिक देखने वाले क्या कर रहे हैं? सिनेमा देखना, फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम का उपयोग करना क्या हराम नहीं है? आप लोग मेरा धारावाहिक देखना बंद क्यों नहीं करते? फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर समय बर्बाद करके क्या तुम लोग जन्नत में जाओगे?

बुधवार, 3 अगस्त 2016

राजनीति की आदर्श परिपाटी

 भारतीय  जनता पार्टी सदैव राजनीतिक शुचिता और राजनीति में आदर्श स्थापित करने के विचार का प्रतिपादन करती रही है। अनेक अवसर पर उसने अपने इस विचार को स्थापित करने के प्रयास भी किए हैं। इस समय पार्टी का अघोषित सिद्धांत बन गया है कि 75 वर्ष की उम्र पूरी करने वाले राजनेताओं को मंत्री पद और सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। हाल में केन्द्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार में इस सिद्धांत का पालन होते दिखा। राज्य (मध्यप्रदेश) के मंत्रिमंडल में भी इसका असर दिखाई दिया। यहाँ तक कि पार्टी के विचार को पुष्ट करने के लिए केन्द्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने स्वयं मंत्री पद से अपना त्याग पत्र प्रस्तुत कर आदर्श व्यवहार प्रस्तुत किया। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से जिस अनुशासन की अपेक्षा रहती है, उसका प्रदर्शन गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने भी किया है। उन्होंने भी अपनी उम्र को ध्यान में रखकर मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र की पेशकश की है।

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